किसानों की जरूरत और पराली संकट का समाधान

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फूलदेव पटेल
मुजफ्फरपुर, बिहार

“हम लोग बहुत मजबूर हैं, समयानुसार खेतों की जुताई-बुआई करनी पड़ती है. खेतों में सिंचाई तो स्वयं कर लेते हैं, लेकिन तैयार फसलों की कटाई के समय बहुत दिक्कत होती है. एक मजदूर को कम-से-कम चार सौ रुपये चुकाना पड़ता है. मजदूर केवल फसलों की कटाई करके चले जाते हैं और खेतों से पराली के अवशेष हटाने के लिए अलग से चार सौ रुपये देने पडते हैं. अब हम लोग आर्थिक रूप से इतने समृद्ध किसान तो हैं नहीं कि पराली हटाने के लिए मजदूर को अलग से 400 रुपए दें, इसलिए इसको खेत में ही जला देते हैं. दूसरी बात है कि ग्रामीण क्षेत्रों में अब मवेशियों की संख्या भी बहुत कम होने के कारण कोई फसलों के अवशेष खरीदने भी नहीं आता हैं. ऐसी स्थिति में खेतों में ही फसलों के अवशेष को जलाने के अलावा हमारे पास कोई विकल्प नहीं होता है.” यह कहना है बिहार का दूसरा सबसे बड़ा शहर कहा जाने वाला मुजफ्फरपुर के ग्रामीण क्षेत्रों के किसानों का.

दरअसल बिहार के कई इलाकों में इन दिनों गेहूं की फसल कटाई का काम लगभग पूरा हो चुका है. अब खेतों में उसके अवशेष पड़े हैं जिनको हटाने के बाद ही अगली फसल के लिए खेत को तैयार किया जा सकता है. लेकिन उसे हटाने के लिए भी मजदूर अतिरिक्त पैसों की डिमांड करते हैं जिसे पूरा करने में असमर्थ आर्थिक रूप से कमजोर किसान अब उस अवशेष को खेत में ही जलाने पर मजबूर हो जाते हैं. इसका असर राज्य के पर्यावरण पर नजर आने लगा है. अब दिल्ली की तरह ही बिहार में भी वायु प्रदूषण का लेवल खतरनाक स्तर तक बढ़ने लगा है. इसमें उद्योगों से निकलने वाले जहरीले धुएं भी जिम्मेदार हैं तो वहीं किसानों द्वारा फसलों के जलाए जाने वाले अवशेष भी अहम भूमिका निभा रहे हैं. हालांकि बिहार में भी पराली जलाना कानूनन अपराध है लेकिन इसके बावजूद यह रुकने का नाम नहीं ले रहा है.

इस संबंध में मुजफ्फरपुर जिला के पारू प्रखंड की स्थानीय महिला किसान शांति देवी कहती है कि “हम लोग बहुत छोटे स्तर के किसान हैं. किसी तरह से अपने खेतों में ट्रैक्टर से जुताई-बुवाई और सिंचाई कर लेते है. सोहनी (खर पतवार साफ करना) भी अपने से ही करते हैं क्योंकि इसके लिए एक मजदूर को तीन घंटे के लिए अस्सी रुपये देने पड़ते हैं. वह भी एक दिन में दस धुर यानी आधा कठ्ठा खेतों में सोहनी कर पाता है. तैयार फसल को बेचने के बाद होने वाली आमदनी खेतों में जुताई-बुआई, सिंचाई, सोहनी, खाद्य बीज, मजदूरी आदि काट कर हमें कुछ नहीं बचता है. ऐसी स्थिति में खेत का पुआल (पराली) को कहां ले जाएं? गांव में मवेशी भी बहुत कम होते जा रहे हैं. इसलिए उनके चारे के लिए इसे कोई खरीदता भी नहीं है. मजबूरीवश हम लोग खेतों में ही पुआल को जला देते हैं. वह बताती हैं कि अक्टूबर-नवंबर के समय जब धान की कटाई होती है, उसके बाद सबसे अधिक पराली जलाई जाती है.”

वहीं नाम नहीं बताने की शर्त पर सरैया प्रखंड के कुछ किसानों ने बताया कि “हमें मालूम है कि पुआल जलाने से पर्यावरण पर दुष्प्रभाव पड़ता है और यह अपराध भी है. लेकिन हम इसका क्या करें? इसका निस्तारण कहां और कैसे करना है कि हमें आर्थिक बोझ भी न पड़े, यह बताने वाला कोई नहीं है. सरकार पराली जलाने से रोकने के लिए जितना सख्त कदम उठाती है, यदि इसके निस्तारण की व्यवस्था पर भी इतनी ही सक्रियता दिखाए तो इसे जलाने की नौबत ही नहीं आएगी.” इन किसानों का कहना है कि अधिकतर आर्थिक रूप से कमजोर किसान ही अंत में पुआल जलाने का काम करते हैं.

