वैदिक संपत्ति- 350 जाति, आयु और भोग

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(ये लेखमाला हम पं. रघुनंदन शर्मा जी की ‘वैदिक संपत्ति’ नामक पुस्तक के आधार पर सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं)

प्रस्तुतिः देवेन्द्र सिंह आर्य (चेयरमैन ‘उगता भारत’)

गतांक से आगे …
इसी तरह बिना दुःखों को हटाए और बिना परमात्मा को प्राप्त किये आनन्द भी नहीं मिल सकता । न्यायशास्त्र मैं गौतम मुनि लिखते हैं कि-
‘दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदन्तरापायादपवर्गः’ ।

अर्थात् मिथ्या ज्ञान से दोष, दोष से प्रवृत्ति, प्रवृत्ति से जन्म और जन्म से दुःख होते हैं उन का नाश होने से मोक्ष हो जाता है। कहने का मतलब यह कि दुःखों का अत्यन्ताभाव करने के लिए जन्म अर्थात् शरीर का अत्यन्ताभाव करना चाहिये । शरीर के अत्यन्ताभाव के लिए प्रवृत्ति का अभाव होना चाहिए, प्रवृत्ति के अभाव के लिए दोषों का अभाव होना चाहिये और दोषों के अभाव के लिए मिथ्याज्ञान का अभाव होना चाहिये । अर्थात् मिथ्या ज्ञान के अभाव से ही पूर्व पूर्व की रुकावटें दूर हो सकती हैं, इसलिए सबसे पहले मिथ्या ज्ञान को दूर करने की आवश्यकता है। क्योंकि मोक्ष का सब से बड़ा बाधक मिथ्या ज्ञान ही है। मिथ्या ज्ञान का नाश सत्य ज्ञान से ही हो सकता है। सत्य ज्ञान का दूसरा पारिभाषिक नाम वस्तु का यथार्थ परिचय है। यदि मनुष्य को संसार का यथार्थ परिचय हो जाय, यदि उसे संसार के कारण कार्य का बोध हो जाय और यदि मनुष्य की समझ में आ जाय कि समस्त दुःखों और पापों का मूल केवल मनुष्य का शरीर ही है, तो उसके मन से संसार की ममता के दोषों की गहरी छाप मिट जाय और उसकी सांसारिक प्रवृत्तियों में विवेक उत्पन्न हो जाय। मोक्षप्रकरण में इसी विवेक का नाम ज्ञान है। परन्तु स्मरण रखना चाहिये क़ि केवल इतने ज्ञान और विवेक के उत्पन्न होने से ही मनुष्य मुक्त नहीं हो सकता। जो लोग केवल ज्ञान से मोक्ष मानते हैं, वे नहीं समझा सकते कि इस प्रकार के वैज्ञानिक विश्लेषण को केवल समझ लेने से ही पूर्वकृत कर्मों का नाश कैसे हो जायगा । क्या कभी कोई भी विज्ञानवेत्ता अपराधों के दण्ड से बरी हुआ है? कभी नहीं। मनु भगवान् के दण्डविधान में तो ब्राह्मण और राजा को सर्वसाधारण के दण्ड से बहुत ज्यादा दण्ड देने का विधान किया गया है। इसलिए ज्ञान उत्पन्न होने पर भी और विवेक उत्पन्न हो जाने पर भी जब तक शरीर उत्पन्न करनेवाले पूर्वकर्मों का नाश न हो जाय, तब तक दुःखों का अत्यन्ताभाव नहीं हो सकता। परन्तु कर्मों का नाश विना कर्मों के भोगे नहीं हो सकता । कमों का नाश विना कर्मफलों के भोगे नहीं हो सकता यह ठीक है, पर हम यह अवश्य देखते हैं कि कर्मफलों का भोग मुलतवी हो सकता है। क्योंकि कर्मफलों के भोगों का सिद्धान्त कर्मों की लघुता-गुरुता पर अवलम्बित है।

जो कर्म गुरु होते हैं, उनका फल पहिले मिलता है और जो लघु होते हैं, उनका फल बाद में मिलता है। जिस प्रकार पानी में डाला हुआ एक छोटा सा कंकड़ छोटी सी लहर उत्पन्न करता है, परन्तु उसके बाद का डाला हुआ बड़ा कंकड़ उस छोटी लहर को मिटाकर बड़ी लहर उत्पन्न कर देता है, उसी तरह छोटे कर्मफल बड़े कर्मफलों के आगे दब जाते हैं और बड़े कर्मफल आगे हो जाते हैं। एक ही दिन में आगे पीछे किये हुए लघु-गुरु कामों का परिणाम आगे पीछे होता हुआ देखा जाता है। प्रातःकाल दिए गये दान की कीर्ति आठ बजे की की हुई चोरी के सामने दब जाती है और आठ बजे की की हुई चोरी का अपराध दश बजे की की हुई राजा की प्राणरक्षा के सामने फीका पड़ जाता है। इसलिए बुरे कर्मफलों को दबाने का सबसे उत्तम उपाय यही है कि निःस्वार्थ भाव से लोकसेवा आदि बड़े कर्म किये जायें। यज्ञ, दान और इष्टापूर्त को करके स्कूल, अस्पताल, गोशाला और धर्मशाला बनवाकर अथवा धर्म, देश और जाति की सेवा के लिए हर प्रकार के कष्टों को सहन करके जो लोग लोककल्याण के निमित्त अनेक प्रकार के बड़े कर्म करते हैं, उनके ये सुक्कृत कर्म पापभोगों के आगे हो जाते हैं और दूसरे जन्मग्रहण करने में रुकावट पैदा कर देते हैं और सब प्रकार के दु.खों से बचा लेते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि यह दुःख पानेवाला शरीर तभी मिलता है, जब मनुष्यों ने किसी दूसरे को दुःख दिया होता है। पर जिसने कभी किसी को दुःख नहीं दिया, केवल सबको आराम ही पहुंचाता रहा है, वह इस दुःखदायी शरीर और संसार में क्यों आवेगा? इसलिए दुःखों के अत्यन्ताभाव के लिए उत्तम कर्मों की आवश्यकता है। पर जो कहते है कि केवल कर्मों से ही मोक्ष हो जायगा, वे भी गलती पर हैं। यदि गीता के कर्मयोग के अनुसार कर्म से ही मोक्ष हो जाता, तो कर्मयोग के उपदेश करनेवाले स्वयं कृष्ण ही क्यों कहते कि ‘बहूनि में व्यतीतानि जम्मानि’ अर्थात् मेरे बहुत से जन्म बीत गये ? इससे तो यही ज्ञात होता है कि वे-अभी मुक्त नहीं हए।
क्रमशः

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