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वंदे मातरम पर बवाल क्यों ?

वंदे मातरम पर बवाल क्यों ? अध्याय 5

वन्देमातरम् की पृष्ठभूमि और बंकिम चंद्र चटर्जी

छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा औरंगजेब के शासनकाल में जिस ” हिंदवी स्वराज्य ” की स्थापना की गई थी, वह अपने चरम पर पहुंचा और एक दिन वह आया जब शिवाजी महाराज द्वारा आरंभ किए गए इस ‘ हिंदवी स्वराज्य ‘ के आंदोलन ने अपना रंग दिखाया तथा लगभग सारे भारत को ही मुग़लविहीन कर दिया। शिवाजी महाराज द्वारा प्रणीत यह आंदोलन बहुत बड़ी क्रांति करने में सफल हुआ था। जिसके परिणामस्वरूप देश की सनातन हिंदू वैदिक संस्कृति और शक्ति ने अपना दम भरा और भारतवर्ष को स्वाधीन कराने में सफलता प्राप्त की। परंतु यह स्वाधीनता हमारे लिए मृग-मरीचिका ही सिद्ध हुई। मुगलों को सत्ता से हटाया तो अंग्रेज आ गए। उसके बाद जो इतिहास लिखा गया, उसमें शिवाजी महाराज की इस क्रांति को इतिहास में उचित स्थान नहीं मिल पाया।

हमारे भीतर आशाओं का संचार बना रहा

सन १८१८ में पेशवा बाजीराव द्वितीय को अंग्रेजों ने तीसरे आंग्ल मराठा युद्ध के पश्चात सत्ता से हटा दिया और मराठा साम्राज्य का अंत कर सत्ता पर अपना अधिकार कर लिया।
वास्तव में यह मराठा शक्ति का पतन नहीं था, यह हिंदू शक्ति का पतन था। यह पतन भी कुछ इस प्रकार हुआ कि जब एक डकैत से देश ने मुक्ति पाई थी तभी दूसरे डकैत ने आकर के भारत के दीपक को बुझा दिया। अंग्रेजों ने पेशवा बाजीराव द्वितीय को पेंशन देकर कानपुर के निकट स्थित बिठूर भेज दिया था। यद्यपि इसके उपरांत भी हिंदू शक्ति अपनी खोई हुई स्वाधीनता की प्राप्ति के लिए संघर्ष करती रही। पूरे देश में राष्ट्रवादी परिवेश बना रहा। निराशा का कहीं कोई नाम नहीं था। लोग निरंतर संघर्ष कर रहे थे। देश के लोगों ने विदेशी सत्ता के विरुद्ध ३० से अधिक बार विद्रोह किया था। जो इस बात का प्रमाण है कि देश में निरंतर बेचैनी बनी रही और यह बेचैनी विदेशी शासन को देश से हटा देने को लेकर थी। हमने इन परिस्थितियों का जानबूझकर इसलिए उल्लेख किया है कि जून १८१८ में जो कुछ भी हुआ उसके उपरान्त भी हम मरे नहीं थे, हमारे भीतर आशाओं का संचार निरंतर जारी था। जब हमने औरंगजेब जैसे अत्याचारी शासक के शासनकाल में हार नहीं मानी तो अभी हार मानने की कौन सी आवश्यकता आ पड़ी थी ?

