लगनी चाहिए ‘ डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ पर रोक

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प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा लिखी गई पुस्तक “भारत एक खोज ” में लिखा है कि आर्य विदेशी थे ,मध्य एशिया से आए थे।
भारत के प्राचीन गौरव पर नेहरू जी को अधिक गर्व नहीं था। उन्होंने अपनी मान्यता स्थापित की और कह दिया कि :-

सर जमीन ए हिंद पर अखलाक ए आवामे फिराक।
कारवां बसते गए और हिंदुस्तान बांटा गया।

नेहरू जी की इस प्रकार की अज्ञानता जनक बातों का खंडन सत्यार्थ प्रकाश में ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में प्रचुर मात्रा में प्राप्त होता है । लेकिन भारतवर्ष में नेहरू द्वारा स्थापित किया गया झूठ बहुत तेजी से फैला । क्योंकि जवाहरलाल नेहरू ने द्वारा अपनी इस पुस्तक को प्रत्येक सैनिक को पढ़ाने के लिए और खरीदने के लिए अनिवार्य कर दिया था। कांग्रेस की सरकारों ने बड़ी रॉयल्टी कमाने के लिए ऐसा काम किया। साथ ही इसका उद्देश्य यह भी था कि प्रत्येक सरकारी कर्मचारी या सैनिक के हाथ में इस पुस्तक के जाने से उसका ‘ब्रेनवाश’ किया जा सकता है। इसलिए अधिकतर भारतवासियों के मन मस्तिष्क में यह बात समा गई कि आर्य विदेशी थे। नेहरू की पुस्तक के झूठ को भरपूर प्रचार और प्रसार प्राप्त हुआ। देश के कम्युनिस्टों और मुसलमानों ने नेहरू के इस झूठ को और भी अधिक प्रचार दिया। इस पुस्तक में मुगलों का गुणगान कर नेहरू ने अपने मुस्लिम प्रेम को भी भरपूर मात्रा में प्रकट किया है। उनकी मान्यता है कि मुगल भारत में रहकर हिंदुस्तानी हो गए थे । जिन्होंने यहां पर रहते हुए शानदार काम किया। यही कारण है कि नेहरू तुर्कों और मुगलों के जमाने में हुए भारत के स्वाधीनता आंदोलन को भारत का स्वाधीनता आंदोलन ही नहीं मानते । दूसरे शब्दों में कहें तो यदि उस समय हिंदू देश की आजादी के लिए काम कर भी रहे थे तो वह नेहरू की दृष्टि में उनकी एकमूर्खता थी।
नेहरू ने पुस्तक के माध्यम से भारत की वर्ण व्यवस्था को भी बहुत गलत ढंग से प्रस्तुत किया है। उनकी प्रस्तुति से स्पष्ट होता है कि वह वर्ण व्यवस्था के वैज्ञानिक स्वरूप को कभी समझ नहीं पाए थे। उन्होंने वर्ण व्यवस्था को ही जाति व्यवस्था मान लिया। इसका अभिप्राय यह भी है कि नेहरू जी जाति की परिभाषा से भी अनभिज्ञ थे।
नेहरू जी वेदों में इतिहास मानते हैं। महाभारत रामायण को वह महाकाव्य मानते हैं । वेदों की उत्पत्ति सृष्टि की उत्पत्ति के बहुत बाद जाकर मानते हैं। उनकी दृष्टि में राम और कृष्ण काल्पनिक योद्धा हैं।
इस प्रकार डिस्कवरी ऑफ इंडिया के माध्यम से नेहरू ने भारतीयता का उपहास उड़ाने में किसी प्रकार की कमी नहीं छोड़ी है। इस पुस्तक के माध्यम से नेहरू के मानस पुत्रों ने भारत विनाश की इसी परंपरा को आगे बढ़ाया। क्या ही अच्छा होता कि आर्य समाज नेहरू की डिस्कवरी ऑफ इंडिया पर बैन लगाने की मांग करता ? जिसका समर्थन सभी हिंदूवादी संगठन करते, परंतु आज भी देर नहीं हुई है। अतः आर्य समाज के लोग सरकार से मांग करते हैं कि इस पुस्तक के क्रय विक्रय पर तुरंत प्रभाव से रोक लगनी चाहिए। इसका कोई भी अंश विद्यालयों में यदि कहीं पढ़ाया जा रहा है तो उसे भी पाठ्यक्रम से हटाया जाना चाहिए।
भारत में ऐसी अनेक पुस्तकों का भंडार है, जो नेहरूवादी मान्यता के लेखकों द्वारा उनके बाद लिखी गई हैं । जिन पर इस डिस्कवरी ऑफ इंडिया नाम की पुस्तक का पूरा प्रभाव है। कम्युनिस्टों और कांग्रेसियों में भारत विरोधी इसी मानसिकता को परोसने की मानो होड़ लग गई । आज आवश्यकता है कि ऐसी सभी पुस्तकों की एक सूची तैयार की जाए जो भारतीयता का अर्थात वैदिक संस्कृति का विनाश करने में अग्रणी भूमिका निभाती रही हैं। इतना ही नहीं, एक ऐसा बोर्ड भी स्थापित किया जाए जो भारतीय वैदिक संस्कृति के मनीषियों से निर्मित हो, भारतीय संस्कृति पर लिखने वाले किसी भी लेखक के लिए यह अनिवार्य किया जाए कि वह इस बोर्ड को दिखाकर ही अपनी पुस्तक प्रकाशित करा सकता है।

देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट
अध्यक्ष : उगता भारत समाचार पत्र

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