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भारतीय संस्कृति

मृत्यु विजयी होने के लिए यज्ञ आवश्यक है

download (1)डा. अशोक आर्य
विश्व का प्रत्येक प्राणी मृत्यु के नाम से भयभीत है । जब भी उसके कान में यह शब्द पड़ता है तो वह डर जाता है, सहम जाता है, भय से कांपने लगता है । एसा क्यों ? क्योंकि वह मृत्यु के भाव को, मृत्यु के अर्थ को समझ ही नहीं पाया । यदि वह मृत्यु के अर्थ से सुपरिचित होता तो उसे मृत्यु से भय न होता, यह शब्द सुनकर भयभीत होने के स्थान पर वह रोमांचित होता। मृत्यु कोई भय देने वाली अवस्था का नाम नहीं है । यह तो प्रेरणा का , उद्बोधन का ही पर्याय है । मृत्यु के सम्बन्ध में ऋग्वेद 10.18,2 तथा अथर्ववेद 12.2.30 में विस्तार से बताया गया है । यदि हम म्रत्यु के रहस्य को जानना चाहते हैं , यदि हम मृत्यु पर विजयी होने की आकांक्षा रखते हैं तो इस मन्त्र के भाव को समझें । वेदमन्त्र हमें उपदेश दे रहा है-
मृत्यो पदं योपयन्तो यदैव ,
द्राघिय आयु परतरं दधाना ।
आप्यायमाना प्रजया धनेन ।
शुद्धा पूता भवत यज्ञियास ।।
ऋग्वेद 10.18.2, अथर्ववेद 12.2.30
शब्दार्थ –
(मृत्यो) मृत्यु के (पदम) पद को (योपयंत:) दूर करते हुए (द्राघिय) अतिदीर्घ (आयु) आयु को (प्रतरम) उत्कृष्टता के साथ (दधाना) धारण करते हुए (यत एत) यहाँ आईये (हे यज्ञियास) हे यज्ञ कर्ताओं ! (प्रजया)संतान से (धनेन) धन से (आप्यायमाना) पुष्ट होते हुए (शुद्धा पूता) शुद्ध और पवित्र (भावत) होवो।
भावार्थ –
हे मानवो! मृत्यु के भय को दूर कर, लम्बी व दीर्घ आयु को धारण करते हुए तुम यहाँ आओ । हे यज्ञकर्ताओ! तुम संतान व धन से संपन्न होते हुए, शुद्ध व पवित्र होवो।
इस मन्त्र के माध्यम से यज्ञ के चार लाभ बताये गए हैं। –
1. मृत्यु के भय को दूर करना –
यज्ञ मानव की आयु को बढाता है । आयु का बढऩा ही मृत्यु के भय को निर्मूल करने का साधन है। विचार करें यह कैसे संभव है? यज्ञ की उपयोगिता न केवल भौतिक ही है अपितु यह आध्यात्मिक रूप से भी उपयोगी व लाभकारी है। यह सर्वसिद्ध विषय है कि यज्ञ की सुगंध वायु के दूषण को दूर करती है। अर्थात जहाँ यज्ञ किया जाता है, उस क्षेत्र से इस की सुगंध के कारण तथा इस में डाले गए रोग नाशक औषध के कारण वहां की वायु में विद्यमान दूषित कण नष्ट हो जाते हैं। दूषित कणों के नष्ट होने से वायु शुद्ध हो जाता है। शुद्ध वायु में आक्सीजन की मात्रा बढ़ जाती है अर्थात इससे प्राण शक्ति प्राप्त होती है। यह प्राण शक्ति अथवा आक्सीजन जब श्वास के माध्यम से शरीर में जाती है तो यह हमारे फेफड़ों को शुद्ध करती है। जिस व्यक्ति के फेफड़े शुद्ध होते हैं तो वह सदा निरोगी तथा पुष्ट रहता है। इस से स्पष्ट होता है कि प्राणवायु श्वास द्वारा फेफड़ों में