बंकिम चंद्र चटर्जी का आगमन

इसी बेचैनी के राष्ट्रवादी परिवेश में १८३८ ईस्वी में बंकिम चंद्र चटर्जी का जन्म हुआ। बंकिम चंद्र चटर्जी को १९ वीं शताब्दी के महानतम बंगाली लेखक, कवि, पत्रकार और उपन्यासकार के रूप में देखा जाता है। उनके भीतर राष्ट्रवाद कूट-कूट कर भरा था। उन्होंने अपनी रचनाओं से भी राष्ट्र, राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता का संदेश देने का पवित्र कार्य किया। उन्हीं के द्वारा वंदेमातरम गीत की रचना ७ नवंबर १८७५ को की गई थी। उनकी राष्ट्रवादी बौद्धिक प्रतिभा को देखकर ही लोगों ने उन्हें साहित्य सम्राट के रूप में सम्मान दिया है।
बंकिम चंद्र चटर्जी जैसे किसी भी लेखक के बारे में हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि ये ऐसे लोग होते हैं जो युग धर्म को समझते हैं और उसके अनुसार ही अपना साहित्य सृजन करते हैं। उस समय राष्ट्र को राष्ट्रवादी चिंतन की आवश्यकता थी। राष्ट्रवासियों को जगाना और उनके भीतर राष्ट्रवाद का संचार करना आवश्यक था। जमाने की इस आवश्यकता को बंकिम चंद्र चटर्जी ने गहराई से अनुभव किया। उन्होंने मां भारती के रूदन को देखा, समझा,उसको गहराई से अनुभव किया और लोगों को जगाने के एक साहित्यकार के धर्म को पहचान कर अपना साहित्य सृजन आरंभ किया।

‘ आनंदमठ ‘ और राष्ट्र जागरण

यही कारण है कि उनके साहित्य सृजन में और विशेष रूप से ‘ आनंदमठ’ जैसे कालजयी ग्रंथ में राष्ट्र जागरण का स्पष्ट आभास होता है। उनकी लेखनी ने अपने धर्म को पहचान कर वंदेमातरम का गीत रचा और एक दिन ऐसा आया जब इस गीत ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। बंकिम चंद्र चटर्जी ने बांग्ला साहित्य और राष्ट्रवाद को नई दिशा देने का कार्य किया उसे नई ऊंचाई थी और साथ ही बांग्ला साहित्य को एक सम्मानपूर्ण स्थान दिलाने में भी वह सफल रहे। हर व्यक्ति को उन्होंने भारत भूमि के प्रति समर्पित होने का शाश्वत संदेश दिया अर्थात हमारे वेदों और आर्ष साहित्य में चले आ रहे परंपरागत शाश्वत सनातन संदेश को उन्होंने पुनर्जीवन प्रदान किया। उनके द्वारा लिखा गया वंदेमातरम गीत वास्तव में संस्कृतनिष्ठ बंगाली में लिखा गया गीत है।
वास्तव में बंगाली या भारत की अन्य कोई भी प्रांतीय भाषा संस्कृतनिष्ठ ही मिलती है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि संस्कृत सभी भाषाओं की जननी होने के कारण भारत की सारी भाषाएं एक ही परिवार की भाषाएं हैं, जो हम सब के सम्मान की पात्र हैं। बंगाली को एक अलग भाषा मानने समझने से पहले हमें उसके संस्कृतनिष्ठ होने के भाव को समझने की आवश्यकता है। ऐसा करने से हम सब अपने राष्ट्र की परंपराओं के प्रति एकनिष्ठ हो सकते हैं।
बंकिम चंद्र चटर्जी नाम ‘ वंदेमातरम’ लिखा तो लोगों ने इसे हृदय से अपना समर्थन दिया। तत्कालीन भारत में अपने स्वाधीनता को लेकर जिस प्रकार की बेचैनी थी, उस बेचैनी को वंदेमातरम ने अभिव्यक्ति दी। वंदे मातरम के बारे में हमें यह भी समझना चाहिए कि जब बंकिम चंद्र चटर्जी ने इसे लिखा था तो उन्होंने इसका नाम बंदे मातरम दिया था। क्योंकि बंगाली में वकार को कोई स्थान नहीं दिया गया है। परंतु यदि इसका हम हिंदी उच्चारण करें तो इसे ‘ वंदे मातरम’ कहना ही उचित है।
लोगों ने भाषाई और प्रांतवाद की सीमाओं को तोड़कर एक दूसरे का हाथ-हाथ में लेकर साथ चलना स्वीकार किया। सबका लक्ष्य एक हो गया। सब की दिशा एक हो गई । सब की सोच एक हो गई और सबका गंतव्य एक हो गया। वास्तव में नारा वही सफल होता है जो सभी लोगों को एकता के सूत्र में पिरोने में सफल हो जाए। लोग उसके अनुसार आचरण करना सीख लें और जैसी उसकी भावना है, उसी के अनुरूप कार्य करना आरंभ कर दें। इसलिए सफल नारा लोगों के भीतर स्वाभिमान का भाव उत्पन्न करता है। देश – अभिमान पैदा करता है और कुव्यवस्था के प्रति उन्हें विद्रोही बनाता है। उन्हें समझाता है कि आत्मसम्मान के लिए तुम्हें लड़ना होगा। उठना होगा और लक्ष्य की प्राप्ति तक रुकना नहीं होगा।
विद्रोह निश्चित रूप से एक बुरी चीज है। परंतु जब यह खोए हुए आत्मसम्मान को पाने के लिए प्रचलित व्यवस्था के विरुद्ध अपनाया जाता है या किया जाता है तो यह पुण्य बन जाता है। क्योंकि उस समय ऐसे विद्रोह का लक्ष्य जनकल्याण और राष्ट्र कल्याण होता है। हमारे वेद ने हमको बताया है कि स्वराज्य दो दिशाओं में काम करता है। उसकी पहली दिशा का नाम जनकल्याण है और दूसरी दिशा का नाम विश्व कल्याण है। वेद ने जन कल्याण को ” जनभूतस्थ ” कहा है और विश्व कल्याण को ” विश्वभूतस्थ ” कहा है।

