किसानों द्वारा अपनी भूमि पर काटी जा रही कॉलोनियों को अवैध कहना कितना सार्थक ?

हमारे देश में यदि कोई किसान या किसान परिवार में जन्मा कोई व्यक्ति काश्तकारों से जमीन लेकर या अपनी स्वयं की भूमि पर आवासीय भूखंड काटता है या कोई कॉलोनी बनाता है तो उसे ‘अवैध कॉलोनी ‘ कहने में जहां मीडिया के कुछ लोग सक्रिय होते हैं , वहीं कुछ अधिकारी भी इन कॉलोनीज को इसी प्रकार परिभाषित करते हैं । जबकि यह परिभाषा स्थापित करना किसानों के उस अधिकार के सर्वथा विपरीत है जिसमें उन्हें भूमि संबंधी भारत के कानून अपनी भूमि का किसी भी प्रकार उपभोग करने के अधिकार देते हैं। संक्रमणीय अधिकारों वाला कोई भी भूमिधर या किसान अपनी भूमि पर किसी भी प्रकार की गतिविधि कर सकता है । यह उसका मौलिक अधिकार है।
इसके उपरांत भी यदि उसके द्वारा काटी जा रही किसी कॉलोनी को अवैध कहा जाता है तो यह न केवल उस किसान के अधिकारों का शोषण है अपितु जो लोग ऐसा कहकर उन किसानों का शोषण करते हैं उनके एक आपराधिक कृत्य की ओर भी हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं ।

वास्तव में अंग्रेजों ने आवासीय बस्तियों को कॉलोनी शब्द से परिभाषित किया था । जिसके लिए भारत के किसानों से बहुत ही सस्ते दामों पर भूमि लेकर उसे वह बड़े ‘ मोटे मुनाफे ‘ के आधार पर बेचते थे । उनका ‘मोटा मुनाफा ‘ कमाने का यह कार्य अंग्रेजी जमाने में हमारे लिए एक अत्याचार था और अत्याचार ही माना जाता था । उन्होंने किसी भी स्थानीय व्यक्ति को ऐसा करने से रोकने के लिए ऐसी व्यवस्था विकसित की कि यहां का स्थानीय व्यक्ति या कोई किसान ऐसा कर ही ना सके । इसका कारण केवल यही था कि कॉलोनी काटने में जितना भी मुनाफा आए , वह अंग्रेजों का हो और उसे वे अपने देश ले जाने में सफल हो जाएं ।
यह बहुत ही दुखद तथ्य है कि देश के आजाद होने के 72 वर्ष पश्चात भी कॉलोनीज के बारे में हमारी वही धारणा काम कर रही है जो अंग्रेजों के काल में थी , अर्थात जिसे कॉलोनाइजर या सरकारी तंत्र का आशीर्वाद प्राप्त किए लोग करें वह कॉलोनी तो वैध और जिसे किसान स्वयं करें या जनसाधारण में से कोई व्यक्ति करे वह कॉलोनी अवैध मानी जाती है । ऐसी व्यवस्था स्वतंत्र भारत में केवल इसलिए बनी हुई है कि आज भी अंग्रेजी मानसिकता के लोग हम पर शासन करने के लिए शासन – प्रशासन में बैठे हुए हैं ।
जनता के लोग अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं है । वह मौलिक अधिकारों से अनभिज्ञ होने के कारण स्थानीय शासन व प्रशासन या प्रशासनिक अधिकारियों तक के द्वारा बनाए गए नियम व उपनियमों के मकड़जाल में ऐसे फंस जाते हैं या फंसा दिए जाते हैं कि वह नियम व उपनियमों को भी अपने ऊपर कानून समझते हैं । जैसे किसी जिले का कोई जिलाधिकारी कॉलोनाइजरों को लाभ पहुंचाने के लिए यह नियम बना दे कि कोई भी किसान कहीं पर भी बिना किसी प्राधिकरण की पूर्व अनुमति के या प्रशासनिक अधिकारियों की पूर्व अनुमति के बिना कोई भी निर्माण कार्य नहीं करेंगे तो यह नियम व उपनियम कानून न होकर भी किसानों के लिए कानून बन जाता है । जबकि किसी भी जिलाधिकारी को या प्रशासनिक अधिकारी को यहां तक कि शासन में बैठे लोगों को भी संक्रमणीय अधिकारों वाले किसी किसान के अधिकारों का अतिक्रमण करने वाले ऐसे नियम व उपनियम बनाने का अधिकार नहीं है ।

