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जब हम मध्यकाल में मुस्लिम आक्रमणकारियों के आक्रमणों के बारे में पढ़ते हैं तो अक्सर यह प्रश्न हमारे अंतर्मन में उठता है कि विदेशी आक्रमणकारियों के आक्रमण के समय देश के राजनीतिक केंद्रों के रूप में मान्यता प्राप्त रहे किलों की अपेक्षा धार्मिक आस्था के केंद्र हमारे मंदिर ही क्यों लूटे गए? यदि इस प्रश्न पर विचार किया जाए तो पता चलता है कि जब विदेशी आक्रमणकारियों के भारत पर आक्रमण आरंभ हुए तो इन विदेशी आक्रमणकारियों में से विशेषकर मुसलमानों ने भारत की धन संपदा के केंद्र मंदिरों को अपना निशाना बनाया। यद्यपि इन विदेशी आक्रमणकारियों ने भारत के किलों को भी लूटा, परंतु उनमें से अधिकांश का निशाना भारत के मंदिर रहे। इसके दो कारण थे। पहला कारण यह था कि इस्लाम को मानने वाले विदेशी आक्रमणकारी भारत पर अपने सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों के कारण हमलावर होकर आए थे। यदि भारत के ज्ञान और शिक्षा के केंद्र मंदिरों को नष्ट कर दिया जाए तो उनकी मान्यता थी कि ऐसी स्थिति में भारत को इस्लाम के रंग में रंगने में उन्हें सफलता प्राप्त हो सकती है। मंदिरों को लूटना ही उनका उद्देश्य नहीं था, बल्कि लूटने के पश्चात् मंदिरों को समूल नष्ट करना और उनके स्थान पर अपनी मस्जिदें स्थापित करना भी उनका उद्देश्य था। यद्यपि हमारे वर्तमान इतिहास लेखकों ने अपनी धर्मनिरपेक्षता का झूठा प्रदर्शन करते हुए इस तथ्य को छिपाया है कि मुस्लिम आक्रमणकारियों का उद्देश्य भारत के मंदिरों को नष्ट कर अपनी मस्जिदें स्थापित करना और भारत में इस्लाम का प्रचार प्रसार करना था। इस सत्य को छिपाकर इन छद्म इतिहासकारों ने इस प्रकार का भ्रम उत्पन्न करने का प्रयास किया है कि जितने भी इस्लामिक आक्रमणकारी भारत आए उन सबके आक्रमण का उद्देश्य केवल राजनीतिक था धार्मिक नहीं।

इस्लामिक आक्रमणकारियों का उद्देश्य

भारत में इस्लामिक आक्रमणकारियों का दूसरा उद्देश्य भारत के मंदिरों को लूटकर अपनी धन की प्यास को शांत करना भी था। मन्दिरों से अकूत संपदा के मिलने से वे मालामाल हो जाते थे। इन लोगों की सांप्रदायिक मान्यता थी कि गैर मुस्लिमों के धार्मिक स्थलों को लूटना, तोड़ना और समाप्त कर देना इस्लाम की सबसे बड़ी सेवा है। अपने इस ‘महान उद्देश्य’ की प्राप्ति के लिए उन्हें जिहाद के नाम पर अपने देशों से तथाकथित सैनिक (जिन्हें शुद्ध भाषा में लुटेरा कहा जाए तो उचित होगा) भी बड़ी सरलता से उपलब्ध हो जाते थे।

इसके अतिरिक्त मंदिरों को ही अपना निशाना बनाना इस्लामिक आक्रमणकारियों ने इसलिए भी उचित समझा कि उस समय भारत के मंदिरों की सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं थी।

