*ऋग्वेद का मृत्यु सूक्त*

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परोपकारिणी सभा अजमेर द्वारा प्रकाशित कीर्तिशेष डॉक्टर धर्मवीर द्वारा ऋग्वेद के दसवें मंडल के 18 वें सूक्त ‘ मृत्यु सूक्त’ पर दिए गए प्रवचनों का संग्रह इस पुस्तक में है।मृड् धातु जो मरने अर्थ में हैं उससे मृत्यु शब्द बना है। मृत्यु सामने आते ही अच्छे-अच्छों के गले सूख जाते हैं चींटी से लेकर हाथी तक सभी जीवो में मरण का भय पाया जाता है। मृत्यु क्यों भयभीत करती है ? रोग ,आघात से जर्जर हो चुका नया या पुराना शरीर छोड़ने से हम इतना डरते क्यों है जबकि यहां पुराने या जर्जर शरीर के बदले हमें नया शरीर मिलने वाला है संभवतः हमें संशय रहता है नया शरीर मिलेगा भी या नहीं यह आशंका ही मृत्यु को भयप्रद बनाती है। यदि हमें निश्चय हो कि बदले में मिलने वाली वस्तु पहले से अच्छी होगी तो पुरानी को छोड़ना सरल हो जाता है यदि बदले में मिलने वाली वस्तु कम है तो पुरानी को छोड़ने में दुख होता है। मृत्यु हमसे हमारा धन शरीर यादें संबंध घर सब कुछ ले लेती है और बदले में जो मिलेगा वह प्रत्यक्ष भी नहीं होता इसलिए मृत्यु इस संसार का सबसे बड़ा दुख है लेकिन नया चाहिए तो पुराने का मोह छोड़ना होगा। मृत्यु नया शरीर देती है लेकिन नया शरीर मिलने पर पुराना कुछ याद क्यों नहीं रहता? मुझे कैसे विश्वास हो की मृत्यु के बाद नया शरीर मिला है पिछला कुछ याद रहता तो पुनर्जन्म पर विश्वास करना सरल हो जाता। उत्तर सरल है पुराना किया धरा साथ रहे याद रहे तो फिर नवीनता कैसी यदि पुरानी स्मृतियों से राग द्वेष फिर मुझे जकड ले तो नए शरीर नए शरीर के साथ नए अवसर का क्या महत्व। में शरीर से तो नवीनता पा लूंगा परंतु अंदर से वही पुराना बासीपन मुझे खाता रहेगा जबकि चालू जीवन में हमसे कोई बड़ी गलती हो जाती है तो हम सोचते हैं काश! पिछला सब भूलकर हम नए सिरे से जीवन प्रारंभ कर पाते ।पूरे जीवन की इस प्रकार की अनगिनत घटनाएं दुर्घटना हम अपने जीवन में इकट्ठी कर लेते हैं।

मृत्यु के बाद क्या होगा यह प्रत्यक्ष विषय नहीं है ना अतीत में ना आज और न भविष्य में होगा। इस संबंध में समझने के हमारे पास दो ही प्रकार है पहले वेद आदि शास्त्र और दूसरा चिंतन।इस पुस्तक में दोनों ही प्रकारों का उत्कृष्ट रूप है।

मृत्यु समस्या नहीं समाधान है ।इस उत्कृष्ट बेजोड़ पुस्तक को जब आप पढ़ेंगे जिसका पुरोवाक अंकित प्रभाकर जी ने बहुत ही उत्कृष्ट लिखा है तो आप पाएंगे भारत में ऐसे मृत्युंजयी लोग रहे हैं जब उनके पास मृत्यु आती थी तो वह मृत्यु को भी रास्ता दिखा देते थे वह कहते थे मृत्यु तु उनके पास जा जो तुझसे भयभीत है जो जन्म मरण के चक्कर में फंसे हुए हैं हमारे पास तेरा क्या काम हम तो देवयान के पथिक है। आप जान पाएंगे कठोपनिषद में मृत्यु संबंधित संवाद व गीता का मृत्यु विषयक व्याख्यान प्रसंग तो केवल एक बूंद के तुल्य है असली मृत्यु की विवेचना का समुद्र तो वेद है। इस पुस्तक में विद्वान लेखक ने मृत्यु सूक्त के 14 मंत्रों की बहुत ही गहन गंभीर दार्शनिक व्याख्या की है।

यह एक बेहतरीन पुस्तक है प्रत्येक स्वाध्यायी व्यक्ति के बुक सेल्फ में यह होनी चाहिए।

प्रस्तोता
आर्य सागर तिलपता ग्रेटर नोएडा।🖋️

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