हमें दिव्य संगति कैसे प्राप्त हो सकती है? हमें दिव्य संगति क्यों प्राप्त करनी चाहिए? होतारं सप्त जुह््वो३ यजिष्ठं यं वाघतो वृृणते अध्वरेषु। अग्निं विश्वेषामरतिं वसूनां सपर्यामि प्रयसा यामि रत्नम््।। ऋग्वेद मन्त्र 1.58.7 (कुल मंत्र 680) (होतारम्) पदार्थों का लाने वाला और स्वीकार करने वाला (सप्त) सात (जुह््वः) ज्ञान की आहुतियाँ देता है (यजिष्ठम्) आह्वान […]