मुस्लिम आक्रमणकारियों के लिए यह बात बहुत ही उपयुक्त थी कि माल भी मिल जाए और ऐसी जगह से मिल जाए जहाँ सुरक्षा तंत्र सबसे दुर्बल हो। भारतीय मंदिर या पूजा स्थल पूर्णतया असुरक्षित होने के उपरांत भी धनसंपदा के केंद्र होने के कारण इस्लामिक आक्रमणकारियों के निशाने पर आए। उन्होंने समझ लिया कि मंदिरों को बड़ी सहजता से लूटा जा सकता है। क्योंकि वहाँ पर राजा के सुरक्षा प्रहरी नहीं के बराबर होते हैं।

मंदिरों या हिंदुओं के धार्मिक पूजा स्थलों के इस प्रकार असुरक्षित होने का कारण यह था कि अबसे पहले के हिंदू शासकों ने कभी सपने में भी यह नहीं सोचा था कि कोई भी विदेशी हमलावर मंदिरों की भी लूट कर सकता है। कभी भी किसी भी हिंदू शासक ने किसी दूसरे शासक पर हमला करते समय मंदिरों को नहीं लूटा और ना ही निरपराध लोगों का नरसंहार किया। ऐसे में मंदिरों को एक आध्यात्मिक सुरक्षा प्राप्त होती थी। लोगों की मान्यता होती थी कि मंदिर जैसे पूजास्थल पर जाकर कोई भी अनैतिक कार्य नहीं किया जाएगा।

यही कारण था कि हमारे मंदिर के धर्मस्थलों की सुरक्षा की कोई व्यवस्था न होने के उपरांत भी वे अत्यधिक सुरक्षित माने जाते थे। कभी भी किसी हिंदू राजा ने यह सोचा ही नहीं कि पूजा स्थलों को भी आक्रमण का निशाना बनाया जा सकता है।

भारत के लोग थे कलाप्रेमी

भारत के लोग न केवल आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे बल्कि कला प्रेमी भी थे। उन्होंने मंदिरों में मूर्तियों को केवल अपने पूजा के लिए ही नहीं बनाया बल्कि उनमें अपनी अद्भुत कलाकारी का भी प्रदर्शन किया। सौंदर्य के उपासक रहे भारतीय लोगों को अद्भुत, अनोखी और सुंदर प्रतिमाओं के बनाने में आनंद की अनुभूति होती थी। जबकि इस्लामिक आक्रमणकारियों को मूर्तियों के निर्माण या उनके सौंदर्य से कोई लेना-देना नहीं था। उनमें उनकी कोई आस्था नहीं थी। यही कारण था कि उन्हें वे बड़े आराम से तोड़कर अपने सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों को शांत कर लिया करते थे।

उतबी ने मथुरा के केशव देव मंदिर के सौंदर्य के बारे में लिखा है :- यदि कोई इस इमारत जैसी कोई दूसरी इमारत बनाने की इच्छा करे तो भी वह ऐसा नहीं कर पाएगा, क्योंकि उसके पास कई हजार सौ दीनार नहीं होंगे , उसे बनाने के लिए 200 वर्ष लग जाएंगे। यदि वह अत्यंत अनुभवी और योग्य लोगों को इस काम के लिए लगाए।

इस कथन से स्पष्ट होता है कि भारत के लोग मंदिरों के निर्माण में और उनमें स्थापित की जाने वाली मूर्तियों के बनाने में अपना कितना अधिक धन, महमूद गजनवी और तालिबान परिश्रम, समय और ऊर्जा लगाते थे? अपनी निर्माणात्मक और सृजनात्मक शक्तियों को उनमें प्रदर्शित करके वे आत्म संतुष्टि अनुभव करते थे। माना कि मूर्ति पूजा से हमारा बहुत कुछ अहित हुआ है। परंतु यह भी सत्य है कि जब मनुष्य के पास कोई कला होती है तो वह कहीं ना कहीं किसी न किसी क्षेत्र में मुखरित होती ही है। भारत के लोगों के पास सुंदर से सुंदर प्रतिमाएँ बनाने की कला थी तो उन्होंने अपनी इस कला का प्रदर्शन उत्कृष्ट ढंग से किया। यह अलग बात है कि लोगों ने उनसे मूर्तियाँ बना बनाकर मंदिरों में रख लीं और अवैदिक ढंग से उनकी पूजा करने लगे।

