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Dr DK Garg

निवेदन : ये लेखमाला 20 भाग में है। इसके लिए सत्यार्थ प्रकाश एवं अन्य वैदिक विद्वानों के द्वारा लिखे गए लेखों की मदद ली गयी है। कृपया अपने विचार बताये और उत्साह वर्धन के लिए शेयर भी करें।

जैन धर्म में मोक्ष्य और त्याग

जैन धर्म ने स्वयं को मुख्य रूप से त्याग के लिए प्रसिद्ध किया है और अपनी हर गतिविधि को मोक्ष्य का मार्ग बताया है। इसको समझना जरुरी है।

त्याग और तप में क्या सम्बन्ध है?

किसी चीज़ को छोड़ देना त्याग है, जबकि धर्म के निर्वहन में आने वाली कठिनाइयों को शान्ति व धैर्य से सहन करना तप है। इन कठिनाइयों से अभिप्राय हमारा कुछ वस्तुओं को छोड़ देना अथवा उनका छूट जाना होता है। इस तरह त्याग की भावना तप में निहित होती है। ‘त्याग’ तभी सार्थक होता है, जब उसको करते हुए मन में प्रसन्नता का भाव हो। त्याग में चीजों का छोड़ना हमारी इच्छा से होता है। जब तक हम अपना कुछ समय, धन, सुख-सुविधा आदि न्यौछावर करने को तैयार नहीं होते, तब तक हम अपने परिवार, समाज, राष्ट्र आदि के लिए कुछ नहीं कर सकते।

