सत्य के ग्रहण तथा अन्धविश्वासों के त्याग में ही जीवन की सार्थकता है

ved-rishi

– मनमोहन कुमार आर्य

मनुष्य को मनुष्य का जन्म ज्ञान की प्राप्ति तथा उसके अनुसार आचरण करने के लिये मिला है। यदि मनुष्य सत्यज्ञान की प्राप्ति के लिये प्रयत्न नहीं करता तो उसका अज्ञान व अन्धविश्वासों में फंस जाना सम्भव होता है। अज्ञानी मनुष्य अपने जीवन में लौकिक एवं पारलौकिक उन्नति नहीं कर सकते। सत्यज्ञान को अप्राप्त मनुष्य अज्ञानता के कारण अन्धविश्वासों में फंस जाते हंै जिससे उनकी अवनति होती है। मनुष्य जीवन हमें सत्यासत्य को जानने व मनन करने के लिये परमात्मा से मिला है। हम मनुष्य इसीलिये कहलाते हैं कि हम मननशील अर्थात् सत्यासत्य का विचार करने वाले होते हैं। परमात्मा ने हमें मन व बुद्धि दी है जिससे हम मनन व सत्यासत्य का निर्णय कर सकते हैं। इसके लिये हमें विद्वानों, जो सत्यज्ञान के वाहक व पोषक हों, उनकी संगति करनी चाहिये और उनकी शिक्षाओं व उपदेशों को जानकर इसके अनुसार ही जीवनयापन करना चाहिये। असत्य व अज्ञान से मुक्त होने का एक उपाय यह भी होता है कि हम वेद व वैदिक साहित्य जिसमें उपनिषद, दर्शन, विशुद्ध-मनुस्मृति तथा सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थ सम्मिलित हैं, उनका नित्यप्रति स्वाध्याय वा अध्ययन करें। हम जिस बात को भी स्वीकार करें वह सृष्टिक्रम के अनुकूल तथा तर्क एवं युक्ति से सिद्ध होनी चाहिये। उपनिषद एवं दर्शन आदि ग्रन्थों की सभी बातें प्रायः वेदानुकूल व बुद्धिसंगत होने के कारण जानने व आचरण करने योग्य हैं।

हमें ध्यान देना चाहिये कि हम जिस शास्त्रीय ग्रन्थ का जिस किसी विद्वान का अनुवाद व टीका पढ़ते हैं वह निष्पक्ष हो, पूर्ण ज्ञानी हो एवं किसी मत विशेष का आग्रही न हो। इसके विपरीत जो विद्वान अकाट्य तर्कों से सिद्ध सत्य सिद्धान्तों को मानते हों, उन विद्वानों के अनुवाद व टीकायें ही पढ़ने योग्य होती हैं। संसार में ऐसे भी ग्रन्थ व उनकी टीकायें हैं जिसमें किसी विशेष विचारधारा का पोषण किया गया है परन्तु वह पूर्ण सत्य पर आधारित नहीं हैं। ऋषि दयानन्द ने ऐसे सभी मतों व उनके ग्रन्थों की मान्यताओं की सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ में समीक्षा कर उसके वेदानुकूल न होने वा ज्ञान व सत्य सिद्धान्तों के विपरीत होने की पुष्टि व संकेत किये हैं। उन्होंने सत्यार्थप्रकाश में सत्य मान्यताओं के पक्ष में तर्क व युक्तियां भी दी हैं और असत्य का खण्डन करते हुए भी तर्क एवं युक्तियों का सहारा लिया है। सत्यासत्य का निर्णय करने के लिये उनका बनाया ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश संसार का विशेष ग्रन्थ है जिसका अध्ययन करने से मनुष्य अविद्या व अज्ञान से दूर हो सकता है और उसका जीवन व परजन्म सत्य पर आधारित होने से सुधरता व सम्वरता हैं। अतः ज्ञान प्राप्ति व उन्नति के अभिलाषी मनुष्यों को सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ का अध्ययन निष्पक्ष होकर अवश्य ही करना चाहिये। किसी मान्यता को मानना व न मानना मनुष्य के अपने अधिकार में होता है। यदि सत्यार्थप्रकाश की किसी बात पर किसी को संदेह भी होता है तो उसका समाधान उस मनुष्य को अन्य विद्वानों से करा लेना चाहिये। ऐसा करने से मनुष्य सत्य ज्ञान को प्राप्त होकर अज्ञान, अन्धविश्वासों तथा कुरीतियों वा मिथ्या परम्पराओं आदि के आचरण से बच जाता है और ऐसा करने से उसके जीवन में पुण्य व शुभ कर्मों की वृद्धि होकर जीवन में सुख व यश की वृद्धि होती है। ऐसा करने से एक साधारण पठित मनुष्य भी ज्ञानी, पुरोहित, लेखक, विद्वान, उपदेशक व आचार्य बन जाता है। यही सत्य ज्ञान की प्राप्ति व सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों के अध्ययन से लाभ होता है। संसार में देखने को मिलता है कि जिन मनुष्यों ने सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ को पढ़ा व समझा है, वह अज्ञान व अन्धविश्वासों में नहीं फंसते और दूसरों को भी अन्धविश्वास छोड़ने के लिये प्रेरित करते रहते हैं। सत्यार्थप्रकाश पढ़कर मनुष्य विधर्मियों के षडयन्त्रों से भी परिचित हो जाता है। उसे ज्ञात हो जाता है कि अतीत में विधर्मियों ने आर्य हिन्दुओं वा वैदिक धर्मावलम्बी बन्धुओं पर कैसे कैसे अत्याचार व अन्याय किये हैं। सत्यार्थप्रकाश का पाठक वैदिक धर्म की श्रेष्ठता के प्रति आश्वस्त होता है और इतर किसी भी विचारधारा में निहित सत्य व असत्य से यथार्थरूप में परिचित होता है जिसको छल व बल से स्वधर्म पालन से विमुख नहीं किया जा सकता।

