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✍️मनोज चतुर्वेदी “शास्त्री”

भारत में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) 2019 को लागू किए जाने पर अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र (यूएन) सहित कई अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार स्तर के संगठनों ने गम्भीर चिंता जताई है।

संयुक्त राष्ट्र ने कानून को मौलिक रूप से भेदभावपूर्ण बताया है, जबकि अमेरिका ने कहा है कि वह इसकी निगरानी कर रहा है। ह्यूमन राइट वॉच और एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इसे मुसलमानों के खिलाफ भेदभाव करने वाला बताया है।
मानवाधिकार समूहों का कहना है कि नागरिकता का ये कानून इन पड़ोसी देशों के शिया मुसलमानों जैसे मुस्लिम अल्पसंख्यक समूहों को बाहर कर देता है। साथ ही म्यांमार जैसे पड़ोसी देश भी बाहर हैं, जहां मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं।

यहां उल्लेखनीय है कि अभी हाल ही में इजरायल द्वारा भूखे-प्यासे फलिस्तीनियों पर गोलियां चलाई गईं। जिसमें आधिकारिक तौर पर 6 फलीस्तीनी मारे गए। और तो और इजरायल ने UN द्वारा फलीस्तीन में भेजी जाने वाली राहत सामग्री को आगे जाने नहीं दिया। लेकिन UN, अमेरिका और तमाम तथाकथित मानवाधिकार संगठन मुहं में दही जमाये बैठे रहे।

प्रबुद्ध पाठकों को याद होगा कि यह वही अमेरिका है जिसने एक समय में इराक के तानाशाह और उस समय मुस्लिम समाज के “आदर्श” बने सद्दाम हुसैन को मिट्टी में मिला दिया था। इसी अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन को उसके घर में घुसकर मार डाला था। इजरायल को अप्रत्यक्ष रूप से हथियार सप्लाई करने वाला अमेरिका आज भारत में CAA कानून की आड़ में मुस्लिम समाज पर कथित अत्याचार पर मगरमच्छ के आंसू बहा रहा है।

जब पड़ोसी देशों में हिन्दू, बौद्ध, सिक्ख, ईसाई, यहूदी और पारसी समुदाय की बहन-बेटियों की इज़्ज़त आबरू लूटी जा रही थीं, जबरन उनके धर्म परिवर्तन किये जा रहे थे, उनके परिवारों की नृशंस हत्याएं हो रही थीं। तब UN, अमेरिका और तमाम स्वघोषित मानवाधिकार संगठन गांधी के तीन बंदरों की तरह न कुछ देख पा रहे थे, न सुन पा रहे थे और न ही बोल पा रहे थे।

ऐसे कई मौक़े आये हैं जबकि भारत सहित विश्व के कई देशों के मुस्लिम समुदाय ने मुस्लिम देशों के उत्पीड़न के लिए अमेरिकी उत्पादों का बहिष्कार किया है। लेकिन तब अमेरिका को भेदभाव नज़र नहीं आया।

अफगानिस्तान में तालिबानी सरकार बनने से पहले आतंकियों द्वारा अफ़ग़ान नागरिकों पर किये गए बर्बर अत्याचार औऱ कत्लेआम पर किसी को शर्म नहीं आई।

रोहिंग्या आतंकियों द्वारा बर्मा में हिंदुओं के सामूहिक नरसंहार पर UN ने कोई सुध नहीं ली। कश्मीर, पश्चिम बंगाल और केरल में कट्टरपंथी ताकतों द्वारा हिन्दू, सिक्ख, बौद्ध, जैन, ईसाई, पारसी समुदायों पर धर्म परिवर्तन का दबाव बनाने के लिए बर्बर अत्याचारों से इतिहास रक्तरंजित है।

बेहतर होगा कि यदि UN, अमेरिका और तमाम स्वघोषित मानवाधिकार संगठन विश्व के 57 मुस्लिम देशों से यह आग्रह करें कि वह “भारत में कथिततौर पर उत्पीड़ित, उपेक्षित और भेदभावपूर्ण व्यवहार का शिकार हो रहे अल्पसंख्यक समुदाय को अपने यहां शरण दें।”

UN, अमेरिका सहित सम्पूर्ण विश्व को यह समझना होगा कि भारत कोई धर्मशाला नहीं है।

✍️समाचार सम्पादक, हिंदी समाचार-पत्र,
उगता भारत

👉यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं, इनसे आपका सहमत होना, न होना आवश्यक नहीं है।

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