गीता का तेरहवां अध्याय और विश्व समाज जैसे एक खेत का स्वामी अपने खेत के कोने-कोने से परिचित होता है कि खेत में कहां कुंआ है? कहां उसमें ऊंचाई है? कहां नीचा है? उसकी मिट्टी कैसी है? उसमें कौन सी फसल बोयी जानी उचित होगी?-इत्यादि। वैसे ही हममें से अधिकांश लोग संसार में शरीर धारी […]
Author: डॉ॰ राकेश कुमार आर्य
लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता है
गीता का तेरहवां अध्याय और विश्व समाज श्री अरविन्द का कहना है कि कर्म को और ज्ञान को हम अपनी इच्छा से चलायें या इन्हें भगवान की इच्छा में लीन कर दें? -गीता ने इस प्रश्न को उठाकर इसका उत्तर दिया है। हमारा कर्म, हमारा ज्ञान कितना संकुचित है, कितना छोटा है? मशीन का छोटा […]
गीता का बारहवां अध्याय और विश्व समाज यहां पर गीता के 12वें अध्याय के जिस श्लोक का अर्थ हमने ऊपर दिया है-उसमें ‘सर्वारम्भ परित्यागी’ शब्द आया है। इसके विषय में सत्यव्रत सिद्घान्तालंकार जी बड़ी तार्किक बात कहते हैं :-”सर्वारम्भ त्यागी का अर्थ कुछ लोग यह करते हैं कि जो किसी नवीन कार्य का आरम्भ नहीं […]
लोकतंत्र आलोचना की अनुमति देता है, निन्दा की नहीं। यह शासन प्रणाली आलोचना की रचनात्मक और पैनी हुई धार से ऊर्जा पाती है और जनकल्याण में लगी रहती है। कुछ लोगों ने जनकल्याण का अर्थ केवल विकास कार्यों तक लगाया है कि यदि सरकार सडक़ बनवाने, अस्पताल खुलवाने और बिजली आदि की व्यवस्था कर रही […]
गीता का बारहवां अध्याय और विश्व समाज गीता का उद्देश्य है कि हे संसार के लोगों! चाहे तुम जिस रास्ते को भी अपनाओ उसे अपना लो, पर मेरी एक शर्त है कि बनो धार्मिक। तुम्हारी धार्मिकता ही तुम्हें संसार के लिए उपयोगी बनाये रखेगी। यदि बहुत ऊंची और गहरे ज्ञान की बातें नहीं अपना सको […]
एक संत का सदुपदेश और हमारी स्वराज्य साधना एक संत प्रवचन कर रहे थे। प्रवचन के समय एक जिज्ञासु ने एक जिज्ञासा व्यक्त करते हुए संत से प्रश्न किया-‘मेरी ध्यान में रूचि क्यों नही होती?’ संत बोले, -‘ध्यान में रूचि तब आएगी जब व्यग्रता से उसकी आवश्यकता अनुभव करोगे।’ तब उन्होंने एक प्रसंग सुनाया कि […]
गीता का बारहवां अध्याय और विश्व समाज यह जो अव्यक्त है ना, इसके ओर-छोर का पता तो प्रकाश की गति से दौडक़र भी नहंी लगाया जा सकता। इसके उपासक होने का अर्थ भी उतना ही व्यापक है जितना अव्यक्त स्वयं में व्यापक है, विशाल है, विस्तृत है। आप अनुमान करें कि यह पृथ्वी जैसा विशाल […]
आर्य समाज का सिद्घांत है कि सब सत्यविद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं उन सबका आदिमूल परिमेश्वर है। साथ ही यह भी कि वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है, वेद का पढऩा-पढ़ाना और सुनना-सुनाना सब आर्यों का परमधर्म है। महर्षि दयानन्द जी महाराज ने आर्य समाज के लिए ही नहीं-अपितु मानव […]
गीता का ग्यारह अध्याय और विश्व समाज श्रीकृष्णजी को यह स्पष्ट हो गया था कि अब युद्घ अनिवार्य है और अर्जुन ने गांडीव की डींगें हांकते हुए कौरवों को समाप्त करने का संकल्प भी ले लिया पर जब युद्घ की घड़ी आयी तो अर्जुन की मति मारी गयी। अब वह ‘किंकत्र्तव्यविमूढ़’ हो गया। श्रीकृष्णजी नहीं […]
गीता का ग्यारह अध्याय और विश्व समाज श्रीकृष्ण जी कह रहे हैं कि अर्जुन अब जो कुछ होने जा रहा है उससे क्यारियों में नये फूल खिलने वाले हैं। इन पौधों का समय पूर्ण हो गया है। ये अपने कर्मों का फल पाने के लिए अब अपने आप ही मृत्यु के ग्रास बनकर यहां आ […]