ईश्वर में अविश्वास क्यों ?

ईश्वर

व्याख्याता – शास्त्रार्थ महारथी पं॰ रामचंद्र देहलवी जी
प्रस्तुति –  ‘अवत्सार’

आजकल कुछ मित्रादि अथवा दूसरे व्यक्ति जब मुझसे मिलते हैं तो मुझसे प्रायः वह प्रश्न किया करते हैं, “क्या कारण है कि ईश्वर के अस्तित्व के विषय में इतने भाषण होते हैं फिर भी लोगों का ईश्वर में विश्वास समाप्त होता जा रहा है ?” बात सत्य है और मुझे यह स्वीकार करना पड़ता है कि लोगों का ईश्वर में अविश्वास बढ़ता जा रहा है। आज मैं ईश्वर में अविश्वास क्यों बढ़ता जा रहा है, इसके क्या कारण हैं, इसी विषय पर विचार रक्खूगा।

(१) परिवार में ईश्वर-भक्ति या पूजा का न किया जाना-
आज-कल परिवारों में न ईश्वर-भक्ति है न ईश्वर आराधना किया जाता है, संध्या, अग्निहोत्र आदि की ओर भी कोई ध्यान नहीं है। इनके न होने के कारण ईश्वर के अस्तित्व का विश्वास समाप्त होता जा रहा है। जहां हर समय रेडियो बजता है, सिनेमा के गाने गाये जाते हैं, और अल्ला से ज्यादा नम्बर सुरैया का है, वहां ईश्वर को कौन पूछता है । जैसा घर का वातावरण होता है वैसा ही प्रभाव पडता है। घर में ईश्वर भक्ति या पूजा न होने के कारण ईश्वर को भूल जाते हैं, ईश्वर का विचार ही नहीं रहता । ईश्वर में आस्था और विश्वास उत्पन्न करने के लिए ईश्वर-भक्ति और पूजा जारी रहनी चाहिए।

(२) ईश्वर को ऐसे रूप में रखना जो समझ में न आये-
ईश्वर सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, न्यायकारी, दयालु, सर्वव्यापक है, परन्तु साम्प्रदायी लोगों ने उसको साधारण जनता के सामने उल्टे ढंग से रक्खा है। साम्प्रदायी लोगों ने परमात्मा को गलत समझ और उसको उसी गलत रूप में लोगों के सामने रख दिया । इसमें परमात्मा का कोई दोष नहीं क्योंकि परमात्मा तो सबको ज्ञान देता है। जब भी कोई बुरा कर्म करने लगता है तो उसे उस कार्य के करने में भय, शंका और लज्जा होती है, परन्तु इस ज्ञान को लेता कोई-कोई है । जैसे मच्छर सारे में ‘पिन-पिन’ करता है परन्तु सुनाई उस समय देता है जब वह कान के पास आता है। साम्प्रदायी लोगों ने अपने अज्ञान के कारण मकान के एक आले में गणेश की मूर्ति रख कर ईश्वर घोषित कर दिया। परन्तु क्या गणेश ईश्वर हो सकता है ? कदापि नहीं।

क्या हाथी का सर कभी किसी बच्चे के सिर पर आ सकता है ? ऐसी बातों में अविश्वास तो होगा ही। महर्षि दयानन्द ने अपने अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश में मूर्ति पूजा को अवैदिक बताते हुए इसके खण्डन में १६ युक्तियां दी हैं । मूर्ति-पूजकों ने मूर्तियों को ईश्वर का प्रतिनिधि बना दिया। मूर्ति ने भी इतनी गैरत (शर्म) तो की कि ईश्वर नहीं खाता तो वह भी नहीं खाती क्योंकि वह ईश्वर का प्रतिनिधित्व कर रही है। आज सारी बातें उल्टी हो गई हैं । लोग ईश्वर को बनाकर उसके मालिक हो गये हैं । जो सबका ख्याल रखता है, लोग उसका ख्याल रखने लगे हैं उसको ताला लगाकर रखते हैं । उसे जगाने और खिलाने का ध्यान भी पुजारी रखता है। वास्तव में तो पुजारी लोगों को यह शिक्षा देता है कि मूर्ति जड़ है, चेतन नहीं है, इसकी पूजा नहीं करनी चाहिए, परन्तु लोग छोड़ते नहीं हैं। पुजारी का अर्थ है पूजा+अरि पूजा का शत्रु । दिन के प्रकाश में बत्ती जलाकर और घण्टी बजाता हुआ पुजारी लोगों को मूर्ति का एक-एक अवयव दिखाता है और उन्हें यह बताता है कि अच्छी प्रकार देख लो, यह पत्थर है, जड़ है, चेतन नहीं। इसी प्रकार एक बार नहीं, दो बार नहीं सात बार ऊपर से नीचे तक दिखाता है कि पत्थर है। लोग फिर भी हाथ जोड़े ही खड़े रहते हैं तो वह हाथ में पानी लेकर उनके ऊपर फेंकता है कि अब भी समझ में नहीं आता तो एक चुल्लू पानी में डूब मरो परमात्मा का वास्तविक स्वरूप तो वेद ही बताता है।

