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ऋषि दयानंद ने भयंकर विपरीत परिस्थितियों मे सत्य का मण्डन और पाखंड का खंडन किया इसलिए सभी उनके विरोधी हो गये।उनके प्राण हरण की भयंकर चेष्टा की गई।जो उनके भरोसेमन्द थे वे सब निकम्मे निकले।पहले उनके साथ भरतपुर का कल्लू कहार जिस पर स्वामी जी बहुत भरोसा और उससे प्रेम करते थे ।वह छ: सात सौ रूपये का माल लेकर खिड़की के रास्ते भाग गया।फिर २९ सितम्बर १८८३ को रात मे शाहपुरा निवासी धोड मिश्र रसोईया द्वारा दिये गये दूध को पीकर सोये। उसी रात मे उन्हें उदरशूल व वमन हुआ। फिर डाक्टर अलिमर्दान खां की चिकित्सा आरंभ हुई लेकिन रोग बढता गया।उनके इलाज से दस्त अधिक आने लगे।लेकिन इससे भी बड़ी बात यह कि किसी आर्य समाज या अन्य को ऋषि की बीमारी की सूचना नहीं दी गई। बाद मे १२ अक्टूबर १८८३ को अजमेर के आर्य सभासद ने राजपूताना गजट मे रोग का समाचार पढा।तब दूसरे लोगों को पता लगा।लेकिन १५ अक्टूबर तक स्वामी जी की दशा पूर्णतः निराशाजनक हो गई। वहाँ से उन्हें आबू और फिर अन्त मे भक्तो केआग्रह करने पर उन्हें अजमेर पहुँचाया गया।
अजमेर पहुँचने पर डाक्टर लछमन दास ने चिकित्सा आरम्भ की लेकिन कोई लाभ न हुआ २९ अक्टूबर को हालत और खराब हो गई उनके पूरे शरीर पर फफोले पड गये।जी घबराने लगा ।बैठना चाहते थे लेकिन बैठा न गया ।अन्त मे आखिर वह दिन आया ३० अक्टूबर सन १८८३ अमावस्या संवत १९४० मंगल वार दीपावली का दिन ।दूसरा डाक्टर बुलाया गया पीर इमाम अली हकीम अजमेर से बुलाये गये।बडे डाक्टर न्यूटन साहब ने भी इलाज किया ।लेकिन लाभ न हुआ ।कहते है उनका मूत्र कोयले के समान काला हो गया था।स्वामी जी ने अपने आप पानी लिया हाथ धोये दातुन की और बोले हमे पलंग पर ले चलो पलंग पर थोड़ी देर बैठे फिर लेट गये।श्वास तेज चल रहे थे जिन्हें रोककर वे ईश्वर का ध्यान करते थे।फिर लोगो ने हाल पूछा तो कहने लगे एक मास बाद आज आराम का दिन है।इस तरह चार बज गये।स्वामी जी ने आत्मानन्द से कहा हमारे पीछे आकर खडे हो जाओ या बैठ जाओ। फिर आत्मानन्द से पूछा क्या चाहतेहो?उन्होनें कहा सब यही चाहते है कि आप ठीक हो जाय।स्वामी जी ठहर कर बोले कि यह शरीर है इसका क्या अच्छा होगा और हाथ बढाकर उसके सिर पर धरा और कहा आनन्द से रहना ।फिर स्वामी जी ने काशी से आये संयासी गोपाल गिरि से भी पूछा।उसने भी यही उत्तर दिया ।जब यह हाल अन्य बाहर अलीगढ मेरठ कानपुर आदि से आये लोगो ने देखा तो वे स्वामी जी के सामने आकर खडे हो गये आँखो से आंसू बह रहेथे तब स्वामी जी ने उन्हें ऐसी कृपा दृष्टि से देखा कि उसको बोला या लिखना असम्भव है।मानो ईश्वर से कह रहे हो कि हे ईश्वर मे अपने इन बच्चो को तेरे सहारे छोडकर जा रहा हूं।और उनसे कह रहे हो उदास मत हो धीरज रखो।दो दुशाले और दो सौ रु भीमसेन और आत्मानन्द को देने को कहा ,किन्तु उन्होनें न लिए ।लोगो ने पूछा आपका चित्त कैसा है कहने लगे अच्छा है तेज व अन्धकार का भाव है।
इस तरफ साढ़े पांच बज गये स्वामी जी बोले सब आर्य जनो को बुलाओ और मेरे पीछे खड़ा कर दो केवल आज्ञा की देर थी तुरंत सब आगये।तब स्वामी जी बोले चारो ओर के द्वार खोल दो ,छत के दोनों द्वार भी खोल दिये।फिर रामलाल पण्डे से पूछा आज कौनसा पक्ष तिथि व वार है?किसी ने कहा आज कृष्ण पक्ष का अन्त और शुक्ल पक्ष काआदि अमावस्या ,मंगल वार है।यह सुनकर कोठे की छत और दिवारो पर नजर डाली फिर वेद मन्त्र पढे,उसके बाद संस्कृत मे ईश्वर की उपासना की।फिर ईश्वर का गुणगान करके बडी प्रसन्नता से गायत्री का पाठ करने लगे।फिर कुछ समय तक समाधि मे रहकर आँख खोलकर बोले
“हे दयामय ,हे सर्वशक्तिमान ,ईश्वर ,तेरी यही इच्छा है,तेरी यही इच्छा है,तेरी इच्छा पूर्ण हो,अहा!तैने अच्छी लीला की”।बस इतना कह स्वामी जी महाराज ने जो सीधा लेट रहे थे ,स्वयं करवट ली। और एक झटके से श्वास रोककर बाहर निकाल दिया ।इस तरह कलयुग का यह महामानव शरीर रुपी पिंजरा छोडकर आर्यो को रोता बिलखता छोड़कर परलोक की यात्रा पर चल दिया । उस समय शाम के छ:बजे दिवाली का दिन ३०अक्टूबर १८८३ का समय था।बाहर पंक्तिबद्ध दीपक जलते हुये मानो इस वेद रुपी ज्ञान का प्रकाश करने वाले अस्त होते सूर्य को अन्तिम विदाई दे रहे हो।
चमकेंगे जब तक ये सूरज चांद और तारे।
हम है ऋषि दयानंद तब तक ऋणी तुम्हारे ।।
ऋषिवर को कोटि – कोटी नमन।

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