पेशवा नारायणराव

भारत के 1235 वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास ….
(हिन्दवी स्वराज के संस्थापक शिवाजी और उनके उत्तराधिकारी पुस्तक से .. अध्याय-14)

पेशवा नारायणराव

माधवराव प्रथम के पश्चात मराठा साम्राज्य दुर्बल होने लगा, क्योंकि उसके पश्चात इस साम्राज्य की संरक्षा व सुरक्षा के लिए कोई मजबूत इच्छाशक्ति वाला पेशवा इस साम्राज्य को नहीं मिला। माधवराव की मृत्यु निसंतान हुई थी। अतः अब उसके उत्तराधिकारी के लिए प्रश्न खड़ा हो गया। तत्पश्चात उसके भाई नारायण राव को पेशवा घोषित किया गया। पेशवा नारायण राव का जन्म सन् 1755 में हुआ था। नारायणराव अनेकों दुर्बलताओं से ग्रस्त था, इसलिए वह पेशवा बनने के उपरांत भी अपने पेशवाई दायित्वों का भली प्रकार निर्वाह नहीं कर पाया। उसका स्वभाव अत्यंत दुर्बल था और वह किसी भी प्रकार के निर्णय लेने में पूर्णतया अक्षम था। साथ ही विलासिता उसके सिर पर चढ़कर बोलती थी। जिस कारण वह पेशवा पद के योग्य नहीं था। ऐसी परिस्थितियों में उसकी अपनी घरेलू परिस्थितियाँ भी उसके अनुकूल नहीं थी, क्योंकि एक तो उसका महत्वाकांक्षी चाचा रघुनाथराव बंदी होने के कारण अपनी परिस्थिति से असंतुष्ट था। दूसरे, उसकी वक्र बुद्धि पत्नी आनंदीबाई तथा पेशवा की माता गोपिकाबाई में घोर वैमनस्य था। अतः अपनी पत्नी से प्रोत्साहित हो रघुनाथराव ने पेशवा के विरुद्ध षड्यंत्र आयोजित किया। संभवतः आरंभ में उसका ध्येय केवल पेशवा को बंदी बनाने का था। किंतु 30 अगस्त, 1773 के मध्याह्न में पेशवामहल में नारायणराव को रघुनाथराव के अनुयायियों ने घेर कर मार दिया। इतिहासकारों का संदेह है कि ऐसा संभवतः आनंदीबाई के संकेत पर ही किया गया था।

पेशवा रघुनाथराव उर्फ राघोबा

रघुनाथराव के विषय में हम पूर्व में भी उल्लेख कर चुके हैं कि वह स्वार्थी और दम्भी व्यक्ति था, जो वास्तव में सत्ता षड्यंत्रों में लगा हुआ था। उसका अंतिम उद्देश्य किसी भी प्रकार से पेशवा पद को प्राप्त कर लेना था। उसकी यह स्वार्थपूर्ण नीति पेशवा पद के पतन का कारण तो बनी ही, साथ ही मराठा साम्राज्य को भी ले डूबी। रघुनाथ राव का जन्म सन् 1734 में हुआ था।

बालाजीराव के समय में रघुनाथराव उर्फ राघोबा के नेतृत्व में उत्तरी भारत के दो सैनिक अभियानों की असफलता उसकी सैनिक योग्यता का प्रमाण पत्र दे चुकी थी। पानीपत के युद्ध में मिली असफलता से मराठा साम्राज्य को बहुत आघात पहुँचा था। उसने जिस प्रकार माधवराव प्रथम को उसके अल्पवयस्क होने के कारण गिरफ्तार कर उसे पद से हटाने का सत्ता षड्यंत्र रचा था, वह भी उसकी प्रतिष्ठा को धूमिल करने वाला है। रघुनाथराव इतने पर ही नहीं रुका था, अपितु उसने पेशवा को नीचा दिखाने के लिए मराठा साम्राज्य के परमशत्रु निजाम से भी हाथ मिलाने में संकोच नहीं किया था।

