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आतंकवाद

पंजाब में कांग्रेस की हिंदू विरोधी बनती छवि

 राकेश सैन

पंजाब को जानने वाले बताते हैं कि यहां की राजनीति अकाली दल और कांग्रेस को लेकर दो ध्रुवीय रही है। देश में जनसंघ व उसके बाद भाजपा के उदय के बाद भी यहां का हिन्दू कांग्रेस पर आँखें मून्द कर विश्वास करता रहा है।

पंजाब कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष चौधरी सुनील कुमार जाखड़ के हिन्दू होने के कारण मुख्यमन्त्री न बन पाने के मलाल पर राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी पर हिन्दू विरोध का ठप्पा लगता दिखने लगा है। साल 2014 के आम चुनावों में कांग्रेस की दुर्दशा के कारणों को जानने के लिए गठित की गई एके एंटोनी जांच कमेटी ने पार्टी की पराजय के कई कारणों में एक वजह यह भी गिनाई थी कि पार्टी की छवि हिन्दू विरोधी बन चुकी है। राष्ट्रीय परिदृश्य में ढूंढने पर कांग्रेस के हिन्दुओं को लेकर किए साम्प्रदायिक आचरण के अनेक उदाहरण मिल जाएंगे परन्तु पंजाब के सन्दर्भ में भी इस तरह के मामलों की कमी नहीं है। प्रसिद्ध लेखक मदनलाल बिरमानी ने अपनी पुस्तक ‘भारत विभाजन का दुखान्त और संघ’ में कांग्रेस की एक हिन्दूघाती घटना का जिक्र किया है। घटना के अनुसार, देश विभाजन के दिनों जब पंजाब में मुस्लिम लीग के हथियारबन्द दंगाईयों का बोलबाला था तो उन दिनों में पण्डित जवाहर लाल नेहरू अमृतसर दौरे पर आए। यहां के हिन्दुओं के शिष्टमण्डल ने उनसे मिल कर हिन्दू-सिख समाज की रक्षा करने व उन्हें आत्मरक्षा के लिए हथियार उपलब्ध करवाने का आग्रह किया। इस पर पण्डित जी कुछ देर मौन रहे फिर जवाब दिया कि ‘अगर उन्होंने हिन्दू-सिखों को हथियार उपलब्ध करवाए तो मुसलमानों को भी ये सुविधा देनी होगी।’ इस पर शिष्टमण्डल के नेता ने कहा कि ‘ठीक है, हमें मरना ही है तो कम से कम इतना करें कि, आप ही हमें मार दें।’ नेहरू जी ने इसका कोई जवाब नहीं दिया।

कांग्रेस की ऐसी ही मानसिकता का शिकार हुए हैं इसी पार्टी के पूर्व पंजाब प्रदेश अध्यक्ष चौधरी सुनील कुमार जाखड़, जिन्होंने दावा किया है कि कैप्टन अमरिन्दर सिंह की विदाई के बाद प्रदेश का मुख्यमन्त्री चुनने के लिए उनको 79 में से 42 विधायकों का साथ था परन्तु उच्चकमान ने 2 विधायकों के समर्थन वाले चरणजीत सिंह चन्नी को राज्य का सूबेदार बना दिया। चौधरी जाखड़ को यह भी मलाल है कि पार्टी उन पर कोई झूठा आरोप लगाकर इनकार कर देती तो भी चलता, परन्तु उनके धर्म के कारण उन्हें अयोग्य समझा गया यह तो देश के संविधान की भावना के खिलाफ कार्य है और हिन्दू समाज का अपमान।
हिन्दू विरोध के आरोपों से घिरी पंजाब कांग्रेस को वर्तमान में कुछ सूझ नहीं रहा है। केवल भारतीय जनता पार्टी ही नहीं प्रश्न पूछ रही बल्कि, वह आम आदमी पार्टी भी साम्प्रदायिक सद्भाव की बातें कर रही है जो दिल्ली में एक सम्प्रदाय विशेष के युवकों द्वारा मारे गए हिन्दू युवक रिंकू शर्मा की मौत पर मुंह पर पैबन्द लगा कर बैठी रही। जिसके पार्षद दिल्ली दंगों के दौरान हिन्दुओं का खून बहाते रहे। कांग्रेस पर हिन्दू विरोध का ठप्पा तो उसी समय चस्पा हो गया था जब कुर्सी की अदला-बदली के दौरान पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने सार्वजनिक तौर पर यह कहना शुरू कर दिया था कि राज्य का मुख्यमन्त्री हिन्दू नहीं हो, परन्तु अब खुद जाखड़ द्वारा इस विषय में प्रश्न उठाए जाने के बाद हिन्दू अस्मिता के जख्म दोबारा गहरे होते दिख रहे हैं।

