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-स्व० श्री महात्मा हंसराज जी

अपने ग्राम में मैंने केवल एक बार किसी वृद्ध व्यक्ति से सुना था कि लाहौर में एक साधु आया हुआ है, जो ईसाइयों से वेतन पाता है तथा हिन्दू धर्म के विरुद्ध उपदेश करता है। उस समय मुझे यह ज्ञात नहीं था कि यह ऋषि दयानन्द है तथा उनका उपदेश क्या है। मेरी आयु उस समय छोटी थी और न ही विद्या की योग्यता थी। जब मैं सन् १८७९ में लाहौर आया तो मेरे बड़े भाई ने जो उस समय डाकघर में कार्य करते थे, मुझे राजकीय विद्यालय में प्रविष्ट करा दिया। उस समय विद्यालय का भवन नहीं था। राजा ध्यानसिंह की हवेली में विद्यालय की श्रेणियां लगा करती थी। सरदार हरिसिंह जो बाद में निरीक्षक (Inspector) होकर विख्यात हुए, मिडल स्कूल के हैडमास्टर थे। मैं कुछ मास उनकी छत्र छाया में विद्या अध्ययन करता रहा। फिर बीमार होने के कारण मैंने राजकीय विद्यालय छोड़ दिया। स्वस्थ होने पर भाई साहब ने मुझे यूकल्ड की शिक्षा स्वयं दी। और फिर रंग महल में मिशन स्कूल में प्रविष्ट करा दिया। मैं वहां पढ़ता रहा। बाबू काली प्रसन चटरजी जो बाद में आर्य समाज के उत्तम सेवक बने, हमारे साथ स्कूल में पढ़ते थे। वह अपनी विनोद प्रियता से हमको हंसाते रहते थे। एक बार उन्होंने उस समय की एक पुस्तक ‘रसूमें दिन्द’ के कुछ वाक्य पढ़ कर बताया कि इसमें हिन्दुओं की कितनी निन्दा की गई है। इस किताब में हिन्दुओं के जो चरित्र दिये गये हैं वे गंवारों और चोरों के हैं। मुसलमानों के चरित्र सज्जन और धनिकों के हैं।
मैंने होशियारपुर स्कूल में संस्कृत अन्य भाषा के रूप में ली। मैं फारसी भी पढ़ता रहा। मिशन स्कूल में संस्कृत और फारसी दोनों का अध्ययन करता रहा। हमारे विद्यालय के मुख्याध्यापक पं० तेजमान थे। वे कहा करते थे कि एक बार उनका स्वामी दयानन्द के साथ वार्तालाप हुआ था। वह वार्तालाप में असफल इसलिए हुआ कि स्वामी दयानन्द ने कई भूत प्रेतों को सिद्ध किया हुआ था और उनकी शक्ति के कारण विरोधियों को वश में कर लेते थे। मैंने उस समय तक न आर्य समाज का मन्दिर देखा था और न ही स्वामी जी की कोई पुस्तक पढ़ी थी। आर्य समाज में उपदेश देने वाले भी बहुत कम थे इसलिये मैंने किसी आर्य समाजी का व्याख्यान भी नहीं सुना था।

उस समय मिशन स्कूल में दो मास्टर प्रसिद्ध थे। पादरी फोरमैन साहब तो स्कूल के प्रिंसिपल थे। विद्यालय के हाल में सब विद्यार्थियों और अध्यापकों को एकत्रित करके नमाज पढ़ाते और इञ्जील की किसी आयत की व्याख्या करते। विद्यार्थियों के साथ उनका विशेष सम्बन्ध नहीं था। स्कूल के हैडमास्टर श्रीरामचन्द्र दास बड़े योग्य, लड़कों से प्रेम करने वाले, देश प्रेमी तथा उदार हृदय इसाई थे। सेकिण्ड मास्टर श्री बोस अपने विषय में कोई विशेष योग्यता नहीं रखते थे परन्तु मिशन स्कूल के लिए धन एकत्रित करने में बड़े निपुण थे। लड़के उनसे विनोद भी कर लेते थे। इसका कारण यह था कि अवकाश देना और शुल्क तथा जुर्माना प्राप्त करना उन का कार्य था। छुट्टी देते समय वे देख लिया करते थे कि उस दिन कोई हिन्दुओं का त्योंहार है अथवा नहीं। उदाहरणतः श्राद्धों के दिनों में जो विद्यार्थी छुट्टी लेता उससे वह दो पैसे प्रतिदिन उगा लिया करते थे। कभी-कभी झगड़ा भी हो जाता। परन्तु अध्यापक महोदय स्कूल की आर्थिक दशा का बहुत ध्यान रखते थे। मेरे सम्बन्ध में उनका यह विचार था कि में योग्य विद्यार्थी हूँ परन्तु साथ ही कुछ चञ्चल भी हूँ, क्योंकि मैं कह दिया करता था कि जिन त्यौहारों में सम्मलित होना इसाई पादरी ठीक नहीं समझते, उन में सम्मलित होने का टैक्स लेते हैं। टैक्स लेना उचित नहीं।