इस संबंध में हुस्सेपुर पंचायत के पैक्स (प्राइमरी ऐग्रिकल्चर क्रेडिट सोसाइटी) अध्यक्ष विट्टु कुमार यादव कहते हैं कि “पराली जलाने वाली स्थिति के पीछे किसानों को फसल तैयार होने पर उसका उचित दाम नहीं मिलना और महंगाई एक बड़ा कारण है. दियारा इलाके के पशुपालक पहले धान या गेहूं के अवशेष मवेशियों को चारे के साथ देते थे. अब मवेशियों की संख्या भी कम होती जा रही है. उधर किसानों को फसल के अवशेष खेतों से लाने में महंगा पड़ता है. उन्हें उसका उचित दाम भी नहीं मिलता है. यही कारण है कि वह खेतों में ही अवशेष जलाने को मजबूर हैं.” वह कहते हैं कि “आज के समय में किसानों को खेती करना बहुत महंगा साबित हो रहा है. इसका मुख्य कारण मजदूरों की समस्या है. मजदूर नहीं मिलने से किसानों को फसलों की बुआई से लेकर उसकी कटाई तक यंत्रों का उपयोग अधिक किया जाता है. फसलों की दौनी (हार्वेस्टिंग) मशीनों से की जाती है.

फलस्वरूप उसके अवशेष खेतों में ही रह जाते हैं. जिसे पराली के रूप में जलाया जाने लगा है. इससे खेतों की उर्वरता पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है. साथ ही पर्यावरण भी प्रदूषित हो रहा है. इस साल धान की फसल को किसानों ने ट्रैक्टर के माध्यम से दौनी कराने के बाद फसलों के अवशेष को खेतों में ही जला दिया. सरकार के लाख प्रयास के बावजूद भी किसानों ने नहीं माना. हालांकि पराली जलाने से खेतों की मिट्टी उपजाऊ नहीं रहती है. जहां-जहां भी पराली जलाई गई वहां की मिट्टी क्षारीय हो गई है. वहां फसल ही नहीं हुई. इसीलिए इस बार गेहूं की फसल पर प्रभाव पड़ा है. ऐसे में यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाया गया तो आने वाले समय में पूरी जमीन क्षारीय हो सकती है.

मुजफ्फरपुर स्थित कृषि विभाग में प्रखंड तकनीकी प्रबंधक (बीटीएम) प्रभारी विक्की कुमार कहते हैं कि “सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में नुक्कड़ नाटक व चौपाल लगाकर किसानों को जागरूक किया जाता है कि वह अपने खेतों में फसल अवशेष यानी पराली न जलाएं. इससे खेतों की उर्वरता खत्म हो जाती है और खेत बंजर हो जाता है. वहीं इससे पर्यावरण दूषित होने के कारण तरह-तरह की बीमारियां होती हैं. यह कानूनन अपराध भी है. अगर खेतों में पराली जलाने वाले पकड़े जाएंगे तो उन्हें सरकार के सभी लाभकारी योजनाओं से वंचित कर दिया जाएगा.

विगत कई वर्षों से स्थानीय स्तर पर कृषि से जुड़े मुद्दों पर लिख रहे स्तंभकार अमृतांज इंदीवर कहते हैं कि धान या गेंहू की पराली जलाने के बजाए जैविक खाद, बायोमास ऊर्जा, मशरूम शेड बनाने में उसका उपयोग किया जाये तो काफी हद तक समस्या का समाधान किया जा सकता है. खेत में पराली जलाना भारतीय दंड संहिता 188 के तहत गैरकानूनी है। दोषी पाये जाने वाले पर 6 माह की सजा के साथ 15 हजार जुर्माने का प्रावधान वर्णित है. दूसरी बात यह भी है कि पराली जलाने से वायुमंडल में प्रदूषण के छोटे-छोटे कणों का स्तर खतरनाक स्तर तक बढ़ जाता है. परिणामतः सांस की तकलीफ, सिरदर्द, दमा कैंसर जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. इसके अलावा मिट्टी की उपज भी काफी प्रभावित होती है. पराली जलाने के वक्त तापमान अत्यधिक बढ़ने की वजह से मिट्टी के अंदर मौजूद मित्रकीट मर जाते हैं.

हाल ही में बिहार सरकार ने एडवाइजरी निकालकर किसानों को अगाह किया था कि जो किसान पराली जलाएंगे उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं दिया जाएगा. सरकार ने एक्शन मोड में आकर वैसे किसानों को सेटेलाइट से चिन्हित करके डीबीटी अनुदान पर रोक भी लगा दी थी. कृषि विभाग के विभिन्न प्रमुख संस्थानों के अधिकारियों एवं पंचायती राज को भी पराली जलाने वाले किसानों पर कड़ी नजर रखने को कहा गया था. इसके बावजूद धान की कटाई के बाद किसान खेतों में पड़े अवशेषों को गाहे-बगाहे जलाते रहते हैं.

अमृतांज कहते हैं कि यह अजीब विडंबना है कि वैश्विक स्तर पर पर्यावरण संरक्षण को लेकर सभाएं, सम्मेलन व संगोष्ठियां आयोजित होती रहती हैं. खासकर स्कूल-कॉलेजों के विद्यार्थियों को सेव वाटर, सेव एनर्जी, सेव वाइल्ड आदि के बारे में जानकारियां दी जाती हैं. परंतु देश के 80 प्रतिशत किसानों के साथ पर्यावरण के महत्वपूर्ण मुद्दे को लेकर न तो संगोष्ठी होती है न ही उन्हें पर्यावरण संरक्षण की तकनीक से जोड़ा जाता है. जिस दिन इस कमी को पूरा कर दिया जाएगा उस दिन से कृषि से जुड़ी अधिकांश समस्याएं समाप्त हो जाएंगी. वास्तव में इस प्रकार की समस्याएं कानून की सख्ती से नहीं बल्कि किसानों के बीच जाकर जागरूकता फैलाने से समाप्त होंगी. (चरखा फीचर)

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