संसार में अज्ञान व अन्धविश्वास दूर करने का सबसे बड़ा साधन यदि कोई है तो वह हमें सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ ही प्रतीत होता है। सत्यार्थप्रकाश में मनुष्य जीवन संबंधी सभी कर्तव्यों का भी वेदों के आधार पर पोषण किया गया है। माता, पिता, आचार्यों, राजा व राज्याधिकारियों सहित नागरिकों के कर्तव्यों आदि सहित वैदिक जीवन शैली पर भी सत्यार्थप्रकाश में प्रकाश पड़ता है। सभी वैदिक मान्यताओं का पोषण सत्यार्थप्रकाश में तर्क एवं युक्तियों से हुआ है। सत्यार्थप्रकाश पढ़ लेने पर पाठकों को वैदिक धर्म की सभी मान्यतायें सत्य अनुभव होती हैं और इनके विपरीत सभी मान्यताओं व परम्रायें असत्य व अज्ञान पर आधारित सिद्ध होती है। हमने भी सत्यार्थप्रकाश को पढ़कर उसकी मान्यताओं के सत्य व वेदानुकूल होने के कारण ही अपनी वेद विपरीत मान्यताओं व परम्पराओं को छोड़ा है तथा वैदिक परम्पराओं को ग्रहण किया है। हमने सत्यार्थप्रकाश पढ़कर तथा वैदिक विद्वानों के उपदेशों को सुनकर जड़ मूर्तिपूजा, ईश्वर के अवतार की मान्यता, मृतक श्राद्ध तथा फलित ज्योतिष को मानना छोड़ दिया। इसका कारण यह था कि इन मान्यताओं व परम्पराओं की नींव सत्य पर नहीं है। जन्मना जातिवाद, ऊंच-नीच तथा छुआछूत आदि का व्यवहार भी वेदविरुद्ध तथा मानवजाति के लिये अभिशाप हैं। इसे भी हम सत्यार्थप्रकाश की शिक्षाओं को जानकर ही छोड़ सके हैं। सत्यार्थप्रकाश से ही हम निर्णय कर सके कि वैदिक धर्म ही ईश्वर से आविर्भूत है और इसकी सभी शिक्षायें पूर्ण सत्य पर आधारित हैं। इनके मानने से ही मनुष्य जीवन की लौकिक व पारलौकिक उन्नति होती है। अतः इसे जानकर व उसका आचरण कर ही हम जीवन में सन्तुष्ट हैं। हमें सत्यार्थप्रकाश से ईश्वर, जीवात्मा तथा प्रकृति का सत्यस्वरूप जानने का अवसर मिला। हमारी सभी शंकाओं का समाधान हुआ तथा ईश्वर की उपासना की विधि भी ज्ञात हुई। मनुष्य के लिये शुद्ध गोघृत एवं ओषधियों आदि से देवयज्ञ अग्निहोत्र करना आवश्यक कर्तव्य व धर्म है। इसे करके मनुष्य अपने भावी जीवन में पापों से मुक्त रहता है। ईश्वरोपासना तथा देवयज्ञ करने का परिणाम सुख की प्राप्ति होता है जिससे परजन्म में भी कल्याण होता है। अतः कल्याण के इच्छुक मनुष्यों को सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन अवश्य कर लाभ उठाना चाहिये और अपने जीवन को ईश्वर आज्ञा सहित आत्मा में होने वाली उसकी प्रेरणाओं के अनुरूप व अनुकूूल बनाना चाहिये। ऐसा करने से ही मनुष्य जीवन का कल्याण होता है।