ऐसे भड़काया जाता था इन मुस्लिम सैनिकों को

भारत के मंदिरों की इस्लामिक आक्रमणकारियों के समय आर्थिक स्थिति बड़ी मजबूत होती थी। हमें तत्कालीन साहित्य (त्वारीख फरिश्ता 40 और त्वारीख बहारस्तान नवल किशोर प्रेम मुफती गुलाम सरवर लाहौरी पृष्ठ 259.) के अनुशीलन से पता चलता है कि जब महमूद गजनवी ने नगरकोट के किले को जीतकर वहाँ पर कत्लेआम किया तो उसे वहाँ से 60 लाख दीनार सुर्ख, सौ मन चांदी और सोने के बर्तन, सौ मन सोना, 2000 मन शुद्ध चांदी और 30 मन जवाहरात प्राप्त हुए थे।

जब इस्लामिक अत्याचारी आक्रमणकारी अपने देश से भारत पर आक्रमण करने के लिए चलते थे तो वह अपने लुटेरे दल के तथाकथित सैनिकों के सामने भारत को लूटने और रातोंरात मालामाल हो जाने के जोशीले भाषण देकर उन्हें भड़काया करते थे। उन्हें इस बात का विश्वास दिलाया करते थे कि यदि आपको भारत के मंदिरों की लूट हाथ लगी तो इससे न केवल तुम रातों-रात मालामाल हो जाओगे बल्कि इस्लाम की सेवा करने का सौभाग्य भी तुम्हें प्राप्त होगा। इसके अतिरिक्त यदि काफिरों से युद्ध करते हुए मारे गए तो शहीद का दर्जा प्राप्त करोगे और इसके पश्चात् जन्नत में 72 हूरें भी आपको भोग के लिए प्राप्त होंगी।

वास्तव में प्रत्येक आक्रमणकारी के द्वारा अपने लुटेरे दल के सैनिकों के सामने दिया जाने वाला इस प्रकार का भाषण संसार में उत्पात और उग्रवाद मचाने का एक सर्वोत्तम माध्यम रहा है।

गैर मुस्लिमों को मारकर उनका धन और औरत लूटने की बात कहना एक प्रकार की रिश्वत तो थी ही साथ ही अभी तक की वैदिक परंपराओं के माध्यम से जो लोग यह मानते थे कि पराया धन और परायी स्त्री को हाथ लगाना पाप है, उन्हें जब यह बता दिया जाता था कि खुदा ने ही गैर मुस्लिमों के धन और औरतों को लूटना उनका फर्ज बनाया है या इस प्रकार का आदेश उनके लिए जारी किया है तो वह अपने आपको उस पाप में झोंक देते थे। जब उन्हें खुदा की ओर से ही ऐसा करने का हुक्म दिया गया बताया जाता था तो वे उसे बहुत उतावले होकर करने को तैयार हो जाते थे। खुदा की ओर से मिलने वाले ऐसे आदेशों को सुन व समझकर उन्हें ऐसा लगता था कि जैसे वेद का ईश्वर झूठा और पाखंडी है। जबकि कुरान का अल्लाह बहुत ही अच्छा है, जो उन्हें गैर मुस्लिमों को मारने और उनके धन और औरतों पर अधिकार करने का आदेश देता है।

