इंडिया गठबंधन की रार से में पिसते क्षेत्रीय दल

इंडिया गठबंधन

कांग्रेस के नेतृत्व वाले ‘इंडिया गठबंधन’ में नेतृत्व के सवाल पर जो मौजूदा चिल्ल-पों मची हुई है और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व पर एक बार फिर से जो सवाल उठाए जा रहे हैं, उससे न तो तृणमूल कांग्रेस नेत्री व पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का राजनीतिक भला होने वाला है और न ही उनकी सुर में सुर मिलाने वाले एनसीपी शरद पवार के शरद पवार-सुप्रिया सुले, शिवसेना यूबीटी के उद्धव ठाकरे-आदित्य ठाकरे, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव-रामगोपाल यादव या आप पार्टी के अरविंद केजरीवाल आदि जैसे नेताओं का। हां, इससे कांग्रेस आई की उस सियासी साख को धक्का अवश्य लगेगा, जो कि बमुश्किल उसने राहुल गांधी के नेतृत्व में लोकसभा चुनाव 2024 के बाद हासिल कर पाई है।

राजनीतिक मामलों के जानकारों का स्पष्ट कहना है कि कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी के लिए हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा की हार जरूर मायने रखती है क्योंकि यह जीती हुई बाजी हारने के जैसा है लेकिन सिर्फ इसको लेकर ही इंडिया गठबंधन का नेतृत्व कांग्रेस से छीन लेना कोई राजनीतिक बुद्धिमानी का काम प्रतीत नहीं होता है। शायद कांग्रेस भी इसे नहीं मानेगी और किसी भी राष्ट्रीय दल को क्षेत्रीय दलों के सामने घुटने भी नहीं टेकने चाहिए, यदि सत्ता प्राप्ति के लिए संख्या बल का खेल नहीं हो तो! बीजेपी भी यही करती है और अपने गठबंधन सहयोगियों को उनकी वाजिब औकात में रखती है। तीसरे-चौथे मोर्चे की विफलता के पीछे भी तो अनुशासनहीनता या अतिशय महत्वाकांक्षा का खेल ही तो था, जिसे बहुधा राजनीतिक रोग समझा जाता है।

बता दें कि तृणमूल कांग्रेस नेता कल्याण बनर्जी ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव का परिणाम आने के बाद तुरंत कहा था कि कांग्रेस और इंडिया ब्लॉक को अपने अहंकार को अलग रखना चाहिए और ममता बनर्जी को विपक्षी गठबंधन के नेता के रूप में मान्यता देनी चाहिए। इसके बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी हालिया हरियाणा और महाराष्ट्र चुनाव में इंडिया ब्लॉक के खराब प्रदर्शन पर असंतोष जाहिर किया और संकेत दिया कि अगर मौका मिला तो वह इंडिया ब्लॉक की कमान संभालने के लिए तैयार हैं।

तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सुप्रीमो ने यहां तक कहा कि वह बंगाल की मुख्यमंत्री के रूप में अपनी भूमिका जारी रखते हुए भी विपक्षी मोर्चे को चलाने की दोहरी जिम्मेदारी संभाल सकती हैं। एक टीवी चैनल से बात करते हुए ममता बनर्जी ने कहा, ‘मैंने इंडिया ब्लॉक का गठन किया था, अब मोर्चा का नेतृत्व करने वालों पर इसका प्रबंधन करने की जिम्मेदारी है। अगर वे इसे नहीं चला सकते तो मैं क्या कर सकती हूं? मैं सिर्फ इतना कहूंगी कि सभी को साथ लेकर चलना होगा।‘ वहीं, यह पूछे जाने पर कि एक मजबूत भाजपा विरोधी ताकत के रूप में अपनी साख के बावजूद वह इंडिया ब्लॉक की कमान क्यों नहीं संभाल रही हैं? तो इस पर बनर्जी ने कहा, “अगर मौका मिला तो मैं इसके सुचारू संचालन को सुनिश्चित करूंगी।” उन्होंने कहा, “मैं बंगाल से बाहर नहीं जाना चाहती लेकिन मैं इसे यहीं से चला सकती हूं।”

बता दें कि बीजेपी का मुकाबला करने के लिए गठित इंडिया (INDIA) ब्लॉक में दो दर्जन से अधिक विपक्षी दल शामिल हैं हालांकि आंतरिक मतभेदों और आपसी तालमेल की कमी की वजह से इसकी कई बार आलोचना भी होती रही है। इसी वजह से इसके प्रमुख सूत्रधार रहे जदयू नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपना पाला बदल लिया और भाजपा के खेमे में चले गए। वो भी इंडिया गठबंधन के संयोजक का पद पाना चाहते थे जो लालू प्रसाद के परोक्ष विरोध के चलते सम्भव नहीं हो पाया। ऐसे में संभव है कि ममता भी एकबार फिर से तीसरे मोर्चे को मजबूत करने की पहल करें और नीतीश की तरह ही इंडिया गठबंधन को टा-टा, बाय-बाय कर दें।

उल्लेखनीय है कि ममता बनर्जी का यह बयान उनकी पार्टी सांसद कल्याण बनर्जी द्वारा कांग्रेस और अन्य इंडिया ब्लॉक सहयोगियों को लेकर दिए बयान के बाद सामने आया है। तब कल्याण बनर्जी ने कहा था कि कांग्रेस और इंडिया ब्लॉक को अपने अहंकार को अलग रखना चाहिए और ममता बनर्जी को विपक्षी गठबंधन के नेता के रूप में मान्यता देनी चाहिए। आपको बता दें कि बीजेपी ने जहां महाराष्ट्र में शानदार प्रदर्शन करते हुए रिकॉर्ड संख्या में सीटें हासिल कीं तो वहीं कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद खराब रहा। बीजेपी के नेतृत्व वाले सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन को भारी जीत मिली जबकि इंडिया ब्लॉक ने सिर्फ झारखंड में जेएमएम के शानदार प्रदर्शन की बदौलत मजबूत वापसी की। कहने का तात्पर्य यह है कि कांग्रेस ने अपनी हार का सिलसिला जारी रखा और हरियाणा के बाद महाराष्ट्र में भी अपना सबसे खराब प्रदर्शन किया और झारखंड में सत्तारूढ़ जेएमएम के जूनियर पार्टनर के रूप में सामने आई और विपक्षी ब्लॉक में इसकी भूमिका और भी कम हो गई क्योंकि अन्य सहयोगियों ने इससे बेहतर प्रदर्शन किया।

वहीं, दूसरी ओर हाल ही में हुए उपचुनावों में भाजपा को हराकर टीएमसी की जीत ने पश्चिम बंगाल में पार्टी के प्रभुत्व को मजबूत किया है, जबकि विपक्षी अभियान आरजी कर मेडिकल कॉलेज विरोध जैसे विवादों पर केंद्रित थे। सीपीआई (एम) के नेतृत्व वाले वाम मोर्चे, उसके सहयोगी सीपीआई (एमएल) लिबरेशन और कांग्रेस, जो इंडिया ब्लॉक में राष्ट्रीय स्तर पर टीएमसी के सहयोगी हैं, सभी को बड़ी असफलताओं का सामना करना पड़ा और उनके उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई जबकि कांग्रेस इंडिया ब्लॉक की सबसे बड़ी पार्टी है जिसे अक्सर गठबंधन का वास्तविक नेता माना जाता है। यही वजह है कि टीएमसी ने लगातार ममता बनर्जी को गठबंधन की बागडोर संभालने की वकालत की है।

यह ठीक है कि तृणमूल कांग्रेस नेत्री ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में लगातार भाजपा को सियासी चोट पहुंचा रही हैं और सदैव उस पर भारी प्रतीत हो रही हैं लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि वह राष्ट्रीय नेत्री बन गईं और उनका चेहरा लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के चेहरे से ज्यादा सर्वस्वीकार्य हो गया, वो भी अखिल भारतीय स्तर पर? चाहे राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) शरद पवार के प्रमुख और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री शरद पवार हों या उनकी सियासी वारिस सांसद सुप्रिया सुले, शिवसेना यूबीटी के प्रमुख और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे हों या उनके राजनीतिक वारिस आदित्य ठाकरे, समाजवादी पार्टी के प्रमुख और उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव हों या राज्यसभा सांसद रामगोपाल यादव या आप पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक व दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हों या उन जैसे इंडिया गठबंधन के कोई अन्य नेतागण, किसी का चेहरा राष्ट्रीय स्तर पर उतना सर्वस्वीकार्य नहीं हो सकता है जितना कि राज्यसभा सांसद सोनिया गांधी, लोकसभा सांसद प्रियंका गांधी या लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का है, इसलिए समकालीन बयानबाजी से इंडिया गठबंधन और उसमें शामिल सभी दलों को ही क्षति होगी, यह उन्हें समझना होगा।

वैसे भी भारतीय मतदाताओं के बीच कांग्रेस नीत यूपीए गठबंधन, राजद-सपा-झामुमो नीत महागठबंधन, शिवसेना यूबीटी-एनसीपी शरद पवार नीत महाविकास अघाड़ी के अलावा तीसरे या चौथे मोर्चे में शामिल रहे क्षेत्रीय दलों की साख अच्छी नहीं है। जनता पार्टी, जनता दल और संयुक्त मोर्चे की कई गठबंधन सरकारों को असमय गिराने का आरोप जहां कांग्रेस पर लगता आया है, वहीं तीसरे मोर्चे और चौथे मोर्चे के बारे में तो राजनीतिक अवधारणा यही है कि इन्हें केंद्र में सरकार चलाना ही नहीं आता और इसमें शामिल दल भले ही अपने-अपने राज्यों में सफल रहे हों लेकिन सुशासन स्थापित करने और भ्रष्टाचार रोकने में अकसर विफल रहे हैं जिससे ब्रेक के बाद मतदाता इन्हें खारिज कर देते हैं। इनकी इसी कमजोरी का राजनीतिक फायदा भाजपा को मिला जबकि ये लोग उसे राजनीतिक अछूत तक करार दे चुके हैं।

बता दें कि 1990 के दशक में कोई भी दल पहले भाजपा से गठबंधन करने से सिर्फ इसलिए डरता था कि कहीं उसका मुस्लिम वोट छिटक न जाए लेकिन अपने राष्ट्रवादी और हिंदुत्व के अग्रगामी विचारों के साथ-साथ बीजेपी ने सुशासन, विकास और गठबंधन सरकार चलाने की योग्यता को साबित करके भारतीय मतदाताओं का दिल एक नहीं, बल्कि कई बार जीत लिया और कांग्रेस के अधिकांश पुराने सियासी रिकॉर्ड को मोदी 3.0 सरकार ने ध्वस्त कर दिया है जिसके बाद उसकी लोकप्रियता एक बार फिर से उफान पर है।

वहीं, लोकसभा चुनाव 2024 में इंडिया गठबंधन खासकर कांग्रेस-सपा गठजोड़ से उसे जो धक्का लगा, उसकी भरपाई उसने हरियाणा-महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों से कर लिया है। लोकसभा चुनाव 2024 में भी भाजपा ने आरएसएस की उपेक्षा की कीमत चुकाई थी अन्यथा आज वह अपने गठबंधन सहयोगियों पर निर्भर नहीं रहती। लेकिन अब उसके इशारे पर जिस तरह से इंडिया गठबंधन में अंतर्कलह मची हुई है, उससे आम चुनाव 2029 में भी उसका निष्कंटक राज बरकरार रहने के आसार हैं। यदि ऐसा हुआ तो कांग्रेस बीजेपी से काफी पीछे चली जाएगी, जिसकी भरपाई वो शायद ही कभी कर पाए।

वैसे भी भारतीय राजनीति में गठबंधन धर्म का पालन करने का रिकॉर्ड कांग्रेस और तीसरे-चौथे मोर्चा से बेहतर भाजपा का है। इसलिए वह दिन-प्रतिदिन मजबूत होती गई और कांग्रेस या तीसरे-चौथे मोर्चे के दल कमजोर दर कमजोर। बहरहाल, कांग्रेस नेतृत्व की बुद्धिमानी इसी में है कि वह तीसरे-चौथे मोर्चे में शामिल रहे क्षेत्रीय दलों, यूपीए या महागठबंधन और महाविकास अघाड़ी सहयोगियों को हर हाल में अपने साथ तब तक जोड़े रखे, जब तक कि लोकसभा में उसका आंकड़ा 300 के पार न चला जाए।

राजनीतिक मामलों के जानकार बताते हैं कि तृणमूल कांग्रेस की नेत्री ममता बनर्जी हों, या एनसीपी शरद पवार के शरद पवार या शिवसेना यूबीटी के उद्धव ठाकरे, ये लोग कभी न कभी भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सदस्य या उसके परोक्ष शुभचिंतक रह चुके हैं, इसलिए कांग्रेस विरोधी इनकी बयानबाजी का मकसद भाजपा को खुश रखना है और इसी बहाने कांग्रेस पर दवाब बनाए रखना। वहीं, उत्तरप्रदेश में सपा नेता रामगोपाल यादव जो कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर तंज कस रहे हैं, वह यूपी विधानसभा उपचुनाव 2024 में कांग्रेस की उपेक्षा के बाद मिली शर्मनाक हार की खुन्नस है। यदि अखिलेश यादव ने रामगोपाल यादव को काबू में नहीं किया तो 2022 की तरह 2027 में भी सपा के सपने नहीं पूरे होने वाले।

रही बात इंडिया गठबंधन के नेतृत्व की तो ममता बनर्जी को आगे रखकर चाहे कांग्रेस पर जितना भी दबाव बना लिया जाए लेकिन राहुल की कांग्रेस अपनी मस्त सियासी चाल चलती है बिना सियासी नफा-नुकसान के। इसे इंडिया गठबंधन में शामिल दलों को समझना होगा अन्यथा पश्चिम बंगाल के अलावा कहीं उनका कोई भविष्य नहीं होगा। चाहे जम्मू कश्मीर हो या झारखंड, यदि क्रमशः नेशनल कांफ्रेंस और झारखंड मुक्ति मोर्चा नीत इंडिया गठबंधन सत्ता में आई है तो सिर्फ कांग्रेस व नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की वजह से, अन्यथा लोकसभा चुनाव 2024 में यूपी की 80 में 37 सीट कांग्रेस के सहयोग से जीतने वाली सपा, कांग्रेस की कथित छत्रछाया से हटते ही यूपी विधानसभा चुनाव में 9 में से महज 2 सीट ही निकाल पाई। यदि उसने कांग्रेस का सम्मान किया होता तो इतनी फजीहत नहीं होती।

कुछ यही हाल आप का होगा दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 में जो अभी कांग्रेस को हल्के में लेकर चल रही है। बिहार में कांग्रेस को कम तवज्जो देकर राजद नेता तेजस्वी यादव अपनी भद्द पिटवा ही रहे हैं। इसलिए किस नेता ने कांग्रेस या राहुल गांधी के खिलाफ क्या कहा, उनकी बातों को यहां पर मैं नहीं दुहराना चाहता बल्कि सिर्फ यह सलाह देना चाहता हूं कि भारतीय राजनीति में यदि क्षेत्रीय दलों को प्रासंगिक बने रहना है तो कांग्रेस या भाजपा को साधकर चलें अन्यथा सियासी दुर्भाग्य आपका पीछा नहीं छोड़ेगा। सब ममता बनर्जी या अरविंद केजरीवाल नहीं हो सकते!

– कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

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