उसने आलेगांव में निजाम से सन् 1762 में समझौता कर पेशवा माधवराव प्रथम को गिरफ्तार कर लिया था। यद्यपि माधवराव ने शीघ्र ही अपनी पूर्ण सत्ता स्थापित कर ली थी। इसके पश्चात राघोबा को बड़े अनुशासन में रहना पड़ा। माधवराव की मृत्युपरांत नारायणराव के पेशवा बनने पर राघोवा ने निहित स्वार्थों की सिद्धि के लिए मराठा साम्राज्य को सत्ता षड्यंत्रों का केंद्र बना दिया। इसका परिणाम यह निकला कि उसने नारायणराव की हत्या करा दी।

सत्ता के रक्त में रंगे हाथों के पश्चात ही रघुनाथराव को स्वयं को पेशवा बनाने में सफलता मिली। वह 10 अक्टूबर, 1773 को मराठा साम्राज्य का पेशवा घोषित किया गया। जिस समय वह पेशवा बना उस समय नारायण राव की विधवा पुत्र नाना फड़णवीस के होने के कारण उसके नेतृत्व में राघोबा के विरुद्ध विरोध और विद्रोह उत्पन्न हो गया। अपने आप को सत्ता में बनाए रखने के लिए इस पेशवा ने हर प्रकार का हथकंडा अपनाने का प्रयास किया। वह अंग्रेजों की शरण में भी गया और उनसे सन् 1775 में अंग्रेजों से सूरत की सन्धि कर उनको भी मराठा साम्राज्य की राजनीति में घसीटते हुए अपने स्वार्थ सिद्ध करने का असफल प्रयास किया। इस संधि के परिणामस्वरुप आंग्ल-मराठा युद्ध का सूत्रपात हुआ, और पेशवा अँग्रेजों की कठपुतली मात्र बनकर रह गया। अंततः सन् 1782 में युद्ध की समाप्ति पर सालबाई की संधि के अनुसार पेशवा दरबार द्वारा राघोबा को पच्चीस हजार रुपए मासिक पेंशन प्रदान की गई। ऐसी परिस्थितियों में उसे मराठा साम्राज्य की राजनीति से सदा-सदा के लिए दूर कर दिया गया। अंत में वह 48 वर्ष की अवस्था में 1784 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।

वास्तव में रघुनाथ राव जैसे लोगों के पेशवा पद पर पहुँचने से मराठा साम्राज्य पतन की ओर तेजी से अग्रसर हो गया। यद्यपि उसका ढाँचा इस समय भी बहुत मजबूती के साथ खड़ा हुआ था, परंतु भीतर की यह कलह और सत्ता-संघर्ष हिंदवी साम्राज्य की चूलों को हिलाने का काम करने लगा।