थानेश्वर मंदिर की लूट

त्वारीख ए फरिश्ता पृष्ठ 49, व तवारीख आइनाये, हकीकतनुमा वाम दवम अकबरशाह नजीब पृष्ठ 171 से पता चलता है कि महमूद गजनवी ने थानेसर मंदिर को लूटने के उद्देश्य से आनंदपाल को लिखा था कि वह अपनी सेना के विश्वसनीय लोगों को हमारे कष्ट दूर करने के लिये भेजे। आनंदपाल ने महमूद की सेना के लिये भोजन आदि की व्यवस्था कर अपने भाई के साथ उसकी सेवा में दो हजार सैनिक भेजकर प्रार्थना की कि वह थानेसर मंदिर को ना तोड़े। क्योंकि इससे हिंदुओं की आस्था जुड़ी हुई है। जिस पर किए गए आक्रमण से हम लोगों को बहुत अधिक कष्ट होगा। यदि आप चाहें तो इसके बदले में हमसे बड़ी धनराशि ले लें। राजा आनंदपाल के इस प्रकार के आग्रह अनुग्रह का महमूद गजनवी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वैसे भी जल्लाद के सामने प्राणों की भीख माँगने से कोई लाभ नहीं होता। यह राजा आनंदपाल की उदारता ही थी कि वह जल्लाद से प्राणदान की अपेक्षा कर रहे थे।

उपरोक्त पुस्तक हमें बताती है कि इसका कारण केवल एक ही था कि महमूद गजनवी जब अपने देश से चला था तो अपने सैनिकों को वह बुतों और मंदिरों को तोड़ने के लिये भड़काकर लाया था। उसे यह भली प्रकार ज्ञात था कि यदि उसने अपने सैनिकों को मंदिरों को तोड़कर लूटने के दिए गए वचन को तोड़ दिया तो इससे उसके सैनिक उसी के विरुद्ध बगावत कर सकते हैं।

यही कारण था कि उसने राजा आनंदपाल को स्पष्ट शब्दों में यह बता दिया कि यदि उसने मंदिरों को तोड़कर उन्हें लूटा नहीं तो उसके सैनिक उसके विरुद्ध बगावत कर देंगे। क्योंकि वह अपने लोगों के मजहबी जज्बातों को भड़काकर ही उन्हें हिंदुस्तान पर आक्रमण करने के लिए तैयार करके यहाँ तक लाया है। स्पष्ट था कि अब उसके तथाकथित सैनिक हिंदुस्तान के मंदिरों को लूटकर रातों- रात मालामाल हो जाना चाहते थे।

जब राजा आनंदपाल ने देखा कि महमूद गजनवी मजहबी उन्माद के माध्यम से थानेश्वर मंदिर को तो तोड़ेगा ही साथ ही बड़ी संख्या में नरसंहार भी करेगा तो राजा ने बुद्धिमत्तापूर्ण कदम उठाते हुए देसी राजाओं के लिए पत्र लिखा। जिसमें इस विदेशी आक्रमणकारी को समय रहते देश से बाहर भगा देने का आवाहन किया गया था। देसी राजाओं ने भी राजा आनंदपाल के पत्र का समुचित उत्तर दिया और कई राजा उसकी सहायता के लिए चल भी दिए।

उपरोक्त पुस्तक से हमें पता चलता है कि इससे पहले कि देसी राजा आनंदपाल की सहायता के लिए वहाँ पहुँचते, महमूद गजनवी ने थानेश्वर पर आक्रमण बोल दिया। उस विदेशी राक्षस आक्रमणकारी को मंदिर’ को लूटकर और मंदिर की मूर्तियों को नष्ट कर वहाँ पर इस्लामिक परचम लहराने की बड़ी शीघ्रता हो रही थी।

थानेश्वर की हिंदू जनता इस भेड़िया विदेशी आक्रमणकारी के भय के कारण पहले ही नगर को छोड़कर इधर उधर भाग चुकी थी। जिससे थानेश्वर में जाकर लूटपाट करना महमूद गजनवी के लिए और भी अधिक आसान हो गया। इसके बाद उसने थानेश्वर में बर्बरता पूर्ण ढंग से लूटपाट मचायी। उपरोक्त पुस्तक से ही हमें पता चलता है कि इस बुतखाने से इस कदर धन, जवाहरात, सोना आदि मिला, जो गिनती की हद से बाहर था, यहाँ से एक किला याकूत का ऐसा मिला कि जिसका तौल चार सौ मिस्साल था और ऐसा नफीस (जवाहर) किसी ने अब से पहले देखा तक न था।

