स्वामी ओमानंद जी के संस्मरण
जि० मेरठ में सेवा गुरुकुल दयानन्द बाग शेरसा रोहतक तथा गुरुकुल बुकलाना तथा अध्ययन भी किया । इनकी शास्त्रार्थ करने तथा देखने में बहुत ही रुचि थी । इस लग्न में बाईबल तथा कुरान का भी अध्ययन किया । बाईबल का तो वह आचार्य बन गया । अच्छे अच्छे पादरियों को चुनौती दे देकर शास्त्रार्थों में इन्होंने हराया । ईसाइयों की शुद्धि भी की , महाराष्ट्र बारामती तथा शिमडेकर विहार आदिवासियों में ईसाइयों को शुद्ध करने के लिये । बहुत वर्ष कार्य किया । इस वीर ने हिन्दू – मुस्लिम झगड़े में बहुत ही महत्त्वपूर्ण कार्य हिन्दुओं की रक्षार्थ किया । वह लाठी , भाला , तलवार , बन्दुक , पिस्तौल आदि अस्त्र शस्त्र चलाने में निष्णात था । ” आर्य वीर ” दल ” शिविर लगाकर इनका प्रशिक्षण उसने सहस्रों वीरों को दिया । वह इतना निर्भीक और वीर साहसी था कि अकेला सहस्रों का मुकाबला करने के लिए मैदान में कूद पड़ता था । न जाने कितनी बार उसने डटकर इस प्रकार लाठी आदि से युद्ध किया , कई गुण्डे उसके हाथों परलोक सिधारे । वह सच्चा क्षत्रिय था , मृत्यु के साथ खेल करता था । चलता चलता लड़ाई मोल ले लेता था । अन्याय को वह सहन नहीं कर सकता था । इस प्रकार का वीर युवक मैंने अपने जीवन में दूसरा नहीं देखा ।
वह बहुत वर्ष मेरे साथ रहा , बहुत ही कर्मठ था , रात्रि दिवस कार्य करता वह थकता नहीं था । आराम को वह हराम समझता था । उसकी सबसे प्यारी वस्तु शस्त्र और सबसे प्रिय कार्य लड़ना । मैंने अनेक बार अपनी आँखों से उसे वीरतापूर्वक दुष्टों से लड़ते देखा । भयंकर कार्य करने में उसे बड़ा आनन्द आता था । हमारे पूर्वज कहते आये हैं कि मुसीबत ( दुःख ) को बुलाना नहीं चाहिए , आजाये तो घबराना नहीं चाहिये । किन्तु वह तो मुसीबत ( दुःखों ) को निमन्त्रण देकर बुलाता और फिर उनसे खूब टकराता था और भयंकर से भयंकर आपत्ति में भी वह नहीं घबराता था । उसे सन् १९४७ में गोली लगी जो उसके फेफड़े को पार करके कमर में निकल गई थी । स्वयं ही पट्टी बाँधकर मारोत ग्राम में पड़ा रहा । मैं उसे हस्पताल में ले जाने के लिए मोटर गाड़ी लेकर गया तो स्पष्ट निषेध कर दिया और कहा- मैं यहीं अच्छा हो जाऊँगा । मैं यदि हस्पताल में भरती हुआ तो आप पर ( लेखक पर ) कोई नई मुसीबत आ जायेगी । मेरी मुसीबत का तो उसे ध्यान था किन्तु अपनी जान ( प्राणों ) की उसे कोई चिन्ता नहीं थी । वहीं डाक्टर भेजकर मैंने उसकी मरहम पट्टी करवाई । अगले दिन समझा बुझाकर उसे बेरी के हस्पताल में चिकित्सार्थ भरती करवाया । डाक्टर अपना बहुत प्रेमी था । उसने जी जान से उसे बचाने की कोशिश की । एक दिन डाक्टर ने कहा- गोली ऐसी लगी है कि इसका बचना बहुत मुश्किल है । वह उसी समय हँसकर निर्भीकता से बोला- मैं इस समय मर ही नहीं सकता ।
वह कुछ समय पश्चात् अच्छा होकर कार्यक्षेत्र में आ कूदा । उसने गुरुकुल झज्जर की भी बहुत सेवा की । गुरुकुल ने भी उसके सेवा कार्य में सभी उपयुक्त साधन सामग्री जुटाई । वह हैदराबाद आर्य सत्याग्रह में जेल में प्रारम्भ से अन्त तक ही मेरे साथ रहा । हिन्दी सत्याग्रह पंजाब में कार्य भी खूब किया तथा जेल में भी पहुँच गया । उसने अपने जीवन में खूब बढ़ चढ़कर कार्य किया । वह लवण मिर्च मीठा बिल्कुल नहीं खाता था । जैसा मिलता वैसा खाकर सन्तुष्ट रहता । घी दूध मिलने पर खूब खाता था , देखने वाले आश्चर्य करते थे । उसमें एक भयंकर दोष था , उसकी वीरता मूर्खता का रूप धारण कर लेती थी । वह जब किसी साँप को देखता तो उसे पकड़ लेता था वा मार देता था । साँपों का शत्रु था और मित्र भी । उसने अपने आश्रम शिमडेगा बिहार में बहुत से साँप पकड़कर हांडियों में पाल रक्खे थे । मैंने उसे बहुत बार मना किया कि तुम सांप मत पकड़ा करो । कभी साँप के काटने से ही प्राण खो बैठोगे । हुआ भी यही , उसने एक भयंकर विषैले सर्प को पकड़कर अपने गले में डाल लिया और व्याख्यान देने लग गया । साँप के विषैले दांत भी वह नहीं तोड़ता था । उसे साँप ने दो बार काटा । वह सर्पविष की एक अच्छी औषध भी जानता था , जिसे वह चिकित्सा में प्रयोग करता था । बहुत से सर्पदंश के रोगी उसने उससे बचाए थे । किन्तु उस दिन उसकी मौत आगई । औषध उसने खाई भी , उसकी मौत हो गई और दूसरा साथी उसे उस समय संभालने वाला भी नहीं था । कुछ घण्टे पश्चात् यह अद्वितीय वीर मृत्यु की गहरी निद्रा में सदा के लिये सोगया । जब इसकी मृत्यु का समाचार मुझे मिला तो में हक्का बक्का रह गया । इस दुःख को मिटाने के लिए मैं कुछ दिन के लिए जम्मू कश्मीर की यात्रा पर चला गया । ऐसे वीर साथी को खोकर मैं अकेलापन अनुभव करने लगा । ऐसा मित्र साथी सहयोगी आज कहां है ? ईश्वरेच्छा बलीयसी । विस्तार से फिर कभी लिखूँगा ।
नोट :- हिन्दी सत्याग्रह के दौरान चौधरी रणवीर सांघी को झज्जर में काले झंडे इसी वीर ने दिखाए थे। उसके पश्चात तो जो उनके साथ हुआ सारा हरयाणा जानता है। दिल्ली स्थित गुरुकुल में ब्रह्मचारियों एवं मलेच्छो के बीच झगड़ा हुआ तो इसी वीर ने तथा आचार्य भगवान देव (ओमानंद जी महाराज) ने लाठी डंडे बजाकर सभी मलेच्छो को खदेड़ दिया। ऐसी चोट दी मलेच्छो ने फिर कभी गुरुकुल के ब्रह्मचारियों की तरफ आंख उठाकर नहीं देखा।
प्रस्तुति : सागर आर्य

लेखक सूचना का अधिकार व सामाजिक कार्यकर्ता है।