इतिहास का विकृतिकरण और नेहरू (अध्याय 5)

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यूरोप के तकनीकी ज्ञान की प्रशंसा – (अध्याय 5)

  • डॉ0 राकेश कुमार आर्य

प्रा चीन काल में भारत का वैदिक धर्म सर्वत्र सारे भूमंडल पर छाया हुआ था। येद ज्ञान के सूर्य की किरणें सर्वत्र अपना प्रकाश फैलाती थीं। भारत के ऋषियों के उपदेश संपूर्ण विश्व के लोगों का मार्गदर्शन किया करते थे। कहीं पर भी अव्यवस्था नहीं थी। सर्वत्र शांति थी। सब लोग एक दूसरे के साथ मिलकर रहने में आनंद की अनुभूति करते थे। जब भारत में धर्म को लेकर विभिन्न संप्रदायों ने और उनके मठाधीशों ने अपने आप को धर्म का ठेकेदार घोषित करना आरंभ किया तो धर्म की स्थिति पतित हुई। धर्म की स्थिति को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए ऋषि मंडल की बैठक हुई। जिसमें यह निर्णय लिया गया कि अब मानव जाति का एक राजा होना चाहिए। जिसके पास धर्म के स्वरूप को बनाए रखने के लिए दंड देने की राज शक्ति होनी चाहिए। तब राजाओं ने मनु महाराज को मानव जाति का पहला राजा बनाया। धर्म की अर्थात नीति और न्याय की व्यवस्था को सुव्यवस्थित बनाए रखने के लिए मनु महाराज ने मनुस्मृति का निर्माण किया। मनुस्मृति के माध्यम से हमारे अनेक सम्राटों ने दीर्घकाल तक मानव जाति का कल्याण किया। परंतु धीरे-धीरे इस व्यवस्था में भी घुन लगने लगा। अहंकार के वशीभूत होकर विश्व का सबसे पहले विश्व युद्ध अर्थात महाभारत हुआ।

इसका परिणाम यह हुआ कि भारत विभिन्न मत-मतांतरों और संप्रदायों में विभक्त होता चला गया। धीरे-धीरे विश्व में भी विभिन्न मत स्थापित होने आरंभ हुए। ईसाई मत की स्थापना भारत के वैदिक धर्म की इसी पतित स्थिति का परिणाम थी। भारत के लोगों को नए-नए बने ईसाइयों ने संसार के विभिन्न क्षेत्रों में चुन-चुनकर मारना आरंभ कर दिया। जो लोग भारतीय संस्कृति, भारतीय परंपरा और भारतीय धर्म में विश्वास रखते थे, उन पर भी अनेक प्रकार के अत्याचार किए जाने लगे। ऐसी परिस्थितियों में भारत के लोगों ने विदेश यात्राओं को करना बंद कर दिया। क्योंकि अब ये परदेशों में अपने आप को सुरक्षित नहीं देखते थे। समुद्री यात्राओं के माध्यम से परदेश जाना अब प्राणलेवा भी हो सकता था।

इतिहास के इस सच को ईसाई, मुस्लिम, कम्युनिस्ट और कांग्रेसी इतिहासकारों ने इस प्रकार से नहीं लिखा है। समुद्री यात्रा पर प्रतिबंध लगाने की भारत के लोगों की सच्चाई को छुपा कर उन्होंने इसे इस प्रकार दिखाने का प्रयास किया है कि भारत के लोग कृपमंडूक थे। अनेक प्रकार के अंधविश्वासों में फंसे हुए थे। उन्हें विदेश की यात्रा करना भी धर्म के विरुद्ध लगता था। अतः भारत के लोगों का वैदिक धर्म पाखंडी अंधविश्वासी धर्म है। यह खुली हवा में सांस लेना मानव के लिए उचित नहीं मानता। इसका अभिप्राय है कि नेहरू जी की दृष्टि में वैदिक धर्म मानव की स्वतंत्रता का विरोधी था। उनकी मान्यता थी कि वैदिक धर्म व्यक्ति को रूढ़िवादी और परंपरावादी बनाता है। जिससे वह आधुनिकता के साथ जुड़कर आगे नहीं बढ़ सकता।

नेहरू जी जैसे विद्वान लेखक के द्वारा किए गए इस प्रकार के दुष्प्रचार का परिणाम यह हुआ कि भारत की आज की पीढ़ी अपने ही बारे में यह समझ बैठी है कि हमारे पूर्वज बड़े मूर्ख, अज्ञानी और अंधविश्वासी थे, जो धर्म के फेर में फंसकर प्रगतिशील संसार के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने में भारी चूक कर गये। नेहरू जी की हिंदुस्तान की कहानी ने भी इसी प्रकार के दुष्प्रचार में सम्मिलित होकर भारत के बारे में गलत जानकारी देने का कार्य किया है।

