Jawaharlal Nehru 1

पंडित जवाहरलाल नेहरू लोकतंत्र में विश्वास रखने के उपरांत भी साम्यवादी विचारधारा से प्रेरित थे। जब वह स्वाधीन भारत के पहले प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने लोकतंत्र को समाजवादी देशों की भांति हांकने का प्रयास किया। हम सभी जानते हैं कि साम्यवादी अर्थात कम्युनिस्ट देशों में कोई एक नेता होता है, वही अपनी पार्टी का नेता होता है और वही देश का नेता होता है। इस प्रकार एक पार्टी का शासन तानाशाही के रूप में चलता है। नेहरू जी कम्युनिस्ट रूस की लेनिनवादी विचारधारा से प्रभावित थे। उन्होंने रूस की साम्यवादी विचारधारा को ‘ समाजवादी लोकतंत्र ‘ कहकर भारत की मौलिक लोकतांत्रिक विचारधारा पर एक उधारे विचार के रूप में थोपने का प्रयास किया। उधारी मनीषा को सिर पर उठाकर चलने वाले नेहरू जी अंतर्द्वंद्व के पालने में झूलते रहे। वह न तो भारतीय लोकतंत्र की मौलिक वैदिक चिंतनधारा से जुड़ पाए और न ही रूस के साम्यवादी स्वरूप को भारत में यथावत लागू कर पाए। उनकी मन:स्थिति कुछ इस प्रकार की हो गई :-

न ख़ुदा ही मिला न विसाल-ए-सनम
न इधर के हुए न उधर के हुए ।
रहे दिल में हमारे ये रंज-ओ-अलम
न इधर के हुए न उधर के हुए।।

यदि नेहरू जी भारतीय वैदिक वांग्मय के साथ जुड़ते, वेद रामायण, महाभारत, शुक्रनीति-सार, मनुस्मृति के राजधर्म आदि विषयक चिंतन पर थोड़ा सा भी गंभीरता से विचार करते तो उनके लेखन में कभी किसी भी प्रकार का भटकाव न होता । तब वे भारतीय राष्ट्रवाद की परंपरा से तो जुड़ते ही साथ ही भाषा की पवित्र परंपरा के साथ भी उनका आत्मीय संबंध दिखाई देता। उनके चिंतन में गहराई होती।

मुगलों के प्रति नेहरू जी का दृष्टिकोण

यह बड़े दुख की बात है कि नेहरू जी ने विदेशी मुगल आक्रमणकारियों को भारतीय मान लिया। नेहरू जी ने मुगलों को इस प्रकार दिखाने का प्रयास किया कि जैसे वे भारत में रहकर पूर्णतया भारतीय हो गए थे और भारतीय लोगों के साथ मानवीय व्यवहार करते हुए उनके कल्याण के प्रति समर्पित हो गए थे। इतना ही नहीं , मुगलों के गैर मुसलमानों पर किए गए अत्याचारों को भी नेहरू जी ने अनदेखा करने का प्रयास किया। जिन मुगलों के चेहरों पर पापों के गहरे-गहरे दाग थे, उन्हें भी नेहरू जी ने क्षमा प्रमाण पत्र पकड़ा दिया।

उन्होंने अपनी ‘ नेहरू डॉक्ट्रिन’ अर्थात ‘ डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ के माध्यम से देश के लोगों से भी यह अपेक्षा की कि वह भी मुगलों के प्रति वही दृष्टिकोण अपनाएं जो वह स्वयं अपना रहे हैं । इसी को लोगों पर अपनी विचारधारा को बलात थोपना कहा जाता है। यही वह सोच है जो पंडित जवाहरलाल नेहरू जी को ‘ कम्युनिस्ट’ बनाती है।

नेहरू की राजहठ थी – बोलो वही जो मैं बोलता हूं,
नेहरू की मान्यता थी, सच है- वही जो मैं बोलता हूं,
नेहरू की सोच थी , मानो वही – जो मैं बोलता हूं,
नेहरू की जिद यही थी – कहना वही जो मैं बोलता हूं।।

