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इतिहास के पन्नों से

जब आज के दिन मालवीय जी ने किया था पहला हिंदी राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित

25 दिसंबर 1861 को जन्मे पंडित मदन मोहन मालवीय जी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक दैदीप्यमान नक्षत्र हैं । उन्होंने गांधी जी के साथ रहकर भी और गांधीजी से अलग होकर भी मुस्लिम तुष्टीकरण जैसी उनकी राष्ट्रघाती नीतियों का विरोध किया था ।

मालवीय जी से पहले स्वामी दयानंद जी ने सत्यार्थ – प्रकाश हिन्दी में लिखकर हिंदी की अनन्य सेवा की थी । मालवीय जी ने महर्षि दयानंद के इस कार्य को और आगे बढ़ाते हुए सन 1910 में काशी में आज के दिन अर्थात 10 अक्टूबर को पहला राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन आयोजित किया था । जिसके वह सभापति बनाए गए थे । हिंदी को लेकर किए गए इस राष्ट्रीय सम्मेलन के मंच से मालवीय जी ने महत्वपूर्ण भविष्यवाणी करते हुए कहा था कि हिंदी ही वह भाषा है जो एक दिन इस देश की राष्ट्रभाषा बनेगी । मालवीय जी से प्रेरित होकर ही सावरकर जी जैसे क्रांतिकारियों ने हिंदी को लेकर जेल में भी विशेष कार्य किया था , यद्यपि उनकी अपनी भाषा मराठी थी। मालवीयजी ने हिन्दी अंग्रेजी समाचार पत्र हिन्दुस्तान का 1887 से संपादन करके दो ढाई वर्ष तक जनता को जागृत करने का महान कार्य किया था। वे 1924 में दिल्ली आकर हिन्दुस्तान टाइम्स के साथ जुड़े। हिन्दी के उत्थान में मालवीयजी की भूमिका ऐतिहासिक है।

1947 में जब देश आजाद हुआ तो सत्ता उन लोगों के हाथों में आई जो हिंदी को लेकर या तो आशंकित थे या तुष्टीकरण के कारण उसे उपेक्षित करने के समर्थक थे । अपने इसी दुर्गुण के कारण तत्कालीन सत्ताधीशों ने हिंदी की उपेक्षा करते हुए अंग्रेजी को भारतवर्ष के लिए बनाए रखना उचित समझा । इतना ही नहीं उन्होंने हिंदी की व्याकरण आदि को भी उपेक्षित करते हुए उसके स्थान पर एक अवैज्ञानिक , अतार्किक और अप्राकृतिक भाषा का आविष्कार किया । जिसे उन्होंने ‘ हिंदुस्तानी ‘ कहा । यह ‘ हिंदुस्तानी ‘ एक खिचड़ी भाषा है । जिसे आजकल की भाषा में हमारे द्वारा ‘ हिंग्लिश ‘ कहा जाता है , अर्थात हिंदी और इंग्लिश दोनों के मिले-जुले शब्दों को बोलना ‘हिंदुस्तानी ‘ है । इस हिंदुस्तानी में उर्दू , अरबी ,फारसी के शब्दों की भी भरमार है । इस प्रकार हिंदी कहीं हमें दिखाई नहीं देती । पिछले 72 वर्षों में अपनी हिंदी भाषा की हमने इतनी ही सेवा की है ।

आज टीवी चैनलों पर , रेडियो व समाचार पत्रों में इसी ‘हिंदुस्तानी ‘ का प्रचलन आरंभ हो गया है । भाषा का कोई ज्ञान नहीं और व्याकरण की कोई पहचान नहीं , ऐसी एक अवैज्ञानिक भाषा को उस देश के लोग बोल रहे हैं जिस देश में पाणिनी जैसा व्याकरण आचार्य हुआ । जब ऐसा देखता हूं तो बड़ा कष्ट होता है ।

महर्षि दयानंद , मालवीय जी , वीर सावरकर जी और उन जैसे अनेकों हिंदी प्रेमी राष्ट्र भक्तों को नमन जिन्होंने हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करने के लिए अपने – अपने समय में महान कार्य किया । आज की सरकार को उन सभी दिव्यात्माओं को सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए हिंदी को यथार्थ स्वरूप में भारत की राष्ट्रभाषा बनाने हेतु ठोस कार्य करना चाहिए ।

वास्तव में आज के इस ऐतिहासिक दिन पर हमें अपने अपने स्तर पर यह प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि हम हिंदी में ही अपने हस्ताक्षर करेंगे , अंग्रेजी में नहीं । हमें इतिहास के पन्नों पर अंकित इन ऐतिहासिक दिवसों को स्मरण रखते हुए विशेष कार्यक्रमों के आयोजन भी करने चाहिए । जिससे कि हिंदी के प्रति लोगों में श्रद्धा और लगाव का भाव उत्पन्न हो । अपने ऐसे हिंदी प्रेमी राष्ट्र नायक व भारत रत्न पंडित मदन मोहन मालवीय जी को हृदय से नमन जिन्होंने अब से 109 वर्ष पूर्व पहली बार पूरे देश का एक राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन आयोजित किया था ।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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