भारत अंग्रेजों के आने तक भी तकनीक के क्षेत्र में पीछे नहीं था। मुगलों और तुकों के शासनकाल में भी और उससे पहले ईसाइयत के जन्म के पश्चात भी अनेक ऐसे आविष्कार भारत के लोगों ने किये, जिनसे संसार लाभान्वित हुआ। परंतु नेहरू जी इस बात से असहमत दिखाई देते हैं। वह हिंदुस्तान की कहानी के पृष्ठ संख्या 60 पर लिखते हैं कि-

“तकनीक की दौड़ में वह (भारत) पीछे पड़ गया और यूरोप जो बहुत जमाने से कई बातों में पिछड़ा हुआ था, तकनीकी तरक्की में नेता बन बैठा।”

हमारे मत में ऐसा नहीं था कि ईसाइयत के जन्म के पश्चात ही यूरोप तकनीकी तरक्की का नेता बना। उसके लिए यह तव संभव हुआ जब उसने विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में लूट मचाई, अनेक देशों के आर्थिक संसाधनों पर अपना कब्जा किया। भारत के ज्ञान-विज्ञान को चुराकर विभिन्न क्षेत्रों में जो उन्नति की, उसे उसकी मौलिक उन्नति नहीं कहा जा सकता।

भारत को ईसाई मत में विश्वास रखने वाले लोगों ने पूरा बल लगाकर उन्नति और प्रगति की दौड़ में पीछे छोड़ने का गंभीर षड़यंत्र रचा। संसार भर में फैली वैदिक शोधशालाओं (जो कि सामान्यतः मंदिरों में ही हुआ करती थीं) को नष्ट-भ्रष्ट किया गया या उनका ईसाईकरण किया गया। संसार भर में फैले हुए वैदिक मतावलंबियों का धर्मांतरण कर उन्हें ईसाई बनाया गया। कालान्तर में जब इस्लाम को मानने वाले लोगों ने अपने मत का प्रचार-प्रसार करना आरंभकिया तो उनका निशाना भी वैदिक धर्मावलंबी लोग ही बने ।

ईसाई लोगों को नेहरू जी कुछ इस प्रकार वर्णित करते हैं कि वह प्रारंभ से ही विज्ञान के दीवाने थे। यूरोप की तरक्की के पीछे नेहरू जी “विज्ञान की भावना को ही देखते हैं। दूसरे देशों को लूटने और वहां के आर्थिक संसाधनों पर अपना एकाधिकार स्थापित करने की यूरोप के लोगों की अनुचित और अमानवीय सोच को सही संदर्भमें प्रस्तुत न करके नेहरू जी इसे उनकी बुदबुदाती हुई जिंदगी” कहते हैं। जिसने अपने को बहुत से क्षेत्रों में खोज की साहसी यात्राओं में जाहिर किया था। यह कहते हैं कि नई तकनीक की जानकारी ने यूरोप के देशों की फौजी ताकत को बहुत बढ़ाया और उनके लिए यह मुमकिन हो गया कि पूरब में फैलकर वे वहां के मुल्कों पर कब्जा कर सकें।

छल फरेब और रक्तपात की यूरोप की इस सैनिक शक्ति को भी नेहरू जी ने बहुत हल्के में प्रस्तुत कर दिया है। जबकि यूरोप की इस प्रकार की नीतियों की उन जैसे गांधीवादी लेखक के द्वारा आलोचना की जानी चाहिए थी। इसके साथ-साथ भारत की अहिंसावादी और मानवतावादी सोच की तुलना करते हुए उसे यूरोप की अनैतिक और अवैधानिक भावना के समक्ष श्रेष्ठ सिद्ध करना चाहिए था।

भारत के प्राचीन समाज के लोग जिस प्रकार दूर-दूर जाकर अपना व्यापार किया करते थे, उसके बारे में नेहरू जी कहते हैं कि-

” अब उनकी वह जोशीली भावना ‘एक संकीर्ण कट्टरता बनकर रह गई, जो समुद्र की यात्रा तक की मनाही कर देती है। जिज्ञासा की तर्कपूर्ण भावना, जिसे हम पुराने जमाने में बराबर पाते हैं और जिसकी वजह से विज्ञान की और भी तरक्की हो सकती थी, तर्कहीनता और अंधविश्वास में बदल जाती है। हिंदुस्तानी जिंदगी की धार मंद पड़ जाती है। मुर्दा सदियों के बोझ को जैसे-तैसे ढोते हुए लोग मानो गुजरे हुए जमाने में ही रहते हैं। गुजरे हुए जमाने का भारी बोझ उसे कुचल देता है और उस पर एक तरह की बेहोशी छा जाती है। मानसिक मृद्रता और शारीरिक थकान की ऐसी हालत में हिंदुस्तान का हास हुआ। यह कोई अचरज की बात नहीं और इस तरह यह जहां का तहां रह गया, जबकि दुनिया के और हिस्से आगे बढ़ गए।”

