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वैदिक संपत्ति

वैदिक संपत्ति 266 – आर्य गृह, ग्राम और नगर

(ये लेखमाला हम पं. रघुनंदन शर्मा जी की ‘वैदिक सम्पत्ति’ नामक पुस्तक के आधार पर सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहें हैं)

प्रस्तुतिः देवेन्द्र सिंह आर्य
(चेयरमैन ‘उगता भारत”)

गतांक से आगे ….

पशु भी आर्य गृहस्थी की प्रधान सामग्री हैं। इसीलिए वेदों में पशुओं की प्राप्ति के लिए सैकड़ों प्रार्थनाओं का वर्णन है। क्योंकि आर्यसभ्यता में पशुओं से छै प्रकार का काम लिया जाता है। अर्थात् आर्यों के पशु भोजन, वस्त्र, खेती, सवारी, पहरा और सफाई का काम देते हैं। गाय, भैंस, बकरी और भेड़ी से दूधघृतादि खाद्य पदार्थ प्राप्त होते हैं। भेड़ी और बकरियों से वस्त्रों के लिए ऊन प्राप्त होती है। बैल, भेस, ऊँट घोड़े, गधे और हाथी से सवारी बारबरदारी और खेतों के जोतने तथा सींचने का काम लिया जाता है। कुत्ता पहरा देता है और सुवर सफाई का काम करता है। इसलिए आर्य गृहस्थी में पशुओं का बड़ा महत्व है।

आर्य गृहस्थी में रोशनी भी प्रधान वस्तु है। क्योंकि आर्य सभ्यता में दीपदान का बड़ा महत्व है। जहाँ अतिथि षोडशोपचार गिनाये गये हैं, वहाँ अतिथिपूजा में दीपदान भी रक्खा गया है। इसके सिवा आयों का कोई भी धार्मिक कृत्य प्रारंभ नहीं होता, जब तक दीपक न जला लिया जाय। इसलिए दिन के समय में दीपक जलाया जाता है। आार्यों का दीपक सदैव घी से ही जलाया जाता है। घृत की रोशनी के समान नेत्र को सुख देनेवाली कोई दूसरी रोशनी नहीं है। इसलिए आर्य गृहस्थों में अन्धकार को दूर करनेवाला दीपक आवश्यक समझा गया है।

आर्य गृहस्थी में औषधियों का संग्रह भी आवश्यक है। पर इसका यह तात्पर्य नहीं है कि आर्यों को सदैव औषधियों का सेवन करना चाहिए । औषधियों के संग्रह का कारण इतना ही है कि न मालूम किस समय कैसी दुर्घटना हो जाय और औषधि की आवश्यकता पड़ जाय। क्योकि ग्रहस्य को इस प्रकार के प्रसंग आया ही करते हैं, जिनमें तुरन्त ही औषधी की आवश्यकता पड़ जाती है। इसलिए ऐसी औषधियाँ जो तुरन्त नहीं बन सकती और जिनकी आवश्यकता तुरन्त ही पड़ती है, उनका आर्य-गृहस्थी में अवश्य संग्रह रहना चाहिये । यद्यपि आयुर्वेदशास्त्र का यही मतलब है कि कोई कभी बीमार न हो। क्योंकि आयुर्वेद कहते ही उस विद्या को हैं, जो बीमारियों से बचने का ज्ञान देती है, तथापि दुर्देव के कारण शरीर में चोट लगने से, थक जाने से और मलों के संचय हो जाने से जो अस्वस्थता उत्पन्न हो जाती है, उसका उपाय करना पड़ता है। चोट लगने से, किसी अङ्ग के टूट फूट जाने से जो अस्वस्थता होती है, उसमें दर्दी की देखभाल, सेवाशुश्रूषा और मरहम पट्टी से ही आराम पहुँचता है, दवा दारू से नहीं । इसी तरह थकावट से जो अस्वस्थता होती है, उसमें भी आराम करने से ही लाभ होता है, औषधि से नहीं। किन्तु जो अस्वस्थता रोगों के कारण होती है, उसमें कुछ विलक्षण उपचारों की आवश्यकता होती है। क्योंकि माधव ने अपने निदान में लिखा है कि सर्वेषामेव रोगणां निदानं कुपिता मलाः अर्थात् समस्त रोग मलों के संचय ही से उत्पन्न होते हैं और यह संचित मल ही कभी कफ होकर, कभी अतिसार होकर, कभी फोड़ा फुनसी बनकर और कभी ज्वर तथा वमन के रूप में परिणत होकर नाना प्रकार के रोगों के नामों से प्रकट होते हैं। इसलिए इन मल-जन्य रोगों को चार उपायों से दूर किया जाता है। चरकाचार्य कहते हैं कि-