इन नियमों व उपनियमों के मकड़जाल में फंसे किसान लोग कानून के द्वारा अपनी भूमि के किसी भी प्रकार से उपभोग करने के मौलिक और कानूनी अधिकार के बारे में वह सोच ही नहीं पाते। मानव अधिकार आयोग भी न तो इन किसानों के अधिकारों की या कानूनों की समीक्षा करता है और न ही इस ओर ध्यान देता है ।
हां इतना अवश्य है कि किसानों के या जनता के किसी व्यक्ति के द्वारा जो कॉलोनी बसाई जाती हैं उनमें सुनियोजित विकास की कम संभावना होती है । क्योंकि वह रास्ते चौड़े नहीं छोड़ते ,साथ ही बिजली आदि की व्यवस्था भी मात्र खंभे खड़े करके दिखा देने से संपन्न हुई समझ लेते हैं। परंतु उनके बारे में यह भी सत्य है कि यह किसी कॉलोनाइजर की अपेक्षा बहुत सस्ते दर पर लोगों को आवासीय भूखंड उपलब्ध कराते हैं । यदि सरकार इनकी कॉलोनीज के लिए ऐसे मानक तय कर दे कि यदि कोई काश्तकार या जनता का कोई व्यक्ति आवासीय भूखंड काटता है या कोई कॉलोनी बनाता है तो उसमें उन्हें इतनी चौड़ाई के रास्ते ,हरियाली के लिए इतने पार्क और बड़ी कॉलोनी के बीच में स्कूल व अस्पताल के लिये भूमि की व्यवस्था भी करनी होगी । साथ ही बिजली , सड़क , स्कूल व हॉस्पिटल आदि की सारी व्यवस्था अर्थात विकास कार्यों को सरकार अपनी ओर से संपन्न कराएगी तो जितने चोर कॉलोनाइजर या अधिकारी या राजनीतिक लोग अपना संरक्षण देकर अवैध कार्यों को वैध घोषित करवा रहे हैं या स्वयं कर रहे हैं , उन सब का भंडाफोड़ हो जाएगा। इसका लाभ यह होगा कि जनसाधारण को या किसी काश्तकार को अपनी भूमि का उचित मूल्य मिल जाएगा , साथ ही आवासीय भूखंड प्राप्त करने वाले लोगों को सस्ती दर पर भूखंड प्राप्त हो जाएगा । अंग्रेजों के काल से लेकर वर्तमान समय तक जो लोग इस प्रकार के अवैध कार्य को करते हुए मोटा मुनाफा कमा रहे हैं , सरकार के द्वारा उपरोक्त व्यवस्था करने पर उनका मोटा मुनाफा कमाने का धंधा भी समाप्त हो जाएगा और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में सरकार को सफलता मिलेगी । क्योंकि इन अवैध कार्यों को करने वाले कॉलोनाइजर से शासन-प्रशासन में बैठे राजनीतिज्ञ और प्रशासनिक अधिकारी भी मोटी कमाई करते हैं , और किसान को कॉलोनी काटने से हतोत्साहित करते हुए इन अवैध व्यापारी कॉलोनाइजर्स को प्रोत्साहित करते हैं ।
यह कितनी बड़ी मूर्खता है कि देश में जो लोग अवैध कार्य कर रहे हैं उनके कार्यों को वैध माना जाता है और जो वैध कार्य कर रहे हैं अर्थात अपनी भूमि पर अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए आवासीय भूखंड काट रहे हैं या कॉलोनी बना रहे हैं उनके इस वैध कार्य को अवैध घोषित किया जाता है ? क्या अब इस परिभाषा को बदलने का समय नहीं आ गया है ? यदि हम इसे बदलने में सफल होते हैं और सरकार उपरोक्त परामर्श के आधार पर कार्य करती हैं तो देश में शोषण करने वाले काले अंग्रेजों का एक बहुत बड़ा नेटवर्क समाप्त हो सकता है।
मित्रो ! आपका क्या मत है ?

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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