सत्यरानी चढ्ढा – दहेज विरोधी आंदोलन का मुखर चेहरा !

Satya_Rani_Chadha
  • लेखक – आर्य सागर

60 के दशक में दहेज निषेध अधिनियम बन गया लेकिन दहेज के लिए ससुराल पक्ष द्वारा जिंदा जलाई गई महिलाओं की हत्या को दहेज हत्या न मानकर उन्हें आत्महत्या या घरेलू अग्निकांड दुर्घटना का मामल मान लिया जाता क्योंकि दहेज निषेध अधिनियम में केवल विवाह के दौरान ही दी गई संपत्ति उपहार को दहेज माना गया था विवाह के पश्चात ऐसी किसी मांग या वस्तु को दहेज नहीं स्वीकार किया जाता था।

दशकों यूं ही बीत गए, 1980 के दशक में शहरी निम्न मध्यम वर्ग के घरेलू जीवन में लग्जरी माने जाने वाले इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद मनोरंजन के साधन टीवी वीसीआर फ्रिज आदि का प्रवेश हुआ।

लोगों की महत्वाकांक्षाएं बढ़ी, पश्चिमी समाज में जहां यह लग्ज़री उद्यम से अर्जित की जाती थी तो वहीं निम्न मध्यवर्गीय भारतीय समाज ने दहेज की लालच पुर्ण मांग से इन आवश्यकताओं की पूर्ति आवश्यक समझी, नतीजा 80 का दशक दहेज हत्या के काले अध्यायों से भरा हुआ है।

घटना 17 मार्च 1979 की दिल्ली की है एक पंजाबी अधेड़ आयु की महिला सत्यारानी चढ्ढा को अपनी 23 वर्षीय बेटी शशिबाला जो उस समय 6 माह की गर्भवती थी उसके ससुराल में खाना पकाते हुए जलने की सूचना मिलती है ।

शशि बाला 1 वर्ष पहले ही कॉलेज से ग्रेजुएट होकर निकली थी जो की बहुत होनहार बेटी थी।सत्यारानी चढ्ढा जब वहां पहुंचती है तो वह विस्मित हो जाती है, तमाम परिस्थिति साक्ष्य से यह स्पष्ट हो जाता है कि यह हादसा या आत्महत्या नहीं जघन्य हत्या का मामला है। जिस किसी ने भी चोट के निशानो से युक्त पूरी तरह जले हुए शव को देखा वह विचलित हो उठा।

सत्यरानी जी को ऐसे हादसे की पहली से ही आशंका थी उसका दामाद महिनो से से स्कूटर टीवी की मांग कर रहा था। सत्यरानी जी ने उसकी मांग को शांत करते हुए उसे ₹1000 भी दिए थे।

बेबस बेसुध सत्यरानी नजदीकी पुलिस थाने में गई ।जब उन्होंने पूरे प्रकरण को पुलिस को बताया तो पुलिस ने हाथ खड़े कर दिए और इस मामले को हादसा ही बताया कहा किस कानून में हम आपका अभियोग दर्ज करें? भारतीय दंड संहिता में ऐसे मामले को लेकर कोई प्रावधान ही नहीं है।

कानून की एक सूक्ति भी इस मामले में लागू होती है जहां राइट है वही रेमेडी होती है । 1980 तक ऐसे मामलों को लेकर पीड़ितों के पास कोई अधिकार ही नहीं था। सत्यरानी जी ने हार नहीं मानी उन्होंने देश की संसद से लेकर सर्वोच्च न्यायालय देश के शीर्ष राजनेताओं के घर पर धरना दिया धीरे-धीरे बहुत सी पीड़ित मातृशक्ति उनके इस अभियान में जुट गई और सुत्रपात हुआ दिल्ली में 1980 के दशक के सबसे प्रभावशाली दहेज विरोधी आंदोलन का । यह आंदोलन एक महिला ने चलाया एक ऐसी मां जिसने अपनी बेटी को न्याय दिलाने के लिए ना दिन देखा ना रात और भविष्य में अन्य बेटियों की न्याय प्राप्ति के मार्ग की भी वह प्रशास्ता बनी।