बंकिम चंद्र चटर्जी और स्वराज्य

बंकिम चंद्र चटर्जी स्वराज्य की जिस साधना का कार्य कर रहे थे वह भी हमें जन कल्याण और विश्व कल्याण के लिए प्रेरित कर रही थी। भारत के लोग सनातन परंपराओं में विश्वास रखते हैं। सनातन वह है जो पुरातन होकर भी अधुनातन रहता है। नवीन रहता है। उसमें कभी पुरानापन नहीं आता। उसका चिंतन पहले दिन भी वैज्ञानिक था, आज भी वैज्ञानिक है, आने वाले समय में भी अनंत काल तक वह वैज्ञानिक बना रहेगा। सनातन की इस मौलिक चेतना में स्वराज्य का चिंतन पहले दिन से है। इसलिए वंदेमातरम की परंपरा भारत की सनातन परंपरा है। यह परंपरा हम भारतीयों को पूर्वजों की ओर से सनातन धरोहर के रूप में प्राप्त हुई है। स्वराज्य और मातृभूमि के प्रति निष्ठा का भाव रखना हम भारतवासियों की मौलिक चेतना में समाहित है। इसलिए जब बंकिम चंद्र चटर्जी ने खोई हुई स्वाधीनता को प्राप्त करने के लिए वंदे मातरम का गीत प्रस्तुत किया तो पुण्य भूमि भारत पर निवास करने वाले सभी सनातनियों ने उसका हृदय से स्वागत किया।

” गॉड सेव द क्वीन ” और वंदे मातरम

उन दिनों अंग्रेजों ने ‘ गॉड सेव द क्वीन’ नाम का एक गीत लिखवाकर उसे भारत के लोगों के लिए और विशेष रूप से विद्यालयों या स्कूलों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं के लिए गाना अनिवार्य कर दिया था। अंग्रेजों की इस प्रकार की नीति को बंकिम चंद्र चटर्जी ने अपने देश के स्वाभिमान पर चोट समझा। देश के आत्म सम्मान को बचाने के लिए ही उन्होंने ७ नवंबर १८७५ को वंदे मातरम गीत लिखा।
बंकिम चंद्र चटर्जी ने अपने जीवन काल में बांग्ला भाषा में कुल १४ उपन्यास लिखे थे । जिनमें ‘आनंदमठ’, ‘कपालकुंडला’, और ‘विषबृक्ष’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
उनकी लेखन शैली बहुत लोकप्रिय हुई। जिससे उनके उपन्यास जन सामान्य ने भी पढ़ने आरंभ किये। इस प्रकार बांग्ला साहित्य को जनमानस तक पहुंचाने में उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया।