एक छेद के कारनै डूब जात है नाव
अनेकों जिसमें छेद हों बचा न पावें राम ।।

पेशवा माधवराव द्वितीय

अब मराठा साम्राज्य पूर्णरूपेण सत्ता संघर्ष के दौर में प्रवेश कर चुका था। भीतरी कलह इतनी बढ़ गई थी कि थोड़ी-थोड़ी देर के लिए दुर्बल पेशवा नियुक्त हो रहे थे और वह परस्पर ही रक्तिम होली खेल रहे थे। नारायण राव की हत्या कराके राघोबा स्वयं को पेशवा बनाने में सफल हुआ था, परंतु शीघ्र ही उसके विरुद्ध भी सत्ता संघर्ष आरंभ हो गया और वह भी पेशवा पद से अलग कर दिया गया। नारायणराव की हत्या के बाद राघोबा अपने को पेशवा घोषित करने में सफल हुआ। 28 मई, 1774 को जनमत के सहयोग से नाना फड़नवीस ने राघोबा को पदच्युत कर एक महीने अट्ठारह दिन के बालक माधवराव द्वितीय को पदासीन किया। माधवराव दतिया का जन्म 18 अप्रैल, 1774 को पेशवा नारायणराव की विधवा के गर्भ से हुआ था। इस बच्चे को पेशवा के पद पर विराजमान करके वास्तविक सत्ता उसके नाना फड़णवीस के हाथों में चली गई। नाना फड़णवीस भी प्रारंभ से ही सत्तालोलुपता का शिकार थे। वह नहीं चाहते थे कि उनका दौहित्र बड़ा होकर पूर्णरूप से पेशवा के पदों पद के दायित्व का निर्वाह करे। अतः शक्तिलोलुप नाना ने माधवराव का व्यक्तित्व विकसित न होने दिया। नाना फड़णवीस ने बालक पेशवा के लिए उचित शिक्षा दीक्षा और अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा का भी उचित प्रबंध नहीं किया। सन् 1795 में निजाम के विरुद्ध खरड़ा के युद्ध में यह पेशवा केवल कुछ क्षणों के लिये ही उपस्थित हुआ था। इतिहासकारों का मानना है कि आकस्मिक रूप से हो, या आत्महत्या हो, अपने महल के छज्जे से गिरने के कारण पेशवा माधवराव की मृत्यु हो गई। वास्तव में माधवराव द्वितीय नाममात्र का ही पेशवा था। सन् 1774 से 1795 तक वह पेशवा पद के दायित्वों का निर्वाह करने योग्य भी नहीं हुआ था। उसके दायित्वों का निर्वाह उसके नाना फड़णवीस के माध्यम से किया गया जो केवल सत्ता लोलुपता के लिए पीछे से पेशवाई पद के दायित्व का निर्वाह कर रहा था। 21 वर्ष की अल्पायु में ही इस पेशवा का आकस्मिक देहांत हो गया।

चिमनाजी अप्पा

पेशवा माधवराव द्वितीय की आकस्मिक मृत्यु के पश्चात मराठा साम्राज्य में पेशवा पद पर नियुक्ति का प्रश्न फिर गंभीरता से खड़ा हो गया। इस समय मराठा साम्राज्य बहुत ही अस्त-व्यस्तता के काल से गुजर रहा था। सर्वत्र अशांति का साम्राज्य था। यद्यपि साम्राज्य की जनता अभी भी अपने शासकों के साथ थी और वह विद्रोह नहीं कर रही थी। यह अलग बात है कि विदेशी शक्तियाँ मराठा साम्राज्य की इस दुर्बलता का हर स्थिति में लाभ उठाने के लिए प्रयासरत थी। माधवराव द्वितीय के निस्संतान होने के कारण वास्तव में राज्याधिकार राघोबा के ज्येष्ठ पुत्र बाजीराव द्वितीय का था। किंतु नाना फड़नवीस उसके विपक्ष मे था। अतः नाना ने बाजीराव के अनुज चिमनाजी को उसकी अस्वीकृति पर भी पदासीन करने का निश्चय किया। स्पष्ट है कि इस समय नाना फड़णवीस का मराठा साम्राज्य की घरेलू राजनीति में हस्तक्षेप बहुत अधिक बढ़ चुका था। पेशवा पद पर चिमना जी की नियुक्ति को वैध ठहराने के लिये प्रथमतः 25 मई, 1796 को उसे माधवराव की विधवा यशोदाबाई से गोद लिवाया गया। जिससे कि किसी प्रकार का वैधानिक गतिरोध उत्तराधिकार के विषय में उत्पन्न ना हो। तदनंतर 2 जून को उसका पदारोहण हुआ। किंतु तत्काल ही आंतरिक विग्रह से प्रभावित हो नाना फड़नवीस ने बाजीराव के पक्ष में तथा चिमनाजी के विरुद्ध षड्यंत्र आयोजित किया। फलतः चिमनाजी बंदी हुआ, और 6 दिसम्बर, 1796 को बाजीराव पेशवा नियुक्त हुआ। इस प्रकार चिमना जी का भी शीघ्र ही अंत हो गया। कुछ भी हो, यह सब कुछ मराठा साम्राज्य के लिए बहुत ही अहितकर हो रहा था और इसका वास्तविक दुष्प्रभाव तो शिवाजी महाराज के द्वारा स्थापित किए गए हिंदवी स्वराज्य की रूपरेखा और आकार पर पड़ रहा था, जो अब निरंतर डगमगाती हुई नाव की भांति पानी के ऊपर तैर रहा था। अंतिम आँग्ल-मराठा युद्ध की समाप्ति पर जब बाजीराव ने अंग्रेजों के सम्मुख आत्मसमर्पण किया, चिमनाजी बनारस जाकर रहने लगा, जहाँ 1830 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।

