महर्षि दयानंद जी का स्वलिखित जीवन चरित्र, भाग 12 • मथुरा के अमरलाल जोशी को कभी न भूलूंगा-

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मथुरा में एक भद्रपुरुष अमरलाल नाम का था। उसने भी जब मैं विद्याध्ययन करता था, उस समय जो मेरे पर उपकार किये हैं उनको मैं कभी न भूलूंगा। पुस्तकों की सामग्री, खाने-पीने का प्रबन्ध उसने बहुत ही उत्तम मेरा कर दिया। उसे जब कहीं बाहर रोटी खाने को जाना होता तो प्रथम मुझको घर में बना कर खिलाता फिर आप बाहर जाता। इसी प्रकार वह पुरुष बहुत ही उदारचित्त था। संवत् १९१९ तक मथुरा में रहा अर्थात् सन् १८६२ के अन्त तक ।
संवत् १९२० – १९२१ वि० आगरा में विद्याध्ययन के समाप्त होने पर मैं आगरे में दो वर्ष रहा परन्तु समय-समय पर पत्र द्वारा अथवा स्वयं मिलकर मैं स्वामी जी के पास से शंकाओं का समाधान कर लिया करता था। वहां से मैं ग्वालियर गया और वहां थोड़ा-सा वैष्णवमत का खंडन करना प्रारम्भ किया। वहां से भी मथुरा में स्वामी जी को पत्र भेजता रहा था। २४ यहां ग्वालियर में एक माधवानुमताचार्य्य?” नामक पंडित था वह कारकून (लेखक) का रूप बनाकर वाद आदि के सुनने के लिए बैठता। किसी समय मेरे मुख से जब कोई अशुद्धि निकलती तो झट पकड़ लेता। मैंने बहुत बार पूछा कि आप कौन हो परन्तु वह कहता कि ‘मैं तो साधारण कारकून (लेखक) हूं। सुन-सुनकर परिचित हो गया हूं’ वह ऐसा कहता। एक दिन ‘वैष्णव खड़ी रेखा लगाते है’ इस पर बातचीत चली तब मैंने कहा कि यदि खड़ी रेखा लगाने से स्वर्ग मिलता है तो सारा मुख काला कर लेने से स्वर्ग के आगे भी कुछ मिलता होगा, ऐसा कहते ही उसे बहुत क्रोध आया और वह उठकर चल दिया। तब मुझे खोज करने पर विदित हुआ कि यह अनुमताचार्य है। ग्वालियर से मैं करौली गया। वहां एक कबीरपन्थी मिला। उसने ‘एक बीर उसका यह कबीर’ ऐसा अनुवाद किया था १५ और कबीर उपनिषद् हैं। ऐसा वह मुझसे कहने लगा। वहां से आगे जयपुर को गया वहां एक हरिश्चन्द्र विद्वान पंडित था। वहां मैने प्रथम वैष्णवमत का खंडन करके शैवमत की स्थापना की। जयपुर के राजा महाराजा रामसिंह ने भी शैवमत को ग्रहण किया। इससे शैवमत का विस्तार हुआ और सहस्रों रुद्राक्ष मालाएं मैंने अपने हाथ से दीं। वहां शैवमत इतना पक्का हुआ कि हाथी, घोड़े आदि सबके में भी रुद्राक्ष की मालाएं पड़ गई।