संन्यासी आंदोलन और वंदेमातरम

ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध उन दिनों संन्यासी आंदोलन चल रहा था। ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों को देश के संन्यासियों और फकीरों ने खुली चुनौती दे डाली थी। इस आंदोलन को सफल बनाने के लिए किसान और जमींदार भी संन्यासियों के साथ मैदान में उतर आए थे।
जिसके चलते आंदोलन ब्रिटिश सरकार के लिए जी का जंजाल बन चुका था। १७७० ईस्वी में बंगाल में जब भयानक अकाल पड़ा था तो उस समय ब्रिटिश सरकार ने अकाल पीड़ित लोगों के साथ जिस प्रकार की अत्याचार पूर्ण नीति का प्रदर्शन किया था, वह लोगों को रास नहीं आई थी। ‘विकिपीडिया’ के अनुसार उस काल में लगभग १ करोड लोग मारे गए थे, इसके उपरांत भी ब्रिटिश सरकार का हृदय नहीं पसीजा था। उस अकाल को पड़े अब लगभग सौ वर्ष हो गए थे। परंतु ब्रिटिश सरकार की नीतियां ज्यों की त्यों थीं। उनमें जनकल्याण की तनिक भी चिंता नहीं थी। यही कारण था कि हमारे हिंदू संन्यासी और मुस्लिम फकीर, किसान, मजदूर और जमींदार सब मिलकर ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध आंदोलनरत थे। ब्रिटिश सरकार के अत्याचारों से मुक्ति प्राप्त करना लोगों के लिए अनिवार्य हो गया था, जिसे देश के संन्यासी अपना नेतृत्व प्रदान कर रहे थे। ब्रिटिश सरकार हिंदुओं के तीर्थ स्थान पर भी अपना शिकंजा कस रही थी। जिसे लेकर साधु संन्यासियों में और भी अधिक रोष व्याप्त हो गया था। इन लोगों ने ‘ गोरिल्ला युद्ध नीति ‘ का सहारा लिया और अंग्रेजों के लिए एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी। अपनी ‘ गोरिल्ला युद्ध नीति’ के अंतर्गत ये लोग अंग्रेजों के गोदामों पर धावा बोलते थे और उन्हें लूटकर जंगलों की ओर भाग जाते थे।
राष्ट्रवादी चिंतनधारा के लेखक और कवि बंकिम चंद्र चटर्जी इन सभी घटनाओं को बड़े ध्यान से देख रहे थे। संन्यासियों की राष्ट्रवादी सोच ने उन्हें बहुत प्रभावित किया। वह इस बात से और भी अधिक प्रभावित थे कि संन्यासियों के साथ किसान, मजदूर, जमींदार सभी लगे हुए थे। तब उन्होंने इस राष्ट्रवादी आंदोलन को और भी अधिक गति देने के लिए अपनी लेखनी से इसका समर्थन किया। लोगों तक इस आंदोलन का संदेश देने का निर्णय उन्होंने लिया। अपनी इसी मानसिकता से प्रेरित होकर उन्होंने वंदेमातरम गीत की रचना की।

