राजेश दूबे १९९५-१९९६ में वैश्वीकरण ने अपने पाव भारत में फैलाना आरम्भ किया इसके साथ ही भेड़ बकरियो की तरह समाचार चैनल बाजार में दिखने लगे क्योकि पुरे विश्व को भारत एक उभरते हुए बाजार के रूप में दिखाई दे रहा था और इस बाजार को आम जनमानस तक पहुँचाने के लिए प्रचार प्रसार की […]
Category: भारतीय संस्कृति
आशीर्वाद पिताश्री का
एक बार एक युवक अपनी कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने वाला था। उसकी बहुत दिनों से एक शोरूम में रखी स्पोर्टस कार लेने की इच्छा थी। उसने अपने पिता से कॉलेज की पढ़ाई पूरी होने पर उपहारस्वरूप वह कार लेने की बात कही क्योंकि वह जानता था कि उसके पिता उसकी इच्छा पूरी करने में […]
रामप्रसाद विस्मिल की आत्मकथा
मेरी माँ ग्यारह वर्ष की उम्र में माता जी विवाह कर शाहजहाँपुर आई थीं । उस समय वह नितान्त अशिक्षित एवं ग्रामीण कन्या के सदृश थीं । शाहजहाँपुर आने के थोड़े दिनों बाद श्री दादी जी ने अपनी बहन को बुला लिया । उन्होंने माता जी को गृह-कार्य की शिक्षा दी । थोड़े दिनों में […]
ताजमहल था कभी तेजो महालय मंदिर
राकेश कुमार आर्यताहमहल भारत के गौरवमयी अतीत का नाम है। यह विरासत शुद्घ भारतीयता की देन है। भारतीयता का अभिप्राय आप समझ रहे होंगे। भारतीयता का अर्थ हिंदू संस्कृति से है। यदि ऐसा है तो आप बिल्कुल सच समझ रहे हैं। हमारा आशय उसी हिंदू संस्कृति से है, जिसका ज्ञान विज्ञान, शिल्पकला, हस्तकला, चित्रकला आदि […]
डा. आर. एन. कथड़वैदिक ऋषियों ने समाजसंस्था की स्थापना करने हेतु सद्व्यवहार तथा नैतिक आचरणों के विषय में बहुत कुछ कहा है। जिसमें तत्कालीन सामाजिक नियम, रूढि़ परंपरा, राज्यव्यवस्था, सामाजिक कुरिवाज, सतीप्रथा, जुआ, धनोपार्जनव्यवस्था, पति पत्नीकत्र्तव्य संबंधी नियम, नारी प्रतिष्ठा आदि विषय शामिल हैं। इस लेख में ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा अथर्ववेद के मंत्रों के आधार […]
डा0 इन्द्रा देवीभारतीय विचारक ‘काम’ को मनुष्य की सहज और सर्वाधिक प्रबल प्रवृति मानते हैं। पुरूषार्थ में इसको मान्यता प्रदान की है। श्रृंगार के रसराजत्व की महत्ता भी यही है। समस्त संसारी भावों का समावेश एक मात्र ‘रति’ स्थायी भाव मेें है। मुक्त तृप्ति यदि अमर्यादित एवं पशु जीवन की परिचायक हैं, तो वहीं मर्यादित […]
गाय हमारे जंगलों में उत्पन्न होने वाली कितने ही प्रकार की वनस्पतियों व घासों को चरती है। इसके अतिरिक्त किसान अपने खेत में जो चारा गेंहूं का भूसा, धान का पुआल, मक्का की पुआल, ज्वार, जई, बाजरा आदि उत्पन्न करता है, उन्हें खाती है। प्रभु की अद्भुत कृपा है कि उसने प्रकृति में एक ऐसा […]
मनमोहन कुमार आर्यमहर्षि दयानन्द ने आर्य समाज की स्थापना वेदों के प्रचार व प्रसार के लिए की थी और यही आर्य समाज का मुख्य उद्देश्य भी है। वेदों के प्रचार व प्रसार के पीछे महर्षि दयानन्द का मुख्य उद्देश्य यही था कि वेद ईशवर से उत्पन्न व प्रेरित सब सत्य विद्याओं की ज्ञान की पुस्तक […]
डा. अशोक आर्यविश्व का प्रत्येक प्राणी मृत्यु के नाम से भयभीत है । जब भी उसके कान में यह शब्द पड़ता है तो वह डर जाता है, सहम जाता है, भय से कांपने लगता है । एसा क्यों ? क्योंकि वह मृत्यु के भाव को, मृत्यु के अर्थ को समझ ही नहीं पाया । यदि […]
डा. अशोक आर्यमानव अपने जीवन को सदा सुखों में ही देखना पसंद करता है । वह सदा सुखी रहना चाहता है । सुखी रहने के लिए उसे अनेक प्रकार के यत्न करने होते हैं । अनेक प्रयास करने होते हैं । इन यत्नों के बिना , इन प्रयासों के बिना, इन पुरुषार्थों के बिना वह […]