कम्युनिस्ट विचारधारा भी दूसरों को बलात अपने निर्णय पर सहमत करने का प्रयास करती है। नेहरू जी भी इसी विचार के थे। उनकी एक हठ थी कि जो मैंने सोच लिया है या मान लिया है , उसी को नए भारत की आधारशिला मानकर उसी पर नवभारत का निर्माण करो । उन्होंने हठ की कि भारत में वैदिक संस्कृति की बात मत करो। इसके स्थान पर ‘ मिली जुली तहजीब’ की बात करो । उन्होंने यह भी हठ की कि मुगलों के पापों को भूल जाओ और उनके गीत गाने लगो । उन्होंने कहा कि अकबर को मेरे दृष्टिकोण से देखो। उन्होंने कहा कि जिसे तुम सनातन कहते हो, वह तो वर्ण-व्यवस्था के मकड़जाल में फंसा हुआ रूढ़िवादी लोगों का एक निर्जीव सा मानव समाज था। जिसे विदेशी मुगलों ने आकर तहजीब सिखाई। जीना सिखाया । आगे बढ़ाना सिखाया । उन्होंने कहा कि मुगलों के आने से पहले भारत पारस्परिक फूट का शिकार था। मुगलों ने अथक परिश्रम कर इसे एकता और अखंडता के सूत्र में पिरोने का सराहनीय कार्य किया।

राष्ट्रवादी नेताओं से नेहरू का टकराव

यदि कोई नेहरू जी को समझाता कि जिसको उन्होंने सोच लिया है और जिस सोच पर वह भवन निर्माण के कार्य में जुट गए हैं, उसके विपरीत परिणाम आने निश्चित हैं तो उसके प्रति उन्होंने शत्रुता का भाव रखना आरंभ किया। डॉ भीमराव अंबेडकर , सावरकर जी, सरदार वल्लभभाई पटेल, देश के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद जैसे लोग इसके उदाहरण हैं।

टकराव की कहानी – हमको बता रही है,
छल के हैं कौन मारे ?-उनको बता रही है।
हृदय में जिनके भारत एक देवता सा बैठा,
हर घाव उनका हमको , रोके बता रही है।।

कम्युनिस्ट देशों में अपने से विपरीत मत रखने वाले लोगों के प्रति उन्हें मिटा देने का भाव शासक वर्ग में होता है। नेहरू जी और उनके बाद उनकी बेटी श्रीमति इंदिरा गांधी ने भी अपने विरोधियों के प्रति इसी प्रकार का आचरण किया। सन 1984 में जब श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या हुई तो उस समय तक ‘ नेहरू डॉक्ट्रिन’ की इस प्रकार की बातें भारतीय राजनीति में एक अनिवार्य तत्व या एक संस्कार के रूप में स्थापित हो गईं। दूसरे शब्दों में आपको इसको इस प्रकार का सकते हैं कि इंदिरा गांधी की मृत्यु तक कम्युनिस्ट विचारधारा एक कुसंस्कार के रूप में भारतीय राजनीति में स्थापित हो गई।
‘ नेहरू डॉक्ट्रिन’ को लागू करने के लिए देश के पहले प्रधानमंत्री ने अपनी पुस्तक ‘ भारत की कहानी ‘ को अधिक से अधिक प्रचारित – प्रसारित करने का प्रयास किया। कई विश्वविद्यालयों या शैक्षणिक संस्थाओं को विशेष सरकारी सहायता देकर उनमें अपनी विचारधारा के युवा तैयार करने का कार्य आरंभ किया गया। यह बिल्कुल उसी प्रकार की तैयारी थी, जिस प्रकार कम्युनिस्ट देश में युवाओं का ‘ ब्रेन वाश’ करने की तैयारी उनके शैक्षणिक काल में ही कर ली जाती है। इसके पीछे उन युवाओं को एक पार्टी के प्रति निष्ठावान बनाने की शिक्षा दी जाती है। पार्टी भक्ति को राष्ट्रभक्ति से ऊपर रखा जाता है। हरसंभव प्रयास किया जाता है कि देश का युवा वर्ग एक पार्टी के राजनीतिक चिंतन अथवा दर्शन के अतिरिक्त अन्य कुछ सोचे ही नहीं। नेहरू जी ने कांग्रेस की विचारधारा को युग-युगों तक बनाए रखने के लिए कम्युनिस्ट देशों के शासनाध्यक्षों की इसी परंपरा का निर्वाह किया। नई दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी जैसे अनेक शैक्षणिक संस्थानों ने नेहरू जी के इसी प्रकार के ‘मिशन’ और ‘विजन’ को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया।