बंकिम चंद्र चटर्जी ने अपने उपन्यास ‘ आनंदमठ’ और ‘देवी चौधरानी’ में संन्यासियों के इस राष्ट्रवादी विद्रोह की घटनाओं का विशेष रूप से वर्णन किया। उन्होंने अपने उपन्यास आनंद मठ में ‘ वंदे मातरम ‘ का बार-बार प्रयोग किया है। उनकी भाषा शैली ने उनके इस उपन्यास को बहुत अधिक लोकप्रियता प्रदान की। जनसाधारण ने इसको पढ़ा और पढ़कर न केवल उन्होंने देश की विस्फोटक परिस्थितियों को समझा, अपितु वंदेमातरम को एक लोकप्रिय नारा भी बना दिया।
ब्रिटिश सरकार सन १८०० तक इस आंदोलन को लेकर लोगों पर बर्बर अत्याचार करती रही। इसके उपरांत भी लोग वंदे मातरम से ऊर्जा प्राप्त करते रहे और संतों, संन्यासियों, और फकीरों के अनुयायी मिलकर देश के लिए लड़ाई लड़ते रहे। तब किसी भी फकीर ने वंदे मातरम को लेकर कोई विरोध व्यक्त नहीं किया था। किसी भी फकीर के किसी अनुयायी ने वंदे मातरम को लेकर अपनी ओर से किसी प्रकार की आपत्ति दर्ज नहीं कराई थी। सबको वंदे मातरम स्वीकार था। इसका कारण केवल एक था कि सब की लड़ाई का उद्देश्य सांझा था। किसी के चिंतन में अपना देश अलग लेने या अपना कानून अलग चलाने की भावना नहीं थी। जब लोगों का उपदेश एक होता है तो छोटी बात पर सोचना यह एक दूसरे को नीचा दिखाने या एक दूसरे की भावनाओं का अपमान करने का विचार तक उनके भीतर नहीं आता है। सब एक दिशा में बढ़कर जब बड़े लक्ष्य के प्रति समर्पित हो जाते हैं तो केवल और केवल राष्ट्र के लिए काम किया जाता है। संप्रदाय और संप्रदाय की सोच या सांप्रदायिक मान्यताओं के प्रति विचार करने की भावना लोगों में लुप्त हो जाती है। यही वह स्थिति होती है जिसे राष्ट्रवाद का शुद्ध स्वरूप कहते हैं। जिसमें निजी सांप्रदायिक मान्यताएं लोगों की व्यक्तिगत मान्यताओं में परिवर्तित हो जाती हैं। उन्हें कभी भी सामूहिक लक्ष्य पर थोपने का प्रयास नहीं किया जाता।

डिप्टी मजिस्ट्रेट : बंकिम चंद्र चटर्जी

बंकिम चंद्र चटर्जी सिविल सेवा में डिप्टी मजिस्ट्रेट के रूप में कार्य कर रहे थे। सरकारी सेवाओं में रहकर राष्ट्रवादी लेखन करना उस समय एक बड़ी चुनौती थी। इसके उपरांत भी उन्होंने इस चुनौती को स्वीकार किया और अपने लेखनी धर्म का ईमानदारी से पालन किया। उन्होंने १८८२ में अपने उपन्यास ‘ आनंदमठ’ में अपने गीत ‘ वंदे मातरम’ को अंतर्निहित गीत के रूप में स्थान दिया। उनके इस गीत ने बड़ी संख्या में जनमानस को प्रभावित किया था। ८ अप्रैल १८९४ को इस राष्ट्रकवि का देहांत हो गया था।
विकिपीडिया के अनुसार “सन् २००३ में, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस द्वारा आयोजित एक अन्तरराष्ट्रीय सर्वेक्षण में, जिसमें उस समय तक के सबसे मशहूर दस गीतों का चयन करने के लिये दुनिया भर से लगभग ७,००० गीतों को चुना गया था और बी०बी०सी० के अनुसार १५५ देशों/द्वीप के लोगों ने इसमें मतदान किया था उसमें वन्दे मातरम् शीर्ष के १० गीतों में दूसरे स्थान पर था।”
भारतीय संविधान के ट्रस्ट १६७ पर व्यौहार राम मनोहर सिंह द्वारा चित्रित वंदेमातरम लिखा गया था।

डॉ राकेश कुमार आर्य
(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)

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