सपर्यगाच्छुक्रमकायमव्रण मस्नाविर शुद्धमपापविद्धम् ।
कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छा श्वतीभ्यः समाभ्यः ॥ (यजु० ४०।८)

वह प्रभु सर्वत्र व्यापक, सर्वोत्पादक, शरीर तथा नस नाड़ी के बन्धन से मुक्त, शुद्ध और पाप रहित है। वह क्रान्तदर्शी, मन की बात जानने वाला सर्वत्र प्रकट और स्वतन्त्र सत्ता है तथा ठीक-ठीक रचना करता है।

कुछ लोग कहते हैं कि ब्रह्म ही ब्रह्म है और सब कुछ मिथ्या है परन्तु यह भी गलत बात है। कोई भी वस्तु अकेली बेकार होती है चाहे डाक्टर हो या प्रोफेसर, दुकानदार हो या दस्तकार । एक डाक्टर है परन्तु न उसके पास दवाई है न औजार है तो उसका होना और न होना बराबर है। डाक्टर है, दवाई भी है, परन्तु मरीज नहीं, तब भी बेकार है । अतः सिद्धांत यह निकला कि किसी भी कार्य के लिए तीन वस्तुओं का होना आवश्यक है। इसी प्रकार परमात्मा, जीवात्मा और प्रकृति तीनों का होना अत्यावश्यक है। यह सिद्धान्त भी अशुद्ध है कि जीवात्मा परमात्मा बन जाता है। जीवात्मा परमात्मा कदापि नहीं बन सकता।

(३) बहुत प्रार्थना करने पर भी इच्छा को पूर्ति न होना-
कभी कभी ऐसा होता है कि बहुत बार प्रार्थना करने पर भी इच्छा पूरी नहीं होती। इससे ईश्वर में अविश्वास उत्पन्न होता है । जब लोगों की इच्छा पूरी नहीं होती तो वे कहते हैं कि परमात्मा अपने पुत्र जीवात्मा को इच्छा पूरी करने में (Miserably Fail) बुरी तरह फेल हो गया । परन्तु यह बात ठीक नहीं। इसका समाधान एक दृष्टान्त द्वारा बहुत अच्छी प्रकार समझ में आ जायेगा । एक पिता अपने बच्चे के साथ बाजार जा रहा है। बाजार में जाते हुए बच्चा बड़े पकोड़े देखता है और पिता से कहता है दिलवा दो। पिता कहता है तुम्हें काली खांसी है। ये हानि करेंगे। बच्चा दूसरी और तीसरी बार कहता है परन्तु दिलवाता नहीं। घर अपने सब भाई-बहिनों को इकटठा करके कहे कि हमारे पिता जा हमारी इच्छा की पूर्ति में फेल हो गए हैं तो क्या यह ठीक है । इसी प्रकार बच्चा पतंग उड़ाने जा रहा हो और पिता कहे कि नीचे चलो, तो क्या पिता बच्चों की इच्छा पूर्ति करने में फेल हो गया ? ठीक यही दशा उस प्रार्थना की है । जब ईश्वर देखता है कि इस प्रार्थना से लाभ नहीं होगा तो वह इच्छा को पूर्ति नहीं करता। ईश्वर फेल नहीं होता।

प्रार्थना का फल इच्छा की पूर्ति नहीं अपितु प्रार्थना का फल अभिमान का नाश, उत्साह की वृद्धि और सहाय का मिलना । कभी मनुष्य जब किसी कठिन कार्य को कर लेता है तो उसको अपनी शक्ति का अभिमान हो जाता है, परन्तु जब वह यह सोचता है कि ईश्वर अधिक शक्तिशाली है तो उसका अभिमान चूर हो जाता है। जब मनुष्य का ईश्वर में पूर्ण विश्वास होता है तो उसमें उत्साह की वृद्धि होती है और कार्य करते हुए उसमें सहायता भी प्राप्त होती है।