किया सशस्त्र सेनाओं का ब्रेनवाश

मुझे मेरे एक मित्र ने बताया कि जब वह भारतीय सशस्त्र सेनाओं में कार्य कर रहे थे तो उस समय ‘ भारत की कहानी’ नामक नेहरू जी की यह पुस्तक प्रत्येक सैनिक को नि:शुल्क वितरित की जाती थी। आप इसी से अनुमान लगा सकते हैं कि यह कार्य क्यों किया जाता था ? यही कि हमारे सैनिकों के भीतर भी ‘ नेहरू डॉक्ट्रिन ‘ प्रवेश कर जाए और वह भारत को उसी प्रकार देखने लगें, जिस प्रकार नेहरू जी देखते थे।
इस प्रकार की सोच ने भारत को भारत से ही छीन लिया। बहुत तेजी से भारत के भीतर ‘ इंडिया’ का विस्तार होने लगा। प्रगतिशीलता और आधुनिकता के नाम पर लोगों ने अपनी जड़ों को अपने आप खोदना या भुलाना आरंभ कर दिया। सबको ऐसे लगने लगा कि जैसे 1947 से पहले का भारत घुप्प अंधेरे में पड़ा हुआ एक निर्जीव प्राणी था। जिसे गांधी- नेहरू के कारण संजीवनी मिली और उसने नई अंगड़ाई लेकर 1947 के बाद ‘प्रगतिशील’ और ‘आधुनिक’ बनकर जीना आरंभ किया। यह सोच हमारे लिए आत्मघाती सिद्ध हुई है।

बतला के झूठा रस्ता गुमराह किया वतन को ,
जितना ही रोकते थे – वे डांटते थे हमको।
कहते थे मेरे कारण – आजाद ये वतन है,
है कौन इस जहां में ? झूठ कहेगा हमको।।

‘ प्रगतिशीलता’ और ‘ आधुनिकता’ के नाम पर हमें बहुत लूटा गया है। हमारा बहुत मूर्ख बनाया गया है। यही वह दोनों शब्द हैं – जिन्होंने हमसे हमारा गौरवपूर्ण अतीत छीन लिया है। वैदिक मूल्यों को तिलांजलि देकर यूरोप की अपसंस्कृति को अपनाने की ओर हमारा युवा इन्हीं दो शब्दों के चक्कर में पड़कर अंधा होकर भागने लगा। जिसका परिणाम यह हुआ है कि देश के लगभग प्रत्येक युवा से उसका यौवन इन्हीं दो शब्दों ने छीन लिया है।

देश का युवा वर्ग छला गया

देश का यौवन अब एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहां से उसे अपना गंतव्य और लक्ष्य दिखाई नहीं दे रहा है । वह चुंधियाया सा बेतहाशा, निराश और हताश सा खड़ा है। देश के लिए युवाओं की यह दु:खद स्थिति देश के लिए बहुत बड़ा अभिशाप है । यदि स्पष्ट और निष्पक्ष होकर कहा जाए तो यह ‘नेहरू डॉक्ट्रिन’ का ही परिणाम है।

जब 1947 में स्वाधीन हुआ था तो उस समय हमें एक बड़े अभिशाप से मुक्ति प्राप्त हुई थी। हम ब्रिटिश सत्ता के जुए को अपने कंधों से उतारने में सफल हुए थे। सांप्रदायिक आधार पर देश का विभाजन कांग्रेस ,मुस्लिम लीग और ब्रिटिश सत्ताधीशों ने मिलकर कर दिया। तब नेहरू जी देश के एक बड़े नेता थे। यदि उनको वास्तव में ही इतिहास की गहरी समझ थी तो तब देश के नेतृत्व को बैठकर यह गंभीर चिंतन करना चाहिए था कि अभी हमारे पास ऐसी कौन-कौन सी परंपराएं हैं जो हमारे लिए अभिशाप बन चुकी हैं ?

