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धर्म-अध्यात्म

ध्यान का प्रपंच और भोली -भाली जनता* *भाग-5*

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विशेष : आजकल आपको अधिकांश बड़े शहरों में ध्यान केंद्र और ध्यान गुरु मिलेंगे ,लेखी। ये ध्यान के नाम पर अपनी दुकान चला रहे है।ध्यान की स्थिति तक पहुंचने से पहले साधक को किस किस स्थिति से गुजरना होता है ,ये नहीं बताया जाता।
ये लेख माला 7 भागों में है ,जो वैदिक विद्वानों के लेख और विचारों पर आधारित है। जनहित में आपके सम्मुख प्रस्तुत करना मेरा उद्देश्य है , कृपया ज्ञानप्रसारण के लिए शेयर करें और अपने विचार बताए।
डॉ डी के गर्ग

– योग का पांचवा अंग है- प्रत्याहार

कुछ लोगों का कहना है कि प्रत्याहार का मतलब है लंबे लंबे उपवास करना ,जितना लंबा उपवास उतना ही बड़ा तपस्वी ।शायद जैन समाज में यही भ्रांति है और आहार छोड़ देने को तपस्या का नाम दे दिया ।

प्रत्याहार का वास्तविक अर्थ है-पीछे लौटाना।इन्द्रियों को उनके भोंगों से लौटाने का नाम प्रत्याहार है।जब आंखें खुली रहने पर भी रूप को देखना बन्द कर दें,कान शब्दों का सुनना बन्द कर दें,नासिका गन्ध का ग्रहण न करे,जिह्वा रस को न चखे और त्वचा स्पर्श का अनुभव न करे,उस अवस्था का नाम प्रत्याहार है। मोटे शब्दों में कहें तो मन को एक लक्ष्य पर एकाग्र करने के लिए उसे बाह्य विषयों से समेटने का नाम प्रत्याहार है।बाह्य विषयों से हटने पर ही मन को ध्यान-लक्ष्य पर केन्द्रित किया जा सकता है प्रत्याहार वह महान् कुञ्जी है जो धारणा, ध्यान और समाधि के द्वारों को खोल देती है।
संक्षिप में आंख, कान, नासिका आदि दसों इन्द्रियों को संसार के विषयों से हटाकर मन के साथ-साथ रोक अर्थात् बांध देने को प्रत्याहार कहते हैं।प्रत्याहार का मोटा स्वरूप है- संयम रखना, इन्द्रियों पर संयम रखना।
उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति मीठा बहुत खाता है, कुछ समय बाद वह अपनी मीठा खाने की आदत में तो संयम ले आता है, परन्तु अब उसकी प्रवृति नमकीन खाने में हो जाती है। यह कहा जा सकता है कि वह पहले भी और अब भी अपनी रसना इन्द्रिय पर संयम रख पाने में असफल रहा। उसने मधुर रस को काबू करने का प्रयत्न किया, तो उसकी इन्द्रिय दूसरे रस में लग गई। इसी भांति, अगर कोई व्यक्ति अपनी एक इन्द्रिय को संयमित कर लेता है, तो वह अन्य इन्द्रिय के विषय- देखना, सुनना, सूंघना, स्वाद लेना, स्पर्श करना आदि में और अधिक आनन्द लेने लगता है। अगर, एक इन्द्रिय को रोकने में ही बड़ी कठिनाई है तो, पाँचों ज्ञानोन्द्रियों को रोकना तो बहुत कठिन हो जायेगा।
कैसे अपनी इन्द्रियों को वश में रखना, इस बात को प्रत्याहार में समझाया है। एक को रोकते हैं, तो, दूसरी इन्द्रिय तेज हो जाती है। दूसरी को रोकें तो तीसरी, तीसरी को रोकें तो चौथी, तो पाँचों ज्ञानेनिद्रयों को कैसे रोकें? इसके लिए एक बहुत अच्छा उदाहरण देकर हमें समझाया जाता है, जैसे जब रानी मक्खी कहीं जाकर बैठ जाती है, तो उसके इर्द-गिर्द सारी मक्खियाँ बैठ जाती हैं। उसी प्रकार से हमारे शरीर के अन्दर मन है। वह रानी मक्खी है और बाकी इन्द्रियाँ बाकी मक्खियाँ हैं। संसार में से उस रानी मक्खी को हटाकर भगवान में बिठा दो। फिर यह अनियंत्रित देखना, सूंघना व छूना आदि सब बन्द हो जायेंगे।
प्रत्याहार की सिद्धि के बिना हम अपने मन को पूर्णतया परमात्मा में ध्यान नहीं लगा सकते।

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