सच ही तो है-

उत्कर्ष के पश्चात होती पराभव की अनुभूतियाँ।
उत्थान के पश्चात पतन को बचा न पाएं विभूतियाँ ।।
जो उदित होता प्रातः वही भानु डूबता है शाम को।
शाश्वत सत्य है यही प्रणाम सृष्टा के इस काम को ।।

बाजीराव द्वीतीय

मराठा साम्राज्य का सूर्य जब अस्तांचल की ओर अग्रसर हो रहा था तो रघुनाथ राव तथा मराठा दरबार के अभिभावक नाना फड़णवीस में तीव्र मतभेद उत्पन्न हो गए थे। ऐसी परिस्थितियों में माधवराव द्वीतीय की मृत्यु के उपरांत नाना ने बाजीराव की अपेक्षा उसके अनुज चिमना जी अप्पा को पेशवा घोषित किया। किंतु परिस्थितियों को अपने अनुकूल करने के लिए उन्होंने तुरंत ही चिमना जी को पदच्युत कर बाजीराव को पेशवा घोषित किया। बाजीराव द्वीतीय का जन्म 1775 में हुआ था। उसका अधिकांश जीवन बंदीगृह में व्यतीत होने के कारण उसकी शिक्षा-दीक्षा नितांत अधूरी रही।

उसकी प्रकृति भी कटु और विकृत हो गई। वह अयोग्य और अनुभवहीन होने के अतिरिक्त स्वभाव से दुर्मति तथा विश्वासघाती भी था। जिस नाना फड़णवीस ने उसको पेशवा के पद पर विराजमान किया था उसने उसी के साथ विश्वासघात किया। जिससे नाना फड़णवीस को अपने अंतिम दिनों में बहुत कष्टमय जीवन व्यतीत करना पड़ा। सन् 1800 में हुई नाना की मृत्यु से बाजीराव के दुर्व्यवहार तथा महाराष्ट्र की दयनीय अवस्था में वृद्धि होने लगी। पेशवा द्वारा विठोजी होल्कर की हत्या (1801) ने यशवंतराव होलकर को पेशवा पर आक्रमण करने के लिए उत्तेजित किया था। इस युद्ध में पेशवा तथा सिंधिया की पराजय हुई। 1802 में पेशवा की अंग्रेजों से बेसिन की संधि हुई। जिसके उपरांत बाजीराव पुनः पुणे पहुँचा। इसी क्रम में द्वीत्तीय आंग्ल मराठा युद्ध छिड़ गया। इस युद्ध में बाजीराव को अंग्रेजों का प्रभुत्व स्वीकार करना पड़ा था। युद्ध का सबसे घातक परिणाम यह निकला कि महाराष्ट्र की स्वतंत्रता समाप्त हो गई। जिस मराठा साम्राज्य की स्थापना शिवाजी महाराज ने हिंदवी स्वराज्य के रूप में की थी, अब उसका अस्तित्व समाप्त हो गया। अंतिम आंग्ल मराठा युद्ध में अंग्रेजों ने पुनः बाजीराव द्वीतीय को सन्धि के लिए बाध्य कर दिया, जिससे उसे मराठा साम्राज्य पर अपना अधिकार त्यागना पड़ा। अंत में युद्ध की समाप्ति पर 5 नवंबर, 1817 को मराठा साम्राज्य अंग्रेजों के अधिकार में हो गया। बाजीराव अंग्रेजों की पेंशन पाकर बिठूर (उत्तर प्रदेश) जाकर निवास करने लगा। वहीं 28 जनवरी, 1851 में उसकी मृत्यु हो गई।

इसी बाजीराव द्वीतीय के दत्तक पुत्र पेशवा नानासाहेब द्वितीय थे, जो 1857 की क्रांति के महानायक बने।

क्रमशः

– डॉ॰ राकेश कुमार आर्य
मुख्य संपादक, उगता भारत

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