जा कर उन्हें शुद्ध करती है, इससे हम पुष्टि व निरोगता को प्राप्त करते हैं । निरोगी व्यक्ति कभी मृत्यु से भयभीत नहीं होता। अत: प्राण शक्ति के फेफड़ों में जाने से वह शुद्ध होते हैं, इससे हम पुष्ट व निरोग होकर मृत्यु को भयकारी नहीं मानते। जिस व्यक्ति के फेफड़े शक्तिशाली होते हैं, वह दीर्घ काल तक श्वास लेने की क्षमता प्राप्त कर लेते हैं। इससे आयु स्वयमेव ही दीर्घ हो जाती है। इस से भी यह तथ्य सामने आता है कि यज्ञ से शुद्ध हुयी वायु फेफड़ों को निरोगता प्रदान कराती है। शुद्ध फेफड़े शरीर की ठीक व्यवस्था करने में समर्थ हॉट हैं तथा आयु लम्बी हो जाती है, जिसकी आयु लम्बी होती है, उसे कभी मृत्यु का भय नहीं होता। अत: मूल को जाने, यह यज्ञ ही है, जो फेफड़ों को शुद्ध वायु देकर उन्हें निरोग व पुष्ट करता है , मानव को पुष्टि देता है , निरोगता से मानव की आयु लम्बी होने से मानव भय रहित हो जाता है । जिस यज्ञ के इतने लाभ हैं , उसे करने से हम क्यों डरें , क्यों परहेज करें ? अत: मृत्यु के भय से बचने के लिए हमें प्रतिदिन यज्ञ करना चाहिए ।
2. दीर्घायुष्य –
जैसे ऊपर विस्तार से बताया गया है कि यज्ञ दीर्घायु का साधन है , क्योंकि यह फेफड़ों को शुद्ध वायु देता है , शुद्ध वायु से फेफड़े रोग रहित हो कर शरीर के अन्य अंगों से भी रोगाणु नाश करते हैं । जब शरीर से रोगाणु नाश हो जाते हैं तो मानव को कोई कष्ट क्लेश नहीं रहता , कोई भी कार्य करने में उसे प्रसन्नता का अनुभव होने लगता है। प्रसन्न मन से मानव निश्चिन्त हो सब कार्य करता है। यह उस की आयु को भी लंबा करता है । इस लिए मन्त्र हमें आदेश दे रहा है कि हे मनुष्य! यदि तू दीर्घायु की कामना करता है तो प्रतिदिन यज्ञ कर, यदि तू मृत्यु के भय से मुक्त होना चाहता है तो प्रतिदिन यज्ञ कर। स्पष्ट है कि मृत्यु विजेता होने के लिए जो आधार है, वह यज्ञ ही है। अत: मृत्यु से मुक्ति के लिए जो दीर्घायु आवश्यक है, उसे पाने के लिए हमें प्रतिदिन यज्ञ करने का संकल्प लेना होगा ।
3. धन धन्य से समृद्धि –
यज्ञ करने से मानव जब स्वस्थ हो जाता है तो उसमें कठोर परिश्रम करने की क्षमता भी आ जाती है। रोगी शरीर तो स्वयं को ही नहीं संभाल पाता, परिश्रम कैसे करेगा? परिश्रम के लिए शरीर का स्वस्थ होना आवश्यक है । यज्ञ करने से फेफड़ों को शुद्ध वायु मिलने से वह शुद्ध व रोग रहित हो गए। रोग रहित फेफड़ों ने शरीर के अन्य भागों को भी पुष्टि देकर उन्हें रोग रहित कर दिया। समग्र शरीर के स्वस्थ होने से इस में परिश्रम करने की क्षमता भी बढ़ गयी । यह परिश्रम ही है, जिसे करने से मानव धन का उपार्जन करता है। अत: अब परिश्रम द्वारा वह प्रचुर मात्रा मैं धन प्राप्त कर लेता है। अब वह न केवल अपनी आवश्यकताएं ही पूर्ण करता है अपितु दूसरों का भी सहयोगी बन जाता है । इससे उसे अपार प्रसन्नता का आभास होता है । जब अत्यधिक धन वह प्राप्त करता है तथा उतम ढंग से इस धन का वह विनियोग भी कर लेता है , तो इस के धन की और भी वृद्धि होती है ।