मोक्ष्य की प्राप्ति कैसे ? लेखक – स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी
मोक्ष-प्राप्ति का साधन ज्ञान है, कर्म है वा ज्ञान-कर्म उभय हैं। ज्ञान-कर्म उभय होने पर भी कर्म समुच्चय है वा सम समुच्चय है। इस विषय में महर्षि दयानन्द जी का क्या पक्ष है ?
मोक्ष-प्राप्ति के पश्चात् जीव पुनः जन्म प्राप्त करता है वा नहीं, अर्थात् मोक्ष सान्त है वा अनन्त है। इसमें महर्षि का क्या मत है। इन दोनों पर संक्षेप से अन्य पक्ष और भूमि पक्ष लिखने का यत्न करूंगा। मोक्ष का साधन ज्ञान ही है।
सांख्य तथा वेदान्त दोनों ज्ञान ही को मोक्ष का साधन मानते हैं। इसमें यजुर्वेद का निम्न मन्त्र प्रमाण देते हैं।
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्।
तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥ [यजु० ३१ । १८]
प्रकाशस्वरूप, अज्ञान रहित सर्वव्यापक, महान् रूप परमात्मा को जान । उसे जानकर ही मृत्यु को तर कर मोक्ष को प्राप्त होता है। मोक्ष का और मार्ग नहीं है।
इस मन्त्र में ज्ञान को साधन मान कर अन्य मार्ग का निषेध भी किया है। इसलिए मोक्ष का साधन ज्ञान ही है।
कर्मवादी मुख्य मीमांसक हैं। जो कहते हैं।
यावज्जीवेदग्निहोत्रं जुहेत्।
जब तक जीवे अग्निहोत्र करता रहे। इसका पोषक वेदमन्त्र भी है।
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥ यजु० ४० । २
सौ वर्ष तक कर्म करता हुआ ही जीने की इच्छा करे, यही मार्ग है। अन्य मार्ग नहीं है। इस प्रकार मनुष्य को कर्म नहीं बाँधते हैं।
इस मन्त्र में आजीवन कर्म करने का विधान है। जैसे पूर्व मन्त्र में अन्य मार्ग का निषेध था इसमें भी अन्य मार्ग का निषेध है, जब दोनों मन्त्रों में अन्य मत का निषेध है। तब यह विषय अधिक चिन्तनीय है, क्योंकि दोनों मन्त्र वेद के हैं। यदि किसी अन्य पुस्तक के होते तो परत:प्रमाणः से स्वत:प्रमाण को प्रबल मान कर परत:प्रमाण का कुछ निषेध हो जाता। ऐसा न होने से दोनों ही प्रमाण माननीय हैं।
अब दोनों की संगति करनी होगी, क्योंकि कणाद जी ने लिखा है- “बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिः वेदे।” । अर्थात् वेद में सब वाक्य बुद्धिपूर्वक हैं। आर्ष आदेश के अनुसार यह विरोधाभास होने से इसका निवारण करना ही होगा, वह मेरी सम्मति में इस प्रकार है।
अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते।
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः॥ यजु० ४० । १२
जो कर्म, उपासना (अविद्या) ही करता है वह दुःख को प्राप्त होता है और जो ज्ञान में ही रत है वह उससे भी अधिक दुःख को प्राप्त होता है।
जैसे पहले मन्त्रों में ज्ञान और कर्म की प्रशंसा करके अन्य का निषेध था । इस मन्त्र में अकेले कर्म की भी निन्दा है और अकेले ज्ञान की भी निन्दा है।
अगले मन्त्र का पाठ यह है।
विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह।
अविद्यया मृत्यु तीत्व विद्ययामृतमश्नुते ॥ यजु० ४० । १४
जो मनुष्य विद्या और अविद्या दोनों को साथ-साथ प्राप्त करता है। वह अविद्या से मृत्यु को तर के विद्या से मोक्ष को प्राप्त होता है।
इस मन्त्र के अर्थ सत्यार्थप्रकाश के नवम समुल्लास के आरम्भ में इस प्रकार लिखे हैं