ज्वालामुखी मंदिर की लूट

थानेश्वर में मचाई गई लूट से महमूद गजनवी की मंदिरों की लूट की भूख और भी अधिक बढ़ गई। अब उसके गिद्ध सैनिकों का मनोबल भी बढ़ गया था और उन्हें लगने लगा था कि भारत में उनका प्रतिकार करने वाला कोई नहीं है। इसलिए वह धन की चाह और इस्लाम की खिदमत को दिल में बसाकर और भी अधिक लूट के लिए लालायित हो उठे। अपनी इन दोनों इच्छाओं की पूर्ति के लिए महमूद गजनवी और उसके लुटेरे दल के सैनिकों ने अब ज्वालामुखी मंदिर पर आक्रमण करने का निर्णय लिया।

भारत के विषय में यह एक दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि यहाँ के मंदिरों के पुजारियों ने जब मंदिरों को श्री राम और श्री कृष्ण जैसे महान् योद्धाओं के महान् तप, त्याग, साधना और राष्ट्रवादी विचारों को प्रस्तुत करने का केंद्र न छोड़कर विलासिता और श्रृंगार रस को परोसने का स्थल बना दिया तो यहाँ भी दुर्बलता व्याप्त हो गई।

अनेकों बार ऐसा हुआ जब विदेशी आक्रमणकारी गिद्ध किसी मंदिर के द्वार पर पहुँचे तो मंदिर के पुजारियों ने स्वयं ही दरवाजा खोल कर उनका स्वागत किया। ऐसे अवसरों पर उन पुजारियों ने इन विदेशी आक्रमणकारियों को अकूत संपदा देकर या उस संपदा को लूटने का भेद बताकर उनके सामने प्राणों की भीख मांगी। जिसका उन विदेशी आक्रमणकारियों पर कोई प्रभाव नहीं हुआ। कई बार तो ऐसा भी हुआ कि पुजारियों से मंदिर की धनसंपदा की पूरी जानकारी लेकर विदेशी आक्रमणकारी राक्षसों ने सबसे पहले उस पुजारी को ही समाप्त कर दिया। ऐसा करके भी इन विदेशी राक्षसों को आत्मिक संतोष की अनुभूति होती थी। क्योंकि किसी पुजारी की हत्या करना तो इस्लाम की और भी अच्छी सेवा में गिना जाता है।

ज्वालामुखी मंदिर को 399 हिजरी में लूटने का कार्य संपन्न किया गया। अहकुम तारीख अलयारूफ, महबूबस्सलातीन मोहम्मद हुसैन खान, पृष्ठ 112- 113, से पता चलता है कि इस मंदिर की लूट से महमूद गजनवी को 60 लाख सोने के दीनार, 700 मन सोने के बुत अर्थात् मूर्ति, 200 मन सोने चांदी की ईंटें, 2 मन खालिस सोना, 20 मन चांदी और अनगिनत जवाहरात, हीरा, मोती, लाल व नील मिले।

मंदिरों के पूर्वज हैं गुरुकुल

हमारे देश में मंदिरों के पूर्वज गुरुकुल रहे हैं। जहाँ पर लोग अपने आचार्य लोगों को हर छमाही उनकी जीविकोपार्जन और गुरुकुल के सही ढंग से संचालन हेतु अपनी कृषि उपज का या कुल आय का एक निश्चित भाग जाकर दिया करते थे। धीरे-धीरे गुरुकुल के उन आचार्यों ने अपने मठ या मंदिर बनाने आरंभ कर दिए। उनके अपने निजी निवास स्थान या गुरुकुल उनके मठ मंदिरों के रूप में स्थापित और परिवर्तित हो गए। यद्यपि लोगों की श्रद्धा और दान देने के प्रति निष्ठा की पवित्र भावना यथावत बनी रही। लोगों की ओर से दान तो इन पवित्र स्थलों पर आता रहा, परंतु इन पवित्र धर्म स्थलों में बैठने वाले कई लोग पाखंडी, धूर्त और चालाक बन गए। उन पाखंडी धूर्त और चालाक लोगों ने जनसाधारण से लिए गए दान को मंदिरों में इधर-उधर छुपाना आरंभ कर दिया। एक प्रकार से उनकी यह अघोषित बेनामी संपदा बन गई। इस प्रकार इन मठाधीशों के भीतर अपरिग्रह की प्रवृत्ति समाप्त होकर परिग्रहवादी सोच विकसित हो गई।

