अंकुर अरोड़ा मेरे दादा जी एवं उन की पीढ़ी के असंख्य हिन्दुओं ने सन १९४७ में भारत विभाजन एवं उसके फलस्वरूप उपजे मज़हबी उन्माद के कारण जो भयंकर कष्ट उठाये , मेरी ये कविता उनको बयान करने की एक छोटी सी कोशिश है मुझे मालूम है बच्चे तू अब क्या बात पूछेगा वो ज़ालिम दिन […]