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हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

स्वाधीनता संग्राम की दो धाराओं के जनक महर्षि दयानन्द

भारत के स्वाधीनता संग्राम की शांतिधारा और क्रान्तिधारा दो धाराओं का अक्सर उल्लेख किया जाता है। शांतिधारा से ही नरम दलीय और गरम दलीय दो विचारधाराओं का जन्म हुआ-जन्म हुआ-ऐसा भी माना जाता है। महर्षि दयानन्द सरस्वती जी महाराज इन दोनों ही विचारधाराओं के जनक होने से भारतीय स्वाधीनता संग्राम के किस प्रकार ‘प्रपितामह’ हो […]

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स्वामी दयानन्द और थियोसोफिकल सोसाइटह्वी

जिस वर्ष आर्य समाज की स्थापना हुई उसी वर्ष 1875 में अमेरिका के न्यूयार्क नगर में कुछ लोगों ने आत्मचिंतन के लिए एक सभा बनाने का निश्चय किया और इसे थियोसोफिकल सोसाइटी का नाम दिया। दो मास के अंदर ही इस सभा के सभासदों में परस्पर विग्रह उत्पन्न हो गया, तब यह विचार हुआ कि […]

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एकेश्वरवादी महर्षि दयानन्द

स्वामी दयानन्द ने अपने लेखन में अनेक स्थलों पर इस आरोपण का खण्डन किया है कि वेद बहुदेववाद, एकाधिदेववाद अथवा देवतावाद का प्रतिपादन करते हैं। डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन भी उनसे सहमति जताते हुए लिखते हैं-”एक महत्वपूर्ण बात ध्यान में रखनी चाहिए कि ‘देव’ शब्द एकार्थी नहीं, अनेकार्थी है। देव वह है जो मनुष्य को देता […]

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अहम् ब्रह्मास्मि:वेदविरूद्घ है

एकतत्त्ववाद बनाम त्रैतवाद स्वामी दयानन्द एकेश्वरवाद को मानते हैं, जिसका अर्थ है कि ईश्वर एक है। वस्तुत: अनेकता की धारणा ईश्वर-विचार के विरूद्घ है। नव्य वेदांत की धारणा भी वेद में नहीं है। नव्य-वेदान्त का सिद्घान्त तो अनिर्वचनीय माया के वर्णन के बिना स्थापित ही नहीं होता। वेदों में माया शब्द का प्रयोग अविद्या अथवा […]

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महर्षि दयानंद जी महाराज के दार्शनिक जीवन पर एक दृष्टि

स्वामी दयानन्द का चरित्र क्या यह बतलाने की आवश्यकता है कि स्वामीजी का आचार वैसा ही महान था जैसा कि एक महापुरूष का होना चाहिए? शुद्घ आचार के बिना कोई महापुरूष नहीं हो सकता। उनका जीवन, उनका प्रचार कार्य, उनका कृतित्व, उनके शुद्घाचारी होने की पूर्ण साक्षी है। कैरेक्टर का अर्थ आचार है, किन्तु यह […]

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महर्षि के लिए दी गयीं श्रद्धांजलिया

(अ) बंगाल के पत्र (1) कलकत्ता का पत्र-बंगाली (3 नवंबर 1883), (2) इंडियन एम्पायर, कलकत्ता (4 नवंबर 1883), (3) हिंदू पेट्रियेट कलकत्ता (4) पब्लिक ओपीनियन, कलकत्ता (नवंबर 1883), (5) लिबरल कलकत्ता (11 नवंबर) (6) इंडियन मैसेंजर, कलकत्ता (11 नवंबर 1883), (7) इंगलिश क्रोनिकल, बॉकीपुर पटना (5 नवंबर 1883)। (आ) बम्बई प्रान्त के पत्र (1) इंडियन […]

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जगत मिथ्या या कोराआभास मात्र नहीं है

जब दयानन्द ने सत्य की खोज में गृह-त्याग किया तब उनका झुकाव वेदान्त की ओर हो गया था। वे ऐसे विद्वान संन्यासियों के संपर्क में आ गये थे जिन पर शांकर मत का प्रभाव था। उन्होंने अनेक वर्षों तक वेदान्त दर्शन एवं तत्सम्बन्धी ग्रंथों का अध्ययन एवं विचार किया था। एक समय तो वे भी […]

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‘सत्यार्थ प्रकाश’ महर्षि दयानंद की अमर क्रांति

संसार में जितने भी ऋषि, महात्मा हुये है-हालांकि उनकी आपस में तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि प्रत्येक अपने-अपने विषय में महान थे। परन्तु महर्षि दयानन्द को महर्षि की उपाधि इसलिये मिली क्योंकि अन्य ऋषियों ने जहां अपने-अपने धर्म या मान्यताओं का गुणगान किया वहीं महर्षि दयानन्द ने अपने धर्म व मान्यताओं का गुणगान तो […]

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युग प्रवर्तक थे महर्षि दयानन्द

भारत महापुरूषों की भूमि है। समय समय पर कभी मानव रूप में तो कभी आप्तपुरूषों के रूप में आर्यावत्र्त की इस देवभूमि में अवतरित होकर बहुत सी दिव्य आत्माओं ने सम्पूर्ण मानवता का कल्याण किया। स्वधर्म, स्वभाषा, स्वराष्ट्र, स्वदेशोन्नति, और स्वसंस्कृति के ध्वजवाहक, समग्रक्रांति के अग्रदूत, ‘कृण्वन्तो विश्वमाय्र्यम्’ अर्थात ‘सारे संसार को आर्य बनाओ’-श्रेष्ठ मानव […]

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उदयपुर में धर्मोपदेश तथा महाराणा सज्जनसिंह को शास्त्राभ्यास

महाराणा सज्जनसिंह की स्वामीजी से प्रथम भेंट तो नवंबर 1881 में चित्तौड़ में ही हो गयी थी। उस समय ही मेवाड़ नरेश के हृदय में स्वामीजी के प्रति आदर और भक्ति के भावों का बीजारोपण हो गया था, तथा उन्होंने स्वामीजी से राजधानी उदयपुर आने का अनुरोध भी किया था। इसे क्रियान्वित करने का अवसर […]

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