जो मनुष्य विद्या और अविद्या के स्वरूप को साथ ही साथ जानता है वह अविद्या, अर्थात् कर्मोपासना से मृत्यु को तर के विद्या, अर्थात् यथार्थ ज्ञान से मोक्ष को प्राप्त होता है।
इस मन्त्र में ‘उभयं सह’ पाठ है, जिसका अर्थ ‘दोनों साथ’ है। इस प्रकार यह मन्त्र कर्म और ज्ञान दोनों का विधायक है और पहला मन्त्र एक-एक का निषेधक है और पहले मन्त्र एक-एक के विधायक होकर दूसरे के निषेधक थे। अब व्यवस्था यह हो जाएगी-पहले मन्त्र में जो एक को ही मानकर दूसरे का निषेध करते हैं, वह अर्थवाद है यह तो दोनों मन्त्र हैं। एक में एक-एक का निषेध वर्णन है और दूसरे में दोनों का साथ-साथ विधान है। साथ-साथ भी सम समुच्चय है कर्म समुच्चय नहीं है।
महर्षि दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश में मोक्ष प्रकरण में इस प्रकार लिखा है।
“पवित्र कर्म पवित्रोपासना और पवित्र ज्ञान ही से मुक्ति और अपवित्र मिथ्या भाषणादि कर्म, पाषाणमूर्यादि की उपासना और मिथ्या ज्ञान से बन्ध होता है। कोई भी मनुष्य क्षण मात्र भी कर्म उपासना और ज्ञान से रहित नहीं होता, इसलिए धर्मयुक्त सत्यभाषणादि कर्म करना और मिथ्याभाषणादि अधर्म छोड़ देना ही मुक्ति का साधन है।”
प्रश्न-मुक्ति और बन्ध किन-किन बातों से होता है ?
उत्तर-परमेश्वर की आज्ञा पालने, अधर्म, अविद्या, कुसंग, कुसंस्कार, बुरे व्यसनों से अलग रहने और सत्यभाषण, परोपकार, विद्या, पक्षपात रहित, न्याय और धर्म की वृद्धि करने, पूर्वोक्त प्रकार से परमेश्वर की स्तुति, प्रार्थना और उपासना, अर्थात् योगाभ्यास करने, विद्या पढ़ने, पढ़ाने और धर्म से पुरुषार्थ कर धर्म की उन्नति करने, सबसे उत्तम साधनों को करने और जो कुछ करे वह सब पक्षपात न्याय धर्मानुसार ही करे, इत्यादि साधनों से मुक्ति और इनसे विपरीत ईश्वराज्ञा भंग करने आदि काम से बन्ध होता है।
प्रश्न-मुक्ति के क्या साधन हैं ?
उत्तर-कुछ साधन तो प्रथम लिख आये हैं, परन्तु विशेष उपाय ये हैं।
जो मुक्ति चाहे वह जीवन मुक्त, अर्थात् जिन मिथ्याभाषणादि पाप कर्मों का फल दुःख है, उन को छोड़, सुखरूप फल को देनेवाले सत्यभाषणादि धर्माचरण अवश्य करे। जो कोई दुःख को छोड़ना और सुख को प्राप्त होना चाहे वह अधर्म को छोड़ धर्म अवश्य करे।-
सत्यार्थप्रकाश समुल्लास ९
इस प्रकार ऋषि सिद्धान्त है, अर्थात् ज्ञान प्राप्त करके भी कर्म अवश्य करे, मोक्ष के साधन दोनों हैं एक-एक नहीं, अर्थात् सम समुच्चय है।
आगे मोक्ष प्राप्त जीव का पुनः जन्म होता है वा नहीं। इस विषय पर विचार करते हैं।
इसमें पूर्वपक्ष अनावृत्ति का है, अर्थात् मोक्ष प्राप्ति के पश्चात् जीव का जन्म कभी नहीं होता है।
तदत्यन्तविमोक्षोऽपवर्गः। -न्यायदर्शन १।१ । २१
जन्मरूप दुःख की अत्यन्त हानि ही मोक्ष है। इस पर वात्स्यायन मुनि जी लिखते हैं।
तदयमजरममृत्युपदं ब्रह्म क्षेमप्राप्तिरिति ।
वह अभय, अजर और अविनाशी ब्रह्म के आनन्द की प्राप्ति ही है।
तदभावे संयोगाभावोऽप्रादुर्भावश्च मोक्षः।-वैशेषिकदर्शन ५।२।१८
पुण्य, पाप कर्म के संस्कार न रहने से शरीर आदि के साथ संयोग नहीं होता, इसी लिए जन्म नहीं होता। इसी को मोक्ष कहते हैं।
न मुक्तस्य पुनर्बन्धयोगोऽप्यनावृत्तिः श्रुतेः।-सांख्य ६।१७
मुक्त आत्मा का पुनः बन्ध (जन्म-मरण) नहीं होता, क्योंकि श्रुति में अनावृत्ति लिखी है।
अनावृत्तिः शब्दादनावृत्तिः शब्दात्। -वेदान्त ४।१।१३
