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वैदिक संपत्ति

वैदिक सम्पत्ति 261 – आर्य वस्त्र और वेशभूषा

(ये लेखमाला हम पं. रघुनंदन शर्मा जी की ‘वैदिक सम्पत्ति’ नामक पुस्तक के आधार पर सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहें हैं)

प्रस्तुतिः – देवेन्द्र सिंह आर्य (चेयरमैन ‘उगता भारत)

गतांक से आगे ….

राजा के लिए लिखा है कि-

शिरो मे श्रीर्यशो मुखं त्विषिः केशाश्च श्मश्रूणि ।
राजा मे प्राणो अमृत सम्राट् चक्षुविराट् श्रोत्रम् ।। (यजु० 20/5)

वैविक आर्यों की सभ्यता

इसमें राजा के शिर के कैशों और दाड़ी, मूंछों की भी प्रशंसा की गई है। इसी तरह वनस्थ के लिए भी लिखा ही है कि जटाश्व विभृतान्नित्यं श्मश्रुलोमनखानि च अर्थात् वानप्रस्थ सदैव जटा रक्खे और कभी बाल और नाखून न कटावे । कहने का मतलब यह कि असमर्थ दशा के अतिरिक्त आर्यसभ्यता के अनुसार मनुष्य को कभी केश और बाल न निकलवाना चाहिये। वेदों में जहाँ बालों के रखने का आदेश किया गया है, वहाँ उनके स्वच्छ रखने का भी उपदेश है। अथर्ववेद में लिखा है कि कृत्रिमः कण्टकः शतदन्, शीर्षे केश अपः लिखात् अर्थात् अनेक कृत्रिम काँटों बाले कंधे से शिर के बालों का विन्यास किया जाये। इन समस्त आज्ञायों से पता लगता है कि आर्य सभ्यता में केशों की रक्षा का विधान है। यही नहीं, किन्तु इतिहास और प्राचीन चित्रकला से भी पाया जाता है कि ऋषि मुनि और राजा, महाराजा सब केश रखते थे। रामचन्द्र के शिर पर केश पहले ही से बड़े बड़े थे, तभी वे तुरन्त ही वटक्षीर से उन्हें जटिल बना सके । कृष्ण, अर्जुन और अन्य योद्धाओं के वर्णनों में भी कैश संभालने का जिक्र आता है। ऋषि तो जटाधारी थे ही। इसके अतिरिक्त प्राचीन काल में केशों से ही आर्यों और दस्युओं की पहिचान भी होती थी।

प्राचीन काल में जिस प्रकार ब्राह्मण, क्षत्री और वैश्य की पहिचान के लिए सूत, सन और ऊन का यज्ञोपवीत पहिना जाता था, उसी प्रकार आर्य और दस्यु की पहिचान के लिए शिर के केशों में एक ग्रन्थि लगाई जाती थी। जिनके शिर में ग्रन्थि होती थी, वे आर्य और जिनके शिर के केशों में ग्रन्थि न होती थी, वे दस्यु अर्थात् अनार्य समझे जाते थे। इसका कारण यह है कि आर्यों के अन्दर ब्राह्मण, क्षत्री, वैश्य और शूद्र ये चार उपभेद थे। इन चारों में से तीन द्विज थे, जो यशापवीत की भिन्नता से पहचाने जाते थे, किन्तु शूद्र आर्य होते हुए भी यज्ञोपवीत नहीं पहनते थे, अतएव वे केशों की ग्रन्थि से ही पहचाने जाते थे। इस प्रकार से केशग्रन्थि आर्यत्व का चिन्ह था। कभी कारण बश जब लोग शिर के बाल मुंडवा डालते थे, तो ग्रन्थि के लिए थोड़े से बाल रख लेते थे और उसी को शिखा कहा कहते थे, अर्थात् आर्यत्व का चिह्न शिखा थी और द्विजातिभेद का चिह्न सूत्र था। सूत्र द्विजों का और शिखा आर्यत्व का चिह्न थी, यह हमारी केवल कल्पना नहीं है, प्रत्युत सप्रमाण सिद्ध है कि पूर्वसमय में जब कभी आर्यो ने किसी को भी जातिच्युत करके अनार्य किया है अथवा उसे आर्यों से पृथक् करके दस्यु बनाया है, तब तब उसके केशों को कटवा दिया है अथवा शिखाग्रन्थि को खोलवा दिया है। ये बातें महाभारत हरिवंश और विष्णुपुराण में अच्छी तरह वर्णन की गई हैं। अतः हम यहाँ इस विषय के दो श्लोक लिखते हैं-

अर्ध शकानां शिरसो मुण्डयित्वा व्यसर्जयत् ।
यवनानां शिरः सर्वे काम्बोजानां तथैव च ।।
पारदाः मुक्तकेशाश्व पहलवाश्ववारिणः ।
निःस्वाध्यायवषट्‌काराः कृतास्तेन महात्मना ।

अर्थात् शकों का आधा शिर मुंडवा दिया गया, यवनों का कुल शिर मुंडवा दिया गया, कम्बोजों का समस्त शिर मुंडवा दिया गया, पारदों की शिखाग्रन्थि खुलवा दी गई और पह्णवों के केवल मोछ रक्खे गये और शिर के तथा दीड़ी के बाल मुंडवा दिये गये। इन वर्णनों से स्पष्ट हो जाता है कि शिर के केश अर्थात् शिखा आर्यत्व का चिह्न समझी जाती थी। आगे भी जाने दीजिये, कभी १०० बर्ष पहिले भी यही रिवाज था कि जब कभी किसी पतित को त्यागते थे, तो उसका सिर मुंडवाकर और गधे पर चढ़ाकर निकलवा देते थे। इन घटनाओं से समझ में आ जाता है कि हमारे के केश किस प्रकार विज्ञान से भरे हुये, धार्मिक, ऐतिहासिक और आर्यत्व के प्रतिपादन करनेवाले हैं। हम देखते हैं कि आजकल लोग हिन्दू (आर्य) का लक्षण अनेक प्रकार का करते हैं पर बिना आर्य इतिहास के समझे वे हिन्दू का ठीक ठीक लक्षण ही नहीं कर सकते। पर वैदिक जानते हैं कि शिखासूत्रधारी को आर्य (हिन्दू) कहते हैं। शिखा में सिक्ख, बौद्ध, जैन, और कोल -भील समा जाते है और सूत्र में द्विजाति तथा पारसी आ जाते हैं और इस प्रकार से केशों की खूबी समझने पर आर्य फैशन,आर्य भूसा और आर्य पोशाक का महत्व स्पष्ट हो जाता है।
क्रमशः

प्रस्तुतिः – देवेन्द्र सिंह आर्य (चेयरमैन ‘उगता भारत)

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