पंजाब को जानने वाले बताते हैं कि यहां की राजनीति अकाली दल और कांग्रेस को लेकर दो ध्रुवीय रही है। देश में जनसंघ व उसके बाद भाजपा के उदय के बाद भी यहां का हिन्दू कांग्रेस पर आँखें मून्द कर विश्वास करता रहा है। पिछली सदी के सातवें दशक में कांग्रेस के राजनीतिक प्रयोगों से पैदा हुए हालात के बावजूद हिन्दुओं का इसी पार्टी पर भरोसा बना रहा, जो स्वर्गीय बेअन्त सिंह के समय और भी दृढ़ हुआ क्योंकि उन्होंने अपने कार्यकाल में आतंकवाद पर नकेल कसने में गम्भीरता दिखाई थी। पंजाबी हिन्दुओं का कांग्रेस पर विश्वास का ही प्रभाव है कि यहां का हिन्दू समाज देश में बहुसंख्यकों के साथ होने वाले राजनीतिक अन्याय के आरोपों से भी अलिप्त रहा और कांग्रेस की मतपेटी भरता रहा। शायद कहीं न कहीं हिन्दुओं ने मन ही मन में स्वीकार भी कर लिया कि पंजाब के मुख्यमन्त्री की कुर्सी उनके लिए नहीं है, लेकिन अब जाखड़ प्रकरण ने यहां के इस समाज की अंर्तआत्मा को मानो झझकोर के रख दिया है। इसी का परिणाम है कि आज पंचनदी हिन्दू कांग्रेस व इसी तरह साम्प्रदायिक राजनीति करने वाले दलों को लेकर उद्वेलित दिख रहा है। हिन्दू समाज पूछ रहा है कि जब देश का संविधान उसको समानता देता है तो कोई राजनीतिक दल या नेता कौन हैं उसके साथ भेदभाव करने वाले? क्या पंजाब का हिन्दू दूसरी श्रेणी का नागरिक समझ लिया गया है? क्या पंजाब का हिन्दू अयोग्य है या उसमें नेतृत्व क्षमता नहीं? धर्मनिरपेक्षता की राजनीति करने वाली पार्टियां पंजाब के हिन्दुओं के खिलाफ साम्प्रदायिक दृष्टिकोण क्यों रखती हैं?
ऐसा नहीं है कि पंजाब में जगी हिन्दू चेतना से यहां के राजनेता अनभिज्ञ हैं, अगर ऐसा होता तो प्रदेश के सभी दलों के नेता मन्दिरों व तीर्थों में पूजा-अर्चना करने को पंक्तिबद्ध न खड़े होते। प्रदेश में पहली बार देखने को मिल रहा है कि चुनावों से पहले यहां के राजनेता मन्दिर दर्शन कर रहे हैं, अन्यथा इससे पहले तो कोई नेता मन्दिर या हिन्दुओं के किसी कार्यक्रम में चला जाता तो उसे एक खास धर्म का विरोधी करार दिया जाता रहा है। लोग जानते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी सरकार का हिस्सा होने के बावजूद पंजाब के अकाली शिक्षा मन्त्री ने केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मन्त्रालय के कार्यक्रम में सरस्वती वन्दना के विरोध में उठे स्वरों में स्वर मिलाए थे। प्रकाश सिंह बादल ने जैन सम्प्रदाय के एक समागम में मुकुट धारण कर लिया तो प्रदेश की राजनीति में तूफान खड़ा हो गया था। राजनेताओं के साथ-साथ पंजाबी मीडिया ने भी बादल के इस कदम की बहुत आलोचना की थी।  देश भर में जागृत हुई हिन्दू अस्मिता का असर चाहे देर से ही सही परन्तु अब पंजाब में भी होता दिख रहा है जो न केवल हिन्दू समाज बल्कि समूचे पंजाब, पंजाबी और पंजाबियत के लिए भी शुभ संकेत है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। इस लेख से जुड़े सभी दावे या विचार के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है। जरूरी नहीं कि ‘उगता भारत’ उनके व्यक्त किए गए विचारों से सहमत हो।)

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