सत्यरानी चढ्ढा के आंदोलन का यह परिणाम हुआ। भारतीय दंड संहिता में 1983 में दहेज उत्पीड़न का ऐतिहासिक 498 ए सेक्शन जोड़ा गया वहीं इंडियन एविडेंस एक्ट में धारा 113 A भी जोड़ी गयी। इतना ही नहीं क्रिमिनल प्रोसीजर कोड में भी संशोधन किया गया किसी विवाहित महिला की विवाह के उपरांत यदि 7 वर्ष की अवधि के भीतर रहस्यमयी परिस्थिति में मौत होती है तो उसके शव का पोस्टमार्टम अनिवार्य कर दिया गया।

आप कल्पना कर सकते हैं 1980 से पहले भारतीय आपराधिक विधि क्रिमिनल लॉ में दहेज के मामलों को लेकर कोई प्रावधान नहीं था ना ही ऐसे मामलों की कोई स्पेसिफ इन्वेस्टीगेशन कोई प्रणाली थी।

एक संघर्षशील जुझारू मां ने पुरी न्यायपालिका कार्यपालिका विधायिका को सोचने पर मजबूर कर दिया । मैं अक्सर कहता हूं संस्थाएं नहीं व्यक्ति महान होता है व्यक्तियों ने संस्थाओं की स्थापना कि ही है ना की संस्थाओं ने किसी व्यक्तित्व का निर्माण किया।

व्यक्तित्व या व्यक्ति की शक्ति सबसे बढ़कर होती है।संस्थाएं व्यक्ति के कार्यों में सहयोगी मात्रा होती है। संसद, न्यायपालिका जैसी संवैधानिक संस्थाओं के रहते भी 1980 तक दहेज हत्या के मामलों को घरेलू अग्निकांड मान लिया जाता था।

माता सत्यवती के संघर्ष के कारण हजारों दहेज के लिए जलाई गई बहु बेटियों को न्याय मिला या मिल पा रहा है लेकिन सबसे दुखद इस मामले में यह रहा खुद सत्यरानी चड्ढा को अपनी बेटी के मामले में न्याय नहीं मिला जिन्होंने मामले को लेकर 34 वर्ष लंबी लड़ाई लड़ी । शशिबाला का पति गिरफ्तारी से बचकर फरार हो गया पुलिस उसे कभी गिरफ्तार ही नहीं कर सकी बाद में कुछ कानूनी तकनीकी बिंदुओं पर वह दोष सिद्ध नहीं हो पाया।

सत्यारानी चढ़ा जैसी माताएं बहुत दुर्लभ होती है । आज देश में महिला अपराधों के विरुद्ध कार्य करने वाले कितने व्यक्ति या खुद महिलाएं पूज्या सत्यरानी के पावन व्यक्तित्व से परिचित होगी। 84 वर्ष की आयु में वर्ष 2014 में ही सत्यरानी चढ्ढा का निधन हो गया अन्य पीड़ित माताओं के साथ मिलकर उन्होंने शक्ति शालिनी नामक एक एनजीओ की भी स्थापना ।किसी स्कूल कॉलेज न्यायिक गैर न्यायिक संस्था के सभागार में शायद ही कोई श्रद्धांजलि सभा विचार गोष्ठी ऐसी दिव्य महिला के लिए आयोजित की गई हो। जिसे खुद अपनी बेटी के मामले में अन्याय सहकर दूसरी दहेज उत्पीड़न या दहेज हत्या के मामलों में पीड़ित बेटी बहुओं लिए न्याय का मार्ग सरल कर दिया।

मेरा नमन उस महान विभूति को!

लेखक – आर्य सागर
तिलपता, ग्रेटर नोएडा

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