इस प्रकार सम्पन्नता , दान करने व एश्वर्य की प्राप्ति से उस की चर्चा भी प्रत्येक प्राणी अति सम्मान से करने लगता है, जिससे उसकी प्रतिष्ठा को चार चाँद लग जाते हैं। इस प्रकार का प्रतिष्ठित व्यक्ति निश्चय ही दीर्घायु प्राप्त करता है । यज्ञ के इन लाभों को देखते हुए हमें प्रतिदिन यज्ञ करना चाहिए ।
4. पवित्रता –
यज्ञ करने से शुद्धता व पवित्रता का भी आघान होता है। चारों वेदों ने यज्ञ की महिमा का विस्तार से वर्णन करते हुए इसे श्रेष्ठतम कर्म बताया है । यह एक निस्वार्थ सेवा है। जो यज्ञ करता है , उसका स्वयं का कल्याण तो होता ही है, इसके साथ ही साथ उसके आस पास रहने वाले लोगों का भी कल्याण स्वयमेव ही हो जाता है। अत: यह सर्व मंगल, सर्व कल्याण का एक सुन्दर व उपयोगी साधन है । यज्ञ करने वाला कभी किसी अन्य से वैर विरोध नहीं रखता । यह एक सर्वश्रष्ठ गुप्त दान है। इस के प्रभाव व गैसों के वायुमंडल में फ़ैलने पर कौन कौन व्यक्ति कितना लाभ उठा रहा है, इस का ज्ञान यज्ञ कर्ता को नहीं होता, इस लिए यह सच्चे अर्थों में गुप्त दान है । यही ही स्वार्थ भावना को नाश करने का लक्षण है। मानव को अपवित्र करने वाली स्वार्थ भावना ही होती है । जब उसमें स्वार्थ भावना नहीं रहती तो वह स्वयमेव ही पवित्र हो जाता है । यज्ञ करते समय प्रत्येक आहुति के साथ स्वाहा तथा इद्न्न मम् का उच्चारण किया जाता है । यह शब्द उसकी स्वार्थ भावना का नाश कर उस के हृदय को शुद्ध कर देते हैं , उसके ह्रदय को पवित्रता प्रदान करते हैं। जहाँ शुद्ध व पवित्रता होता है, वहां मृत्यु आदि का किसी को भय नहीं होता तथा वहां के लोगों की आयु लम्बी हो जाती है।
इस सब से स्पष्ट है कि यज्ञ से पर्यावरण शुद्ध होता है, पर्यावरण की शुद्ध वायु फेफड़ों में जाने से फेफड़े निरोग हो शरीर को भी निरोग करते हैं। निरोग शरीर में अधिक परिश्रम की शक्ति आती है।
अधिक व कठोर परिश्रम से अत्यधिक धन एश्वर्य की प्राप्ति होती है, स्वार्थ भावना का ह्रास होता है तथा दानशीलता आती है। इस सब से प्रसन्नता के साथ ही साथ प्रसिद्धि होती है। इससे प्रसन्नता पहले से भी अधिक बढती है। प्रसन्न शरीर ही दीर्घायु का कारण बनता है तथा दीर्घायु वाले व्यक्ति मृत्यु को विजय कर लेते हंै अर्थात मृत्यु से कभी भयभीत नहीं होते। जिस यज्ञ के इतने लाभ हैं उसे हमें अवश्य ही अपनाना चाहिए। इसे अपनाने से हम निश्चित ही मृत्यु पर विजय पाने मैं सफल होंगे।

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