इस संदर्भ में हमें एलफिंस्टन के इस उद्धरण पर विचार करना चाहिए। उन्होंने अपने भारत का इतिहास के पृष्ठ 375-381 पर कहा है कि-

“भारत में इंग्लैंड की अपेक्षा अपराधियों की संख्या बहुत कम है। 1832 में हाउस ऑफ कॉमंस में प्रस्तुत रिपोर्ट में कहा गया कि पिछले वर्षों के औसत के आधार पर इंग्लैंड व वेल्स दोनों को मिलाकर 2,03,281 लोगों के पीछे एक व्यक्ति और बंगाल प्रेसीडेंसी के प्रांत में 10,04,182 के पीछे एक व्यक्ति को मृत्युदंड दिया गया। इंग्लैंड में वर्ष भर में 1,232 लोगों को और बंगाल में केवल 59 लोगों को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई। इंग्लैंड की जनसंख्या एक करोड़ 30 लाख और बंगाल की 6 करोड़ है। महान डार्विन को पोर्ट लुई में हिंदू अपराधियों को देखकर आश्चर्य हुआ कि यह बहुत ही अच्छे दिखते हैं। वह कहते हैं कि ये लोग प्रायः शांत और सदव्यवहारी हैं। उनके बाह्य आचरण, उनकी स्वच्छता और उनके आश्चर्यजनक धार्मिक कृत्यों के कारण उन्हें इस दृष्टि से देखा जाना असंभव है, जिससे न्यू साउथ वेल्स के अपराधियों को।”

इससे स्पष्ट है कि 1832 तक भी भारत ब्रिटेन या यूरोप के लोगों की अपेक्षा बहुत अधिक श्रेष्ठ था। दूसरों के धन पर अधिकार करना या दूसरों के विरुद्ध अनैतिकता का प्रदर्शन करना भारत अपराध मानता था। यूरोप अपराधी था। जिसने दुनिया को लूटना आरंभकिया था। अपनी ताकत के बल पर उसने अपनी लूट को अपनी वीरता में परिवर्तित करके लिखवा दिया तो इसका अभिप्राय यह नहीं कि उसका अपराध समाप्त हो गया। अपराधियों के भीतर कभी वीरता नहीं होती। वे क्रूर और निर्दयी होते हैं। नेहरू जी की लेखनी कभी यह साहस नहीं कर पाई कि वह लुटेरे अपराधी को अपराधी कह सकते। उन्होंने यूरोप के सुर में सुर मिलाया और उसकी निर्दयता का गुणगान करना आरंभ कर दिया, जबकि भारत की आत्मिक नैतिकता और शांति की भावना की उपेक्षा कर गए।

अपनी इसी प्रकार की सोच के अंतर्गत नेहरू जी ने रूस और चीन के लोगों की इस बात के लिए प्रशंसा की है कि वह नए जोश और नई सोच के साथ आगे बढ़ने के लिए तत्पर हैं। नेहरू जी क्रांति के नाम पर की गई करोड़ों लोगों की हत्याओं के अपराध को रूस और चीन के संदर्भ में क्षमा कर देते हैं। इतना ही नहीं, उनके इस प्रकार के दानवीय कृत्यों का वह यह कहकर भी महिमामंडन करते हैं कि जो जिंदा कीमें होती हैं वे आगे बढ़ने का फैसला करती हैं और अपने आप को तरक्की की दीड़ में श्रेष्ठ सिद्ध करके ही रुकती हैं। इस प्रकार नेहरू जी दानव और मानव के बीच भेद नहीं कर पाए। जिस दानवः को फांसी चढ़ा दी जानी चाहिए थी, उसका भी यह गुणगान करने लगे। उसी का यह परिणाम हुआ कि भारत ने स्वाधीनता के पश्चात नेहरू जी के नेतृत्व में दानवीय शक्तियों का गुणगान करना आरंभ क दिया। “जो जीतेगा, वही सिकंदर कहलाएगा” जब इतिहास का लेखन इस दृष्टिकोण से किया जाता है तो आतंकवादी सोच के लोगों क मनोबल बढ़ता है और वे यह सोचकर अपने कार्य में लग जाते हैं कि आज चाहे लोग उन्हें आतंकवादी या अपराधी कहें परंतु आने वाले समय में उनका भी एक दिन गुणगान होना निश्चित है। इससे समाज और राष्ट्र में अराजकता फैलती है। कांग्रेस के शासनकाल में देश में आतंकवाद के बढ़ने का एक कारण यह भी रहा कि भारत के लोगों को नेहरूवादी दृष्टिकोण से इतिहास पढ़ाया गया।

क्रमशः

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