मेरे मानस के राम – अध्याय 10 : शूर्पनखा की नाक काटना और सीता हरण

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इसी वन में रहते हुए लंका के रावण की बहन शूर्पनखा से श्री राम, सीता जी और लक्ष्मण जी का सामना होता है। एक दिन वह राक्षसिन स्वयं ही उनके आश्रम में आ पहुंचती है। वह श्री राम और लक्ष्मण को देखते ही उन पर आसक्त हो गई। तब वह काम भावना से प्रेरित होकर श्री राम और लक्ष्मण के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखकर उन पर डोरे डालने लगती है।

शूर्पनखा आई यहां, रख दिए दुष्ट विचार।
समझाया श्री राम ने, त्यागो दुष्ट विचार।।

राक्षस कुल की भावना, और वही संस्कार।
शूर्पनखा समझी नहीं, कटवा ली थी नाक।।

कटी नाक लेकर गई , खर दूषण के पास।
राक्षस चौदह चल दिए, करें राम का नाश।।

बाणों के आघात से, पहुंचे सब यमलोक।
देख राम की वीरता, दुष्ट मना रहे शोक।।

खर दूषण खुद ही चले, करें राम का नाश।
दूषण को पहुंचा दिया, यमदूतों के पास।।

अपने भाई खर और दूषण के साथ-साथ अनेक राक्षसों का अंत कराने के पश्चात अब शूर्पणखा के पास केवल एक ही विकल्प था कि वह अपने साथ हुई घटना का वृतांत अपने भाई लंकाधिपति रावण को जाकर बताए। फलस्वरुप वह द्रुतगति से अपने भाई रावण के पास पहुंचती है। वह अपने भाई रावण से जाकर रहती है कि “हे रावण ! नीति मर्यादा को त्याग निरंकुश होकर तू कामभोगों में प्रवृत्त होकर मतवाला हो रहा है। अतः राक्षस जाति पर जो घोर संकट इस समय उपस्थित है , उसे तू जान नहीं पा रहा है। तेरे लिए यह सब उचित नहीं है। तू कामोन्मत्त और पराधीन होने के कारण अपने राज्य के ऊपर आए हुए संकट को भी नहीं समझ पा रहा है।” ऐसा कहकर उसने रावण के अहंकार को जागृत किया और फिर आप बीती सुना डाली।

खर का भी किया अन्त फिर जितने शत्रु साथ।
शूर्पनखा गई अंत में, लंकेश्वर के पास।।

हाल सुना लंकेश ने, शीश चढ़ा अहंकार।
अंत करूं मैं राम का, कहता बारंबार।।

यह सब सुनने के पश्चात रावण अपने मामा मारीच के साथ गहन मंत्रणा करता है और उसे राम को अपने मायावी जाल में फंसा कर मारने के लिए प्रेरित करता है। मारीच ने ऐसा कार्य करने से रोकने की प्रेरणा देते हुए रावण को समझाने का प्रयास किया कि वह ऐसा निंदनीय कार्य न करे। पर अहंकारी रावण अंत में क्रोध में भर जाता है और अपने मामा को कठोर शब्दों में चेतावनी देते हुए अपने द्वारा बनाई गई योजना को सिरे चढ़ाने की हठ कर बैठता है।

मारीच साथ की वार्ता ,रचा घोर षड़यंत्र।
राम को कैसे मारना, पढ़ा दिया उसे मंत्र।।

मृग सोने का बन गया, वह नीच मारीच।
मायावी संसार को, राम ना पाए सीख।।

सीता जी हठ कर गईं, पकड़ो मृग मेरे राम।
मृग पकड़ने चल दिए, ज्ञानी मनस्वी राम।।

सीता जी के पास में , छोड़ लक्ष्मण वीर।
जंगल में भटके फिरें, राम चला रहे तीर।।

छल कपट में फंस गए, राम लखन दोऊ वीर।
हरण सिया का हो गया, समझे ना रघुवीर।।

जब रावण ने देखा कि रामचंद्र जी उनके मायाजाल में फंस चुके हैं। तब वह स्वयं उनकी सूनी कुटिया पर एक सन्यासी के भेष में जाकर खड़ा हो जाता है और सीता जी का अपहरण कर लेता है। यहां यह बात भी उल्लेखनीय है कि अपने भाई राम की सहायता के लिए जाते हुए लक्ष्मण ने कोई ऐसी रेखा सीता जी की कुटिया के सामने नहीं खींची थी, जिसे रावण लांघ नहीं सकता था । वस्तुत: मूल वाल्मीकि रामायण में ऐसी किसी लक्ष्मण रेखा का कहीं कोई उल्लेख नहीं है।

कुटिया सूनी देख कर, दु:खित हुए श्री राम।
समझ गए षड़यंत्र को, करने लगे विलाप।।

अहंकारी लंकेश को , दी सीता ने फटकार।
राम ! राम !! ही आ रहा, मुख से बारंबार।।

डॉ राकेश कुमार आर्य

( लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता है। )

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