हम देख रहे हैं कि आज का समाज अन्धविश्वासों और नास्तिकता के विचारों से युक्त है। ईश्वर को उसके सत्यस्वरूप में न मानकर उससे भिन्न स्वरूपों में मानना भी एक प्रकार की नास्तिकता ही है। समाज के लोग व उनके आचार्य अपने अपने अनुयायियों को सत्य का ग्रहण तथा असत्य का त्याग नहीं करा रहे हैं। वह न तो स्वयं सत्यार्थप्रकाश पढ़ते हैं और न ही अपने अनुयायियों को ही इसकी प्रेरणा करते हैं। इस कारण समाज में अन्धविश्वास समाप्त नहीं हो पा रहे हैं। इससे समाज कमजोर हो रहा है और यह अनेकानेक मत-मतान्तरों के अनुयायियायें में विभक्त होकर समाज व मनुष्य जाति को दुर्बल बना रहा है। अनेक मत-मतान्तरों के लोग एक दूसरे के विरोधी देखे जाते हैं। अतः ऐसी स्थिति में वेदों का प्रचार, वेदों का अध्ययन, वैदिक साहित्य व सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों के प्रचार-प्रसार की महती आवश्यकता अनुभव होती है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो इसके कारण आने वाले समय में अनेक भयंकर परिणाम हो सकते हैं। हमें अतीत के इतिहास की घटनाओं से भी शिक्षा लेनी चाहिये। विद्वान मनुष्य असत्य के कारण होने वाले दुष्परिणामों को भली प्रकार से अनुभव करते हैं। एक अज्ञानी मनुष्य जो कभी किसी विद्यालय में न पढ़ा हो तथा जिसने कभी ज्ञानी पुरुषों की संगति न की हो, उस जैसा ही अविद्यायुक्त लोगों का जीवन होता है। इसके विपरीत जिस मनुष्य के माता-पिता सद्धर्म के जानने और मानने वाले तथा विद्वान होते हैं, जिनको अच्छे ज्ञानी आचार्य प्राप्त होते हैं तथा जिन्हें धर्म व अधर्म को जानने वाले सद्गुरु प्राप्त होते हैं, वह मनुष्य जीवन में उन्नति व सुखों को प्राप्त होते हैं। विचार करने पर यह भी ज्ञात होता है कि धन से अधिक महत्व ज्ञान का होता है। बताया जाता है कि एक धर्म तत्व को जानने व आचरण करने वाला ज्ञानी मनुष्य जिस सुख का लाभ करता है वह सुख अज्ञानी धनवान मनुष्य नहीं प्राप्त कर सकते। आज भी हम देखते हैं कि धनवान रोगी, भोगी, अल्पायु तथा अन्धविश्वासों से ग्रस्त होते हैं। इसके विपरीत हमारे वैदिक गुरुकुलों में पढ़ने वाले बच्चे, उनके आचार्य तथा वैदिक परिवार सीमित साधनों में जीवन व्यतीत करते हुए भी प्रसन्न, सुखी व चारित्रिक तथा आत्मिक बल से युक्त निरोग व बलवान होते हैं। यह सत्य व ज्ञान की शक्ति सहित ईश्वर की कृपा के कारण होता है। अतः हमें भी असत्य का मार्ग छोड़कर सत्य विचारों, मान्यताओं, कर्तव्यो व परम्पराओं को ही मानना चाहिये। हमें मर्यादा पुरुषोत्तम राम, योगेश्वर कृष्ण तथा वेदाद्धारक ऋषि दयानन्द आदि महापुरुषों के जीवन का अध्ययन कर उनसे प्रेरणायें लेनी चाहिये और उन्हीं के अनुरूप अपना जीवन बनाना चाहिये। हमारे जीवन में असत्य विचारों के लिये कोई स्थान नहीं होना चाहिये। हमारा जीवन वेद एवं वेदानुकूल ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश, उपनिषद, दर्शन तथा विशुद्ध मनुस्मृति की मान्यताओं के अनुरूप होना चाहिये। ऐसे विचारों वाले मनुष्यों से युक्त ही हमारा समाज व देश होना चाहिये। ऐसा होने पर ही मानव समाज सहित मनुष्य जाति का हित व कल्याण होगा। ओ३म् शम्।

Comment:

betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti mobil giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
betgaranti güncel giriş
Kolaybet Giriş
ngsbahis giriş
artemisbet güncel
bettilt giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti
betgaranti giriş
betgaranti
betgaranti giriş
betgaranti
kolaybet giriş
bettilt giriş
betgaranti giriş
betnano güncel giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
hititbet
sahabet
sahabet
kolaybet giriş
Kolaybet Giriş
betgaranti giriş
casibom giriş
betgaranti giriş
holiganbet
sahabet
sahabet
onwin
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet
holiganbet
onwin
onwin
onwin
grandpashabet giriş
sahabet giriş
casibom giriş
onwin giriş
bettilt giriş
Betgaranti
sahabet giriş
sahabet giriş
betgaranti
norabahis giriş
norabahis giriş
betgaranti giriş
tipobet giriş