तब यह भी विचार करना चाहिए था कि हम इस प्रकार की परंपराओं से भी देश को मुक्त करेंगे और देश में वैदिक मूल्यों के अनुसार परिवार निर्माण से समाज निर्माण , समाज निर्माण से राष्ट्र निर्माण और राष्ट्र निर्माण से विश्व निर्माण की ओर बढ़ने का काम करेंगे। देश के युवाओं को ब्रह्मचर्य की शक्ति का पाठ पढ़ाया जाता । उन्हें संयम और धैर्य अपनाकर विवेक से काम लेने की शिक्षा दी जाती। यह तभी संभव था जब महर्षि पतंजलि के योग को विद्यालयों में अनिवार्य रूप से लागू कराया जाता। क्योंकि धैर्य और संयम को बढ़ाने में संसार की अन्य कोई औषधि उतनी सफल नहीं हो सकती, जितना योग सफल होता है।

दुर्भाग्यवश ‘गंगा – जमुनी संस्कृति’ के नाम पर भारत के निर्माण के लिए हमारे ऋषियों के चिंतन को नहीं अपनाया गया। यहां पर बाबर, अकबर और औरंगजेब के विचारों पर चढ़ी उनके पापों और अत्याचारों की परत को काट छांटकर उन्हें भारतीय संस्कृति की परंपराओं के अनुकूल बनाने का प्रयास किया गया। फिर भारत के लोगों से कहा गया कि अब इन मुगलों को अपना पूर्वज मानो और अपने उन पूर्वजों को भूल जाओ, जिन्होंने इन विदेशी आतंकवादियों से लड़ते-लड़ते अपने प्राणों का बलिदान दिया था। यह थी नेहरू जी की – राजहठ।

नेहरू जी की राजहठ और राष्ट्रीय क्षति

नेहरू जी की इस राजहठ ने हमारा बहुत भारी अहित किया है। बहुत तेजी से नेहरू जी का विचार देश में फैलाया गया । जिसका परिणाम यह निकला कि बड़ी संख्या में लोगों ने मुगलों के अत्याचारों और पापों की जानकारी न होने के कारण या तो उन्हें अपना आदर्श मान लिया या भारतीय इतिहास का नायक मान लिया या अपने लिए भी प्रेरणा का स्रोत मान लिया। बड़ी संख्या में लोगों ने अपने अतीत को भी भुला दिया। ‘ नेहरू डॉक्ट्रिन ‘ की मान्यताओं को शिरोधार्य कर लोगों ने ‘ प्रगतिशीलता ‘ और ‘ आधुनिकता’ के नाम पर तेजी से आगे बढ़ना आरंभ किया । आगे बढ़ते – बढ़ते अब बड़ी संख्या में लोग एक ऐसी खाई में गिर चुके हैं, जहां से उन्हें बाहर निकलने का रास्ता दिखाई नहीं दे रहा है। लोगों की व्याकुलता बढ़ती जा रही है। किमकर्तव्यविमूढ़ता की अवस्था उनके चेहरे पर स्पष्ट पढ़ी जा सकती है।

जो देश अपनी जड़ों को भूलकर या उन्हें काटकर या उन्हें खोदकर आगे बढ़ने का निर्णय लेता है, वह कभी सक्षम, सबल और सफल राष्ट्र नहीं बन पाता। जिसकी जड़ें आसमान की ओर हों, वह कभी अपने पैरों पर खड़ा भी हो जाएगा ? – इसकी कल्पना तक भी नहीं की जा सकती । यह बात पूर्णतया सत्य है कि गांधी जी और नेहरू जी ने जिस राष्ट्र निर्माण की बात की थी, नवभारत के निर्माण की कल्पना की थी, वह भारतीय राष्ट्र के अनुकूल कल्पना थी। उसनहींमें कहीं ना कहीं खोट था। उसने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इस्लामिक आतंकवाद को प्रोत्साहित किया। मुस्लिम तुष्टीकरण के नाम पर मुस्लिम समाज की धार्मिक पुस्तक की उन मान्यताओं या आयतों को यथावत बने रहने दिया जो सामाजिक परिवेश में विष घोलने का काम करती रही हैं या जो गैर मुसलमानों के प्रति अत्याचार पूर्ण दृष्टिकोण रखती रही हैं । जिन्होंने रक्त बहाने और नारी अस्मिता के साथ खिलवाड़ करने को एक वर्ग का विशेष अधिकार माना है। मुगलों की परंपरा में यह सब पाप हमारे देश में दीर्घ काल तक होते रहे। नेहरू ने अपनी पुस्तक ‘ हिंदुस्तान की कहानी’ में इन सब पापों पर पानी फेर दिया और कह दिया कि पीछे मत देखो। आगे बढ़ो। जो जातियां या जो राष्ट्र पीछे देखते रह जाते हैं, वे कभी आगे नहीं बढ़ पाते।
देश के बहुसंख्यक समाज के लोगों ने देश के प्रधानमंत्री की इन बातों पर विश्वास कर लिया। उन्होंने मान लिया कि हम पीछे नहीं देखते, पीछे के घावों को भूलकर वर्तमान को स्वस्थ और सुंदर बनाकर आगे बढ़ने का निर्णय लेते हैं। परंतु आज स्वाधीनता के 75 वर्ष व्यतीत हो जाने के पश्चात देश के लोगों की आंखें खुली हैं तो पता चला है कि वह तो विश्वास में अंधे होकर आगे बढ़ते जा रहे थे। जबकि एक वर्ग अपनी मान्यताओं को पकड़ कर उन्हीं के अनुसार काम करता रहा और भारतीय राष्ट्र की जड़ों को खोदता रहा।