मोक्ष प्राप्त कर पुन: जन्म नहीं होता, क्योंकि श्रुति में अनावृत्ति शब्द है।
इनमें तथा न्यायदर्शन में अत्यन्त विमोक्ष शब्द है। जिसका भाव दु:ख आदि की अत्यन्त निवृत्ति है। वैशेषिक ‘अप्रादुर्भाव से पुनः जन्म नहीं होता’, ऐसा कहता है सांख्यदर्शन, वेदान्तदर्शन अनावृत्ति शब्द द्वारा साक्षात् ही कहते हैं मोक्ष से पुनः आवृत्ति नहीं होती। वे शब्द ये हैं
स खल्वेवं वर्तयन्यावदायुषं ब्रह्मलोकमभिसम्पद्यते ।
न च पुनरावर्ततेन च पुनरावर्तते ॥
-छान्दोग्योपनिषत् प्रपाठक ८।१५।१
वह मुमुक्षु इस प्रकार धर्माचरण करता हुआ जितनी ब्रह्मा की आयु है उतने समय तक ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है। उसकी पुनः आवृत्ति नहीं होती।
यावदायुषः ब्रह्मा की आयु, अर्थात् कल्प का विशेषण है। मोक्ष प्राप्त जीव की उतना समय, अर्थात् कल्प के भीतर आवृत्ति नहीं होती। इसमें उस वृत्ति का सर्वथा निषेध नहीं है। इसी भाव का पोषक यह पाठ है।
एष देवपथो ब्रह्मपथ एतेन प्रतिपद्यमाना इमं मानवमावर्त नावर्तन्ते नावर्तन्ते।-छान्दोग्योपनिषत् प्रपाठक ४। १५ । ५
यह देवपथ ब्रह्मपथ है इससे ब्रह्म को प्राप्त हो कर इस मानवावर्त में पुनः
जन्म नहीं लेते। इस पाठ में हमें विशेषण मानवावर्त का है। जिसके अर्थ यही होंगे। इस मानवावर्त में, अर्थात् इस कल्प में जन्म नहीं होता।
पहले पाठ में ‘‘यावदायुषं” इसमें दोनों पाठ आवृत्ति का सर्वथा निषेध नहीं करते हैं। प्रथम जब तक और दूसरे में यह होने से यह सिद्ध है आवृत्ति होती है इसलिए सांख्य और वेदान्त दर्शन में ‘अनावृत्ति: श्रुतेः’ “अनावृत्तिः शब्दात्” पाठ है। उनका अर्थ भी यही है इस कल्प में आवृत्ति नहीं होती । एक और पाठ है जो इसे साफ-साफ कह रहा है।
ते ब्रह्मलोके ह परान्तकाले परामृतात् परिमुच्यन्ति सर्वे ।- मुण्डक ३। खण्ड २। मन्त्र ६
यह ब्रह्मलोक को प्राप्त होनेवाले परान्तकाल, अर्थात् कल्प के पश्चात् अमृतभाव से छूट जाते हैं। इसमें परान्त काल तक वास लिखा है सर्वदा नहीं।
इस विषय को सत्यार्थप्रकाश में महर्षि ने इस प्रकार लिखा है।
प्रश्न-“जो मुक्ति से भी जीव फिर आता है तो वह कितने समय तक मुक्ति में रहता है”।
उत्तर- ते ब्रह्मलोके ह परान्तकाले परामृतात् परिमुच्यन्ति सर्वे। (मु० ३। खण्ड २ । मन्त्र ६)
यह मुण्डक उपनिषत् का वचन है। वे मुक्त जीव मुक्ति में प्राप्त हो कर ब्रह्म में आनन्द को तब तक भोग कर पुनः महाकल्प के पश्चात् मुक्ति सुख को छोड़ कर संसार में आते हैं। इसकी संख्या यह है तैंतालीस लाख, बीस हजार वर्षों की एक चतुर्युगी होती है। सहस्र चतुर्युगियों का एक अहोरात्र, ऐसे तीस अहोरात्रों का एक महीना, ऐसे बारह महीनों का एक वर्ष, ऐसे शत वर्षों का परान्तकाल होता है। इसको गणित की रीति से यथावत् समझ लीजिये। इतना समय मुक्ति में सुख भोगने का है।
प्रश्न-सब संसार और ग्रन्थकारों का यही मत है कि जिस से पुनः जन्म-मरण में कभी न आवे ।
उत्तर-यह बात कभी नहीं हो सकती।
इस प्रकार महर्षि दयानन्द जी के सिद्धान्तानुसार मोक्ष के साथ ज्ञान-कर्म उभय हैं और मोक्ष साध्य होने से सान्त है और जीव मोक्ष प्राप्त कर के पुनः भी संसार में जन्म लेता है। यही सिद्धान्त शास्त्रीय है, मानवीय है तथा ग्राह्य है।(‘वेदप्रकाश’ से साभार)

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