एक दिन हमारी दसवीं श्रेणी हैडमास्टर महोदय के पास अंग्रेजी की पुस्तक जिस का नाम सीनियर रीडर (Senior Reader) था, पढ़ रहा था। अध्यापक महोदय जानते थे कि मैंने हजरत ईसा के जीवन चरित्र की पुस्तक, जो हमारा कोर्स था अच्छी प्रकार पढ़ा हुआ है। अतः इस पुस्तक में से मुझ से बहुधा प्रश्न किया करते थे। मैं उनका सन्तोषपूर्ण उत्तर दे देता था और वे मुझ से प्रसन्न थे। सीनियर रीडर में प्रथम पाठ यह था कि संसार को बने हुए छः हजार वर्ष व्यतीत हुए हैं। जो मनुष्य आरम्भ में हुए उनका अनुभव वर्तमान मनुष्यों की अपेक्षा बहुत कम था और इसलिये उनकी योग्यता और विद्या वर्तमान समय की अपेक्षा बहुत कम थी।
हैडमास्टर महोदय ने मुझ से पूछा कि हंसराज! क्या यह सच है? मैंने बचपन की चञ्चलता में अध्यापक महोदय पर एक उल्टा प्रश्न कर दिया। मैंने पूछा कि क्या पिता का अनुभव अधिक होता है या पुत्र का? इसका उत्तर अध्यापक महोदय क्या दे सकते थे। यह तो नहीं कह सकते थे कि पिता का अनुभव कम होता है। वे कुछ तंग से हो गये। उन्होंने कहा-“प्राचीन हिन्दुओं को ईश्वर का ज्ञान नहीं था। वे अग्नि, वायु, जल और सूर्य आदि की पूजा किया करते थे।” मैंने कहा- “श्रीमान्! यह बात ठीक नहीं। ‘कसिस हिन्द’ में मैंने पढ़ा हुआ था कि हिन्दुओं को ईश्वर का ज्ञान था। वे परमेश्वर को मानते थे जिसके पांव नहीं परन्तु प्रत्येक स्थान पर पहुंचता है। उसके हाथ नहीं परन्तु सब ग्रहण करता है, इत्यादि।” मैंने सब कुछ सुना दिया। इसका उत्तर क्या बन सकता था। परन्तु मुझे यह पता नहीं था कि अग्नि वायु की पूजा के सम्बन्ध में ठीक विचार क्या है। मैंने यूं ही यह सनातनी उत्तर दे दिया कि प्राचीन आर्य लोग इन भूतों के द्वारा परमेश्वर की पूजा किया करते थे न कि भूतों की। हैडमास्टर महोदय संस्कृत से अनभिज्ञ थे वे क्या कह सकते थे। अन्त में उन्होंने कहा कि देखो इस रीडर में यह लिखा है और इसलिए यह सत्य है, यह उनकी युक्ति थी। मैंने तुरन्त कह दिया कि रीडर बनाने वाले की मूर्खता है जो उसने ऐसा लिख दिया। इस पर उन्होंने मुझे तीन चार बेंत लगाये और कक्षा से बाहर कर दिया। मैं बाहर निकल आया और अगले दिन सैकिण्ड मास्टर साहब के पास गया और कहा कि हैडमास्टर महोदय के पास शिफ़ारश करके मुझे कक्षा में सम्मलित होने की आज्ञा ले दें। वे बंगाली तो थे ही। उर्दू अच्छी प्रकार नहीं बोल सकते थे, कहा, “हंसराज! मैं तो पहले ही समझता था कि तुम चञ्चल हो, तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिये था, मैं प्रयत्न करूंगा।” दो तीन दिन में मुझे कक्षा में बैठने की आज्ञा मिल गई और मैंने भी अपने हृदय में यह ठान लिया कि मैं श्रेणी में ईसाई मत के विरुद्ध कुछ नहीं कहूँगा। वास्तविकता यह थी कि मैं अपनी कक्षा में एक योग्य छात्र था और हैडमास्टर भी मुझसे प्रेम करते थे। यदि मैं भूल नहीं करता, तो उस साल मिशन स्कूल में १७ छात्रों में से केवल मैं ही मैट्रिक में उत्तीर्ण हुआ।