जिस मानसिकता को हमारे ऋषि पूर्वजों ने हम सबके लिए त्याज्य समझा था उसी मानसिकता से हमारे ये मठाधीश ग्रसित हो गए। अब उनका अधिक समय ईश्वर भजन में ना लगकर इस अकूत संपदा की रक्षा करने में गुजरता था। जिससे उनका आत्मिक और आध्यात्मिक पतन हुआ। उसका प्रभाव जनसाधारण पर भी पड़ा। क्योंकि अब उन्हें मंदिरों के माध्यम से वैदिक ज्ञान के पवित्र उपदेश देने वाले महात्माजनों का लगभग अभाव सा हो गया था।

फलस्वरूप भारत देश में अज्ञान और अविद्या फैल गई। इस अज्ञान और अविद्या का लाभ विदेशी आक्रमणकारियों ने भरपूर उठाया। यद्यपि इस सबके उपरांत भी हमारा मानना है कि भारत का राष्ट्रवाद इस काल में भी बना रहा।

यही कारण था कि अपने धर्म के प्रति समर्पण का भाव रखने वाले हिंदू समाज के लोगों ने विदेशी मजहबी तलवार के सामने आत्मसमर्पण करना किसी भी स्थिति में उचित नहीं माना।

राजा कालीचंद का बलिदान

अपनी लूट की भूख को शांत करने के लिए महमूद गजनवी अभी भी रुका नहीं। उसने 400 हिजरी में कन्नौज को जीतकर सनद या संतोख के लिए प्रस्थान किया। उस समय वहाँ का राजा कालीचंद था। इस लड़ाई में राजा कालीचंद ने महमूद गजनवी का बड़ी वीरता के साथ सामना किया। युद्ध में राजा के 50,000 से अधिक सैनिक काम आए, जो अपने धर्म व संस्कृति की रक्षा के लिए बलिदान हो गए। इन बलिदानी सैनिकों ने मरने से पहले शत्रु को भारत की वीरता से भली प्रकार परिचित करा दिया था। इसके उपरांत भी जब विजयश्री हाथ नहीं लगी तो राजा आत्मग्लानि से भर गया। राजा को यह बात सही नहीं लगी कि वह विदेशी आक्रमणकारी के समक्ष पराजित हो और उसकी पराजय के पश्चात् नरसंहार के माध्यम से लोगों को मारा जाए या उनके घरों में आग लगाकर लूट खसोट की जाए। राजा अपने राजधर्म और राष्ट्र धर्म को जानता था। इसलिए वह पराजय के आत्मग्लानि भरे भाव से ग्रसित हो गया। उसने भी निर्णय ले लिया कि यदि विजय नहीं तो जीवन भी नहीं। फलस्वरूप राजा ने आत्महत्या कर ली। राजा अपने उन्हीं बलिदानी सैनिकों के साथ रहना चाहता था जिन्होंने धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था। यही कारण था कि राजा भी अब अपने स्वर्गवासी सैनिकों के साथ जा मिला।

