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धर्म-अध्यात्म

ध्यान का प्रपंच और भोली भाली जनता

डॉ डी के गर्ग
भाग 7
विशेष=ये लेख माला जो कि पांच भागो में है,वैदिक विद्वानों के लेख और विचारों पर आधारित है।जनहित में आपके सम्मुख प्रस्तुत है,कृपया शेयर करे।

अभी तक आपने योग के सात अंगों के विषय में जाना, इनमें महारत होने के बाद ही साधक समाधि की स्थिति में पहुंच सकता है।
अपने धूनी रमाए या किसी गद्दे में बैठे बाबाओं के विषय में सुना होगा कि ध्यान लगाए बैठे है ,वास्तव में ये ध्यान का प्रपंच कर रहे है ,ध्यान की स्थिति योग के सात अंगों के बाद अंतिम है।

योग का आठवां अंग
समाधि

तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः ।। 3 ।।
शब्दार्थ :- तदेव ( तब वह अर्थात ध्यान ही ) अर्थमात्र ( केवल उस वस्तु के अर्थ या स्वरूप का ) निर्भासं ( आभास करवाने वाला ) स्वरूपशून्यम् ( अपने निजी स्वरूप से रहित हुआ ) इव ( जैसा ) समाधिः ( समाधि होती है । )

सूत्रार्थ :- जब योगी साधक अपने निजी स्वरूप को भूलकर केवल ध्यान के ध्येय ( लक्ष्य ) में ही लीन हो जाता है । तब वह अवस्था समाधि कहलाती है ।
ध्यान करते हुए तीन भावों की प्रमुख रूप से विद्यमानता होती है –
पहला होता है ध्यातृ / ध्याता भाव:- ध्यातृ का अर्थ है ध्यान करने वाला । अर्थात जिसके द्वारा ध्यान को किया जा रहा है । वह ध्यातृ अर्थात साधक कहलाता है ।
ध्येय भाव :-ध्येय का अर्थ होता है लक्ष्य।अर्थात जिस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए ध्यान किया जा रहा है ।उसे ध्यान का ध्येय अर्थात लक्ष्य कहते हैं ।
ध्यान :- ध्यान का अर्थ है जिस साधन के द्वारा साधना का सम्पादन किया जा रहा है । अर्थात वह मार्ग जिसके करने से लक्ष्य तक पहुँचा जाता है । या वह क्रिया जिसके द्वारा लक्ष्य को प्राप्त किया जाता है । वह ध्यान कहलाता है ।
ऊपर वर्णित भावों में से जब योगी साधक ध्याता अर्थात अपने निजी स्वरूप को भूलकर केवल ध्येय अर्थात लक्ष्य में आरूढ़ हो जाता है । तब उस ध्यान की अवस्था को समाधि कहते हैं ।
सामान्य तौर पर ध्यान की उन्नत अवस्था को समाधि कहते हैं । और ध्यान की उन्नत अवस्था तभी आती है जब साधक अपने ध्याता भाव को छोड़कर केवल लक्ष्य पर केन्द्रित रहता है ।जब तक साधक के भीतर यह भाव रहेगा कि मेरे द्वारा ध्यान किया जा रहा है । तब तक समाधि की प्राप्ति नहीं हो सकती । लेकिन जैसे ही साधक अपने ध्याता भाव अर्थात अपने निजी स्वरूप को मिटाकर केवल लक्ष्य को ही आत्मसात कर लेता है । वैसे ही उसे समाधि की प्राप्ति हो जाती है ।
उदाहरण स्वरूप :- भ्रमर ( भंवरा ) एक प्रकार का कीट होता है । जिसे कमल के फूल का रस बहुत प्रिय होता है । और कमल के फूल की विशेषता होती है कि वह दिन के समय खिलता है और अँधेरा होते ही बन्द हो जाता है । जब भ्रमर कीट कमल के फूल का रस चूसने के लिए उसके अन्दर घुसता है तो वह उस रस में इतना तल्लीन ( पूरी तरह से लीन होना ) हो जाता है कि उसे इस बात का भी आभास नहीं रहता कि कब अँधेरा हुआ और कब वह कमल का फूल बन्द हो गया । इस प्रकार उस भ्रमर को फूल के रस के अतिरिक्त किसी प्रकार का कोई ध्यान नहीं रहता है । और इस वजह से वह स्वयं भी फूल के अन्दर ही बन्द हो जाता है ।
ध्यान करते-करते जब परोक्ष वस्तु का प्रत्यक्ष अर्थात् दर्शन होता है, उस प्रत्यक्ष को ही समाधि कहते हैं।जिस प्रकार आग में पड़ा कोयला अग्नि रूप हो जाता है और उसमें अग्नि के सभी गुण आ जाते हैं। उसी प्रकार समाधि में, जीवात्मा में, ईश्वर के सभी गुण प्रतिबिम्बित होने लगते हैं।
जीवात्मा का मात्र एक प्रयोजन मुक्ति प्राप्ति है और योगी इस प्रयोजन को समाधि से पूर्ण करता है।

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