पत्थर पूजा और देश का युवा वर्ग

जिस देश के नेतृत्व की गलत नीतियों के कारण देश ने अपना इतना भारी अहित कर लिया हो, अंततः उसके लिए दंड का पात्र कौन होगा ? कोई विचारधारा ? कोई व्यक्ति ? कोई पार्टी ? कोई संस्था ? अंततः किसी न किसी को तो जिम्मेदारी लेनी होगी। यदि जिम्मेदारियों से भागने का काम किया गया या हमने ऐसा पाप होने दिया तो मानना पड़ेगा कि हम सभी अंधे थे । मूर्ख थे। जो आत्मनिरीक्षण करना नहीं जानते थे। आत्म- समीक्षा करनी नहीं जानते थे? जिनकी बुद्धि जड़ हो गई थी ? संभवत: इसी को पत्थर पूजा कहते हैं।

स्वाधीनता के पश्चात हमने थोड़ा सा रूप परिवर्तित कर पत्थरों को पूजना आरंभ किया। हृदयहीन लोगों को या सनातन के मूल्यों के प्रति अनास्था रखने वाले नास्तिक लोगों को हमने भगवान मान लिया ? जो भारत के ‘भगवान’ में विश्वास नहीं रखते थे, उनको हमने ‘भगवान’ मान लिया । जो कहते थे कि मंदिर बनाने से अर्थात मनुष्य की संवेदनाओं को राष्ट्र के प्रति समर्पित करने के केंद्र मंदिरों की उपेक्षा करके हमने हॉस्पिटल, बांध , सड़क जैसे हृदयहीन पत्थरों को अपनी आस्था का केंद्र बनाना है , उनकी बातों में हम बहक गए।

हमने संवेदनाओं को मारा और संवेदनहीन चीजों को पूजना आरंभ कर दिया। जहां मानव निर्माण होता था ,उनके केंद्रों को हमने उजाड़ दिया और जहां भ्रष्टाचार होता था , उनको आधुनिकता की दौड़ में पड़कर हमने अपने देवता के रूप में सम्मान देना आरंभ कर दिया। माना कि विकास के नाम पर इन सब चीजों को पकड़ना अनिवार्य था, परंतु राष्ट्र निर्माण के लिए ऐसे केन्द्रों को भी संचालित करना समय की आवश्यकता थी, जिनसे राष्ट्र निर्माण की गतिविधियों में प्रत्येक मनुष्य को जोड़ने के लिए उसका धर्म उसे समझाया जाता। हमसे भारी भूल करवा दी गई। इसके उपरांत भी कोई पार्टी राष्ट्रीय हितों के साथ किए गए इस भारी खिलवाड़ की जिम्मेदारी लेने को तत्पर नहीं है ?