अहकम तारीख मोहम्मद हुसैन खान पृष्ठ 112-213 तथा बहारस्तान तारीख मुफ्ती सरवर लाहौरी पृष्ठ 251-252 से पता चलता है कि वहाँ पर एक बहुत बड़ा बुत था। दो सोने के बुत थे। एक बुत अर्थात् मूर्ति की आँखों में दो 50 हजार दीनार के याकूत लगे थे। दूसरे बुत की आँखों में याकूत के अजरक बहुत कीमती थे। इन दोनों बुतों का सोना 8 हजार 8 सौ मिस्साल था। यहाँ 400 चांदी के बुत भी थे। जिन्हें महमूद गजनवी लूटकर अपने देश ले गया।

मथुरा में मची लूटपाट

बताया जाता है कि महमूद गजनवी मथुरा में बिना किसी विशेष प्रतिकार के प्रवेश करने में सफल हो गया। उसने पहले शहर को लूटा और भारी विनाश किया। महमूद गजनवी को यहाँ से लूट में 5 बुत सोने के प्राप्त हुए जिनकी आँखों में सुर्ख याकूत जड़े थे। उस समय उनकी कीमत 50 हजार दीनार के लगभग थी। इसके अतिरिक्त इन बुतों में एक याकूत तथा रंग नीलगू जड़ा हुआ था। वह 400 मिस्साल का था। जब उसे तोड़ा गया तो उसमें 98320 मिस्साल सोना निकला और चांदी के सौ से अधिक छोटे बड़े बुत थे। ये करीब 100 ऊँटों के बराबर बोझ का था। इसके बाद इमारतों में आग लगा दी गई।

इसके पश्चात् महमूद गजनवी ने सोमनाथ के विश्व प्रसिद्ध मंदिर पर आक्रमण किया। जिसके विषय में हम अपनी कई पुस्तकों में पहले ही उल्लेख कर चुके हैं। उसके विषय में यहाँ पर जानबूझकर कोई प्रकाश नहीं डाल रहे हैं। इसके विषय में हम केवल इतना बताना चाहेंगे कि यद्यपि महमूद गजनवी उक्त मंदिर में लूट मचाने और वहाँ की मूर्तियों को तोड़फोड़ कर नष्ट करने में सफल हो गया, परंतु राजा भीमदेव सोलंकी के नेतृत्व में उस समय के अनेकों हिंदू राजाओं ने मिलकर जब महमूद गजनवी का पीछा किया तो उसका सारा हिसाब पाक साफ कर दिया था। इतिहास के इन गौरवशाली पृष्ठों पर चाहे इतिहासकारों ने प्रकाश ना डाला हो परंतु इतिहास का यह भी एक सच है। इसलिए अपने इतिहास के उस निराशाजनक पक्ष पर ही हमें अधिक चिंतन नहीं करना चाहिए जिसमें हमें यह पढ़ा दिया जाता है कि महमूद गजनवी ने सोमनाथ के मंदिर को बड़ी सहजता से तोड़ दिया था। इसके साथ- साथ हमें यह भी पढ़ना चाहिए कि हमारे राजा भीमदेव सोलंकी ने कैसे उस विदेशी राक्षस से मंदिर की लूट का हिसाब पाक साफ कर लिया था?

सोमनाथ मंदिर के इसी प्रदेश में महमूद गजनवी को एक ऐसा मंदिर भी मिला जिसके भीतर एक मूर्ति अधर में लटकी हुई थी अर्थात् उसका कोई आधार नहीं था। वह बिना किसी सहारे के हवा में झूल रही थी। इसे देखकर महमूद स्वयं भी चकरा गया था। उसने इसे गिराने का प्रयास किया लेकिन वह सफल नहीं हो रहा था। जिससे वह आश्चर्यचकित हो पीछे हटने लगा था। तभी उसे मंदिर के एक पुजारी ने बताया कि इस मंदिर की चारों दीवारों में चुंबक लगी हुई है। मंदिर की यह मूर्ति लोहे की बनी है। चुंबक से इस मूर्ति को अधर में लटका दिया गया है। यदि एक ओर की दीवार को तोड़कर चुंबक निकाल दी जाए तो इसका संतुलन बिगड़ जाने से यह मूर्ति स्वयं धरती पर गिर जाएगी। ऐसा सुनकर महमूद गजनवी ने मंदिर की एक तरफ की दीवार तोड़ दी। जिसका परिणाम यह हुआ कि वह मूर्ति धरती पर गिर पड़ी।