श्री रामचन्द्र दास का प्रेम मेरे साथ बहुत था। उनके देश प्रेम की बातों को हम बहुत पसन्द करते थे। यद्यपि वे इसाई थे फिर भी मेरे हृदय में उनका बड़ा आदर था। यह जानते हुए भी कि मैं आर्य समाजी हूँ और इसाई मत की शिक्षा को अशुद्ध समझता हूं, वे बहुत बार यही कहा करते थे कि मुझे अपने विद्यार्थी हंसराज पर बड़ा गर्व है। मैं भी जब कभी उनसे मिलता था तो उनके घुटनों पर हाथ लगा कर उनको नमस्ते कहता था। एक बार मैंने उनकी सेवा में मिठाई अर्पित की और उन्होंने उसे स्वीकार कर मुझे सम्मानित किया।
प्रधानाध्यापक महोदय के साथ मेरा जो विवाद हुआ था उससे मेरे हृदय पर विशेष प्रभाव पड़ा और मुझे यह जानने की इच्छा हुई कि क्या हमारे पूर्वज प्रकृति के उपासक थे। अथवा केवल ईश्वर को ही मानते और पूजते थे। अतः मैंने इधर उधर पूछ कर आर्य समाज के साप्ताहिक सत्संग में जाना प्रारम्भ कर दिया। मैं आर्य समाज के उपदेशों को सुनता और पत्रों को पढ़ता। लाहौर समाज के प्रधान स्वर्गीय ला० सांईदास जी की दृष्टि नये व्यक्तियों पर जो समाज में आवें, बड़ी जल्दी पड़ती थी। उन्होंने मुझे बुलाया और आज्ञा दी कि मैं सन्ध्या याद कर लूँ। उन्होंने विद्यार्थियों का उत्साह बढ़ाने के लिये यह सूचना भी दे दी कि जो विद्यार्थी उनको सन्ध्या कण्ठस्थ सुना देगा उस को वे पारितोषिक देंगे। मैंने संध्या उन्हें सुना दी और उनसे दो रुपया पारितोषिक के रूप में प्राप्त कर लिया। मैं समाज के साप्ताहिक सत्संगों से कभी अनुपस्थित नहीं होता। यद्यपि समाज में उपदेश पं० अखिलानन्द जी के और पं० मूलराज जी के हुआ करते थे और उनका भाषण देने का ढंग इस इस प्रकार था कि प्रथम का तो वाक्य कभी समाप्त ही नहीं होता था और दूसरे महोदय की एक मन्त्र की व्याख्या दूसरे मन्त्र की व्याख्या से कदापि भिन्न न होती थी। इनके पश्चात् भाई दत्तसिंह जी श्रोर जौहरसिंह जी के लैक्चर सिख इतिहास और ईसाई मत का खण्डन बड़े आनन्द से सुनते थे। उस समय ये दोनों महोदय आर्य समाज के सदस्य और लैक्चरर थे और आर्य समाज में उनका अच्छा मान था। बाद में विशेष कारणों से वे आर्य समाज के कट्टर विरोधी बन गये। मुझे साप्ताहिक सत्संग में सम्मलित होने की इतनी लग्न थी कि मैं समाज के सत्संगों से अपने मैट्रिक की परीक्षा के दिनों में भी अनुपस्थित नहीं रहा।

[नोट- आर्यसमाज की विचारधारा सामाजिक कुरीतियों की नाशयित्री और बौद्धिक क्रान्ति की प्रकाशिका है। इसके वैदिक विचारों ने अनेकों के हृदय में सत्य का प्रकाश किया है। इस लेख के माध्यम से आप उन विद्वानों के बारे में पढ़ेंगे जिन्होंने आर्यसमाज को जानने के बाद आत्मोन्नति करते हुए समाज को उन्नतिशील कैसे बनायें, इसमें अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। ये लेख स्वामी जगदीश्वरानन्द द्वारा सम्पादित “वेद-प्रकाश” मासिक पत्रिका के १९५८ के अंकों में “मैं आर्यसमाजी कैसे बना?” नामक शीर्षक से प्रकाशित हुए थे। प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ]

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