उपासना से पहाड़ के समान दुःख आने पर भी मनुष्य घबराता नहीं क्योंकि वह समझता है कि इस कष्ट में भी मेरी भलाई है।

एक बच्चे को उसके माता-पिता नश्तर लगवाने के लिए ले गए। माता-पिता दोनों ने बच्चे के हाथ और पैरों को कसकर पकड़ लिया। बच्चा सोचता है कि यह क्या हो रहा है, जो माता-पिता मेरे लिए दूसरों से लड़ते थे, आज क्या कर रहे हैं ? परन्तु माता पिता किसी बुरी भावना से ऐसा नहीं कर रहे अपितु अपने पुत्र की भलाई के लिए ऐसा कर रहे हैं। आपत्ति और कष्ट आने पर भी ईश्वर पर दृढ़ विश्वास होना चाहिए । ईश्वर जो कुछ करता है अच्छा ही करता है।

(४) भगवान् जागरूक नहीं, प्रमाद में पड़ा हुआ है । पुलिस कितनी सतर्क है। दिन का तो कहना ही क्या, रात में भी चोर और डाकुओं को पकड़ती है, किन्तु ईश्वर कुछ नहीं करता इसलिए प्रमादी है, और उसके प्रमादी होने से ही लोगों में ईश्वर अविश्वास बढ़ता जा रहा है।

समाधान– यहां एक ही बात के हिस्से कर दिये हैं। गवर्नमेंट परमात्मा का ही प्रबन्ध है । वह ईश्वर के कार्य में सहायक है । ईश्वर सब कुछ देखता है परन्तु सब कुछ नहीं कर सकता और सब कुछ करना आवश्यक भी नहीं । परमात्मा कर्मों के अनुसार जीव को फल देता है, इसमें तनिक भी त्रुटि नहीं हो सकती। परमात्मा सदा जागरूक रहता है, वह प्रमादी कदापि नहीं हो सकता।

(५) किसी प्रिय व्यक्ति का नाश हो जाना या मर जाना-जब किसी व्यक्ति का कोई प्रिय सम्बन्धी मर जाता है तो उसे ईश्वर में अविश्वास हो जाता है। एक पीर जी की घर वाली मर गई तो कहने लगा-तेरा क्या गया, मेरा घर बिगड़ गया। इन बच्चों को तू पालेगा क्या?

समाधान– जब ईश्वर की ओर से विपत्ति आती है तो समझना चाहिए कि इसमें हमारी भलाई है क्योंकि विपत्तियां मनुष्य को ऊंचा उठाती हैं। संसार के महापुरुषों पर विपत्तियां आई हैं। विपत्तियां तो प्रभु की याद दिलाने के लिए आती हैं, परन्तु लोग फिर भी ईश्वर को भूल जाते हैं। मृत्यु क्या है ? प्रकृति और जीवात्मा के मिलाप का नाम जन्म और प्रकृति तथा जीवात्मा के वियोग का नाम मृत्यु है, जो उत्पन्न हुआ है वह मरेगा अवश्य । योगेश्वर कृष्ण ने भी गीता में ऐसा कहा है –

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युध्रुवं जन्म मृतस्य च। (गीता २।२७)

जो उत्पन्न हुआ है वह अवश्य मरेगा और जो मरेगा उसका जन्म भी अवश्य होगा। जब जन्म के पीछे मृत्यु और मृत्यु के पश्चात् जन्म लगा हुआ है तो घबराहट और निराशा किसलिए?

(६) पापियों को सुख में और पुण्यात्माओं को दुःख में देखकर ईश्वर में अविश्वास पैदा होता है।

समाधान– पापियों को सुख में और पुण्यात्माओं को दुःख में देखकर लोग कारण और कार्य का सम्बन्ध लगा देते हैं। इसी उल्टी धारणा से ईश्वर में अविश्वास उत्पन्न होता है। एक व्यक्ति कर्म तो अच्छा कर रहा है और उसका फल उसे दुःख मिले, यह कदापि नहीं हो सकता। अच्छा कर्म करते हुए दुःख आ गया यह बात तो ठीक है, परन्तु यहां कार्य और कारण के सम्बन्ध नहीं है, दूसरी ओर एक व्यक्ति कार्य बुरा कर रहा है और उसे फल अच्छा मिल जाये, यह भी ठीक नहीं। एक उदाहरण से यह बात स्पष्ट हो जायेगी। एक व्यक्ति ने चोरी की और फिर सन्ध्या करने लगा। पुलिस आई और उसे पकड़ कर ले गई। इस व्यक्ति को सन्ध्या के कारण नहीं पकड़ा गया। पापियों को सुख और पुण्यात्माओं को दुःख पूर्व जन्म के कर्मों के कारण हैं।