कहा जाता है कि जब इस मूर्ति को तोड़ा गया तो उस समय इसमें 18 करोड़ के हीरे जवाहरात आदि निकले।
किताब अरबी हिंद के तअल्लकात सैयद सुलेमान नदवी पृष्ठ 204 के अनुसार गुजरात के वल्लभराय के शासन में महानगर के एक बुतखाने अर्थात् मंदिर में सोने, चांदी, पीतल, हाथी दाँत, तथा हर किस्म के अमूल्य पत्थरों और जवाहरात की 20 हजार मूर्ति थीं। उनमें एक सोने की मूर्ति 12 गज ऊँची थी। जो सोने के रथ पर स्थापित की गई थी। यह तख्त एक गुंबदनुमा सफेद मोतियों और सुर्ख, सब्ज, जर्द तथा आसमानी रंग के जवाहरात से जड़ित था। इसे मुस्लिम आक्रमणकारी महमूद गजनवी के द्वारा तोड़कर समाप्त कर दिया गया था।

मैंने अभी कुछ समय पहले एक लेख लिखा था। जिसमें किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत का साथ देने वाले लोगों को ‘जयचन्द की परंपरा’ के आधुनिक वंशज के रूप में मैंने उल्लेखित किया था। साथ ही राकेश टिकैत द्वारा दिए गए ‘अल्लाह हू अकबर’ के नारे पर अपनी आपत्ति व्यक्त की थी। जिस पर एक *सपा समर्थक* युवक ने अपनी टिप्पणी दी कि वहाँ पर *हर हर महादेव* और ‘सत श्री अकाल जो बोले सो निहाल’ का नारा भी दिया गया था। इसलिए अल्लाह-हु-अकबर पर विरोध करने की आवश्यकता नहीं है। फेसबुक या सोशल मीडिया पर ऐसे टिप्पणीकार अनेकों बैठे रहते हैं जो अनावश्यक समय को नष्ट करने के लिए टिप्पणियाँ करते रहते हैं। मैंने अपनी आदत के अनुसार उस टिप्पणीकार को कोई जवाब नहीं दिया। क्योंकि मेरा मानना है कि जो अपने आपको स्वयं ही सपा समर्थक दिखा रहा है, उससे राष्ट्रहित में सोचने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। क्योंकि देश की वैदिक मान्यताओं और वैदिक संस्कृति के साथ छेड़छाड़ कर उसका गुड़ गोबर करने में जिन धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों ने अहम भूमिका निभाई है, उनमें अपनी ‘सोशल इंजीनियरिंग’ के माध्यम से सत्ता सुख भोगने वाली सपा सर्वोपरि है। जिसका नेता अपने आपको मुल्ला मुलायम कहता रहा है। इसके उपरांत भी यहाँ मैं इतना जरूर कहना चाहूंगा कि ये ‘अल्लाह हू अकबर’ के नारे ही थे जिन्होंने हमारी भारतीय संस्कृति को समाप्त करने में और मंदिरों को लूट-लूटकर भारत को कंगाल करने में अहम भूमिका निभाई। जो लोग आज तालिबान को दूर की कौड़ी समझ रहे हैं वह सावधान हो जाएँ। क्योंकि यह दूर की कौड़ी नहीं है, इसका जन्म उसी महमूद गजनवी की परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए हुआ है जिसे हमने भूल से या छद्म धर्मनिरपेक्षता की आड़ में बीते दिनों की बात समझ लिया है।

(लेखक की स्वलिखित पुस्तक ‘ इतिहास की पड़ताल’ से)

डॉ राकेश कुमार आर्य
(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)

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