पाचनान्युपवासश्च व्यायामश्चति लङ्‌घनम् ।
चतुष्प्रकारा संशुद्धिर्वमनञ्च विरेचनम् ।।

अर्थात् पाचक पदार्थों के खाने, उपवास, व्यायाम और लङ्घन के करने तथा बमन और विरेचन का प्रयोग करने से मलों की शुद्धि हो जाती है। इन उपचारों में फलोपवास, लङ्घन और वमनविरेचनों को सभी जानते हैं, परन्तु आर्यसभ्यता में मलों की शुद्धि का एक दूसरा ही उपाय बतलाया गया है, जिसे प्रायः लोग भूल गये हैं। वह तरीका प्राणायाम है। प्राणायाम का गुण वर्णन करते हुए मनु भगवान् कहते हैं कि –

दह्यन्ते ध्मायमानानां बातूनी हि यथा मलाः I
तयेन्द्रियाणां वह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात् ।।

अर्थात् जिस प्रकार अग्नि में तपाने से घातुधों के मल नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार प्राणायाम करने से इन्द्रियों के दोष नष्ट हो जाते हैं। इसलिए यद्यपि नित्य प्राणायाम करनेवाले फलाहारी आर्यों के शरीरों में मलों का संचय नहीं होता, तथापि कभी कभी अचानक ही सान्निपातिक रोगों का आक्रमण हो जाता है, जिससे मृत्यु की आशङ्का उत्पन्न हो जाती है। अतएव चतुर वैद्यों से अच्छी औषधियों को लेकर अवश्य अपने घरों में रख छोड़ना चाहिये ।

आर्य-गृहस्थी में पुस्तकों का भी बड़ा महत्व है। इसलिए प्रत्येक आर्य के घर में वेद, वेदों के अङ्ग, उपाङ्ग, स्मृतियाँ, दर्शन, इतिहास और अन्य ऐसे ही ज्ञान विज्ञान को बढ़ानेवाली पुस्तकें होना चाहिये । पर व्यर्थ बकवास करनेवाली और ज्ञान के स्थान में अज्ञान को फैलानेवाली तथा मनुष्यों की रुचियों को तामस बनानेवाली पुस्तकें न होना चाहिये । क्योंकि उच्च कोटि के थोड़े से भी ग्रन्य ज्ञानवृद्धि में जो सहायता करते हैं, उतनी सहायता अनिश्चित सिद्धांतों के प्रचार करनेवाले हजारों ग्रन्थ भी नहीं कर सकते। ऋषियों के लिखे हुए सौ पचास ग्रन्थों के अवलोकन करने से ही जो ज्ञान में स्थिरता होती है, वह बड़े बड़े पुस्तकालयों की हजारों पुस्तकों के पढ़ने से भी नहीं होती । इसीलिए शास्त्र में अनिश्चित सिद्धांतों का संग्रह करना मना किया गया है। सांख्यशास्त्र 1/26 में कपिलाचार्य कहते हैं कि अनियतत्वेऽवि नायौक्तिकस्य सं ग्रहोऽन्यथा बालोन्मत्तादितमत्वम् अर्थात् बालकों और उन्मत्तों के समान अनिश्चत और युक्तिहीन बातों का संग्रह करना व्यर्थ है। इसलिए ग्रन्थ वही संग्रह करने योग्य हैं, जो सनातन सिद्धांतों का अखण्ड रूप से प्रचार करते हों और प्राणियों को इस लोक और परलोक में सुख पहुँचाने की विधि और मुक्ति की शिक्षा देते हों।

क्रमशः

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