8 मानवीय भावनाओं का सम्मान करते हुए हम भी यह चाहते हैं कि समाज को हिंदू – मुस्लिम की संकीर्ण मानसिकता से बाहर निकलना चाहिए। परंतु इसके लिए केवल हिंदू ही पहल करे और वह ही पहल करता करता आगे बढ़ता जाए। जबकि मुस्लिम समाज अपनी परंपरागत सांप्रदायिक नीतियों को अपनाए रहे, इससे काम चलने वाला नहीं है। पहल दोनों को करनी होगी और दोनों को समान दृष्टिकोण अपनाते हुए एक ही दिशा में, एक ही सोच के साथ, एक ही संकल्प के साथ आगे बढ़ना होगा। तभी वास्तविक अर्थों में राष्ट्र निर्माण का सपना साकार हो सकेगा। नेहरू जी ने मुसलमानों का गुणगान करते हुए और उनके पापों की उपेक्षा करते हुए चाहे जिस प्रकार का भी इतिहास लिख दिया हो, और चाहे ‘ नेहरू डॉक्ट्रिन’ के नाम पर उस इतिहास को लोगों ने कितना ही पढ़ लिया हो, कितना ही रट लिया हो, परंतु जब तक मुस्लिम समाज की मानसिकता में परिवर्तन नहीं होगा, तब तक भारत में सामाजिक समरसता उत्पन्न नहीं हो पाएगी। सांप्रदायिक सद्भाव स्थापित नहीं हो पाएगा। इस सत्य को न तो गांधी जी ने समझ, न पंडित नेहरू ने समझा, न उनकी पार्टी कांग्रेस ने समझा। उसका परिणाम यह हुआ है कि भारत में मुस्लिम सांप्रदायिकता दिन – प्रतिदिन उग्र होती जा रही है।

झूठा इतिहास पढ़ाई जाने के परिणाम

झूठी मान्यताओं को जब स्थापित करोगे, झूठा इतिहास जब अपने देश के लोगों को पढ़ाओगे और झूठ को बार-बार बोलकर उसे सत्य के रूप में स्थापित करने का प्रयास करोगे, तब तक राष्ट्र में शांति नहीं हो सकती। नव निर्माण के लिए आत्मावलोकन नितांत आवश्यक होता है। यह देखना होता है कि जिन मूर्खताओं ने हमें कल रुलाया था, उन्हें आज न अपनाया जाए। जिस सांप्रदायिकता ने 1947 में देश का विभाजन कराया था, उस मुस्लिम सांप्रदायिकता के प्रति स्वाधीन भारत के राजनीतिक नेतृत्व का यही दृष्टिकोण होना चाहिए था। काल्पनिक उड़ान राष्ट्र के संदर्भ में उचित नहीं होती। राष्ट्र के संदर्भ में तो यथार्थ के धरातल पर नीतियों को लागू करते समय कई बार कठोरता का भी प्रदर्शन करना पड़ता है।

इतिहास झूठ नहीं बोलता, करें लोग मजबूर।
साक्षी है यह सत्य का, सत्य का कोहिनूर।।

लोकतंत्र का अभिप्राय यह नहीं है कि आप ऐसी नीति अपनाएंगे जिसे सभी लोग स्वाभाविक रूप से स्वीकार करने को तत्पर हों। लोकतंत्र एक व्यवस्था का नाम है और व्यवस्था में यदि ढिलाई बरतने का आपने तनिक सा भी संकेत दिया तो लोग आप पर हावी हो जाएंगे। अराजक और राष्ट्र विरोधी तत्व समाज के शांतिप्रिय लोगों का जीना दूभर कर देंगे। लोकतंत्र में यदि आप इतनी छूट देने की राजनीतिक इच्छा शक्ति प्रदर्शित करेंगे तो समझ लीजिए कि आप कुछ भी नहीं कर पाएंगे। जिन लोगों ने हमारे देश पर दीर्घकाल तक नरसंहार और तलवार के बल पर शासन किया, इस देश को हर दृष्टिकोण से लूटा खसोटा उन्होंने अंत में जब देखा कि स्वाधीनता के पश्चात उनकी दाल गलनी संभव नहीं है तो सांप्रदायिक आधार पर अपना देश अलग लेने में सफल होने वाले, उन लोगों के प्रति पहले दिन से सावधानी बरतनी आवश्यक थी। इन लोगों ने जब देखा कि सत्ता उस व्यक्ति के हाथों में आ गई है, जिसने स्वाधीनता प्राप्ति के पहले ही ‘ हिंदुस्तान की कहानी’ लिख दी थी। साथ ही उस कहानी में अपना भरपूर मुस्लिम प्रेम भी प्रकट किया था तो इन्हें इस बात का आश्वासन तो पहले दिन से ही मिल गया कि ऐसे मुस्लिम प्रेमी के शासन में उन्हें फिर नया खेल खेलने का अवसर मिलना संभव है।
इस पुस्तक में हमने नेहरू जी के मुस्लिम प्रेम की उन झलकियों को यहां प्रस्तुत करने का प्रयास किया है, जिनके कारण राष्ट्र को भारी क्षति उठानी पड़ी है। हम यह भी स्पष्ट करना चाहेंगे कि नेहरू जी के प्रति व्यक्तिगत रूप से हम अत्यधिक सम्मान करते हैं, परंतु जब बात एक देश के नेता की हो और उस नेता की नीतियों में गलती हो तो उसे राष्ट्रहित इस दृष्टिकोण से स्पष्ट करना आवश्यक होता है कि आने वाला कोई नेता ऐसी गलतियों की पुनरावृत्ति न करे। यदि अतीत में कुछ गलतियां हो गई हैं तो वर्तमान में उस इतिहास पुरुष के वर्तमान उत्तराधिकारियों को अपनी गलतियां सुधारनी चाहिए। विशेष रूप से तब जब किसी इतिहास पुरुष के वर्तमान उत्तराधिकारी अपने आप को आज भी नेता के रूप में प्रस्तुत कर रहे हों।

जो कुछ हुआ अतीत में, दोबारा ना होय।
गलतियों से सीख लो , कहता है हर कोय।।

हमारे इतिहास में ऐसी अनेक विकृतियां हैं, जिनका प्रक्षालन करना समय की आवश्यकता है। हमारी मान्यता है कि इन विकृतियों को बढ़ाने में नेहरू जी का विशेष योगदान रहा है। इसलिए आज के संदर्भ में नेहरू जी की ‘ हिंदुस्तान की कहानी’ के बारे में हमारी मान्यता है कि यह पुस्तक प्रतिबंधित होनी चाहिए। साथ ही भारत सरकार को भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी भी लेखक को असीमित अधिकार नहीं देने चाहिए। लोकतंत्र में यह नहीं चलना चाहिए कि आप जो चाहें सो लिख सकते हैं। तथ्यों की पड़ताल करते हुए इतिहास को तथ्यात्मक लिखना ही चाहिए। यदि आपने तथ्यों के साथ खिलवाड़ किया तो यह राष्ट्र की एकता और अखंडता पर भी प्रभाव डाल सकता है। चोर को चोर कहना चाहिए। बेईमान को बेईमान कहना चाहिए। आतंकवादी को आतंकवादी कहना चाहिए और मानवतावादी दृष्टिकोण अपनाने वाले लोगों को देवता ही कहना चाहिए। यह इतिहास लेखन की अनिवार्य शर्त होती है। यदि इस अनिवार्य शर्त का उल्लंघन नेहरू जी भी करते हैं तो आलोचना उनकी भी होनी चाहिए।

स्थापित यह होना चाहिए कि जिसे आपकी आत्मा लिखना स्वीकार नहीं करती वह नहीं लिखा जाना चाहिए। यदि आपकी आत्मा किसी देशभक्त की उपेक्षा करने पर आपकी कलम को धिक्कार रही है तो समझ लो कि आपने अपने लेखन धर्म के साथ अन्याय किया है। यदि आप चोर को चोर नहीं कह सकते हैं तो आपका लिखना भी व्यर्थ है। यदि आपकी आत्मा कह रही है कि चोर को चोर लिखो तो आपको उसे चोर लिखना चाहिए। स्मरण रहे कि इस पुस्तक में हमने नेहरू जी की आलोचना नहीं की है, अपितु एक लेखक की आलोचना की है। मैं उनकी लेखनी को नमस्कार करता हूं परंतु इसका अभिप्राय यह नहीं है कि उनकी लेखनी से निकले शब्दों को भी स्वीकार करता हूं। क्योंकि लेखनी शब्दों के लिए दोषी नहीं होती है। उसका कार्य केवल लिखना होता है। शब्द तो विचार के रूप में और विचार भाव के रूप में व्यक्ति के हृदय में उठते हैं। आलोचना विचारों की होती है। जिन्हें लेखनी लिखने के लिए बाध्य की जाती है।

जितनी सावधानी से हमने यह बात कही है , उतनी ही सावधानी से पुस्तक का अध्ययन किया जाना अपेक्षित है।
आशा करता हूं कि आपको मेरा यह प्रयास अवश्य ही सार्थक लगेगा।

(“इतिहास का विकृतिकरण और नेहरू” नामक मेरी पुस्तक की भूमिका )

– डॉ राकेश कुमार आर्य
(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)

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