(७) घातक का न पकड़ा जाना और निर्दोष का फंस जाना-
कभी-कभी ऐसा भी होता है कि कत्ल करने वाला बच जाता है और निर्दोष व्यक्ति फंस जाता है तो लोग कहते हैं कि यह क्या प्रबन्ध है।

समाधान– यह ठीक है कि कभी-कभी निर्दोष व्यक्ति भी फंस जाते हैं। फंसने वाला व्यक्ति निर्दोष अवश्य है परन्तु उसका पहला कोई ऐसा कार्य हो सकता है जिसका दण्ड उसे भोगना शेष हो । और बहुत से व्यक्ति पकड़े जाने के पश्चात् छूट भी जाते हैं ।

(८) विद्वानों का निर्धन और मूर्खों का धनी होना-
यह भी ईश्वर अविश्वास का एक कारण है। परन्तु सभी विद्वान निर्धन हों और सभी मूर्ख धनी हों यह बात गलत है। स्वामी दर्शनानन्द जी भतपूर्व श्री कृपाराम जी अद्भुत तार्किक और विद्वान होते हुए भी बहुत धनवान् थे । ऐसे अनेकों उदाहरण हैं।

(९) भगवान के कार्यों में कोई व्यवस्था नहीं जैसी मनुष्य के कार्यों में है। भगवान की रचना में कोई क्रम नहीं है। एक बाग और पहाड़ को लो । बाग में नींबू की लाइन एक ओर, सन्तरे की लाइन एक ओर, और आम के वृक्ष अलग लाइन में, प्रत्येक वस्त एक नियम में होगी। इसके विपरीत पहाड़ पर एक वृक्ष यहां एक वृक्ष वहां है, कोई कहीं और कोई कहीं, किसी प्रकार का क्रम नहीं है।

समाधान– परमात्मा की सृष्टि में क्रम है और उत्कृष्ट क्रम है । परमात्मा की सृष्टि रचना में क्रम न मानना ऐसा ही है जैसे एक चींटी मनुष्य के ऊपर चढ़ पाये और पेट तथा छाती के ऊपर जाकर सोचे यह बड़ा अच्छा मैदान है, फिर ऊपर चलकर दाढ़ी और मूछों में पहुंच जाये तो कहे, यहां तो बड़ा भारी जंगल है। नाक के छिद्रों पर आकर कहे कि यहां तो छिद्र हो रहे हैं और ऊपर चढकर आंखों के गढ़ों को देखकर कहे कि यहां तो बड़ी ऊबड़ खाबड़ जगह है । इस प्रकार एक चींटी की दृष्टि में यह शरीर बड़ा बेढंग है। कहीं मैदान कहीं जंगल है, कहीं छिद्र है और कहीं ऊबड़ खाबड़ है परन्तु किसी शरीर के विशेषज्ञ से पूछिए तो कहेगा कि यह तो प्रभु को सर्वोत्कृष्ट रचना है। एक और उदाहरण लीजिए, एक शब्दकोष में वर्णमाला के अनुसार क्रम होगा परन्तु एक विद्वान् की पुस्तक में शब्दकोष का क्रम नहीं होता अपितु विद्यासम्बन्धी क्रम होता है। इसी प्रकार प्रभु की रचना में बाग का क्रम नहीं होता अपितु एक विशिष्ट प्रकार का क्रम होता है जो ईश्वर की बुद्धिमत्ता और सर्वोत्कृष्ट रचना का पूर्ण परिचायक होता है।

ईश्वर अविश्वास के इन आक्षेपों पर तनिक विचार करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि ईश्वर अविश्वास के आक्षेप सर्वथा निराधार हैं। यदि ईश्वर को उसके वास्तविक रूप में लोगों के सामने रक्ता जाये और घर-घर में ईश्वर भक्ति और ईश्वर-पूजा हो तो वह दिन दूर नहीं जब भारत का बच्चा-बच्चा आस्तिक होगा।

व्याख्याता – शास्त्रार्थ महारथी पं॰ रामचंद्र देहलवी जी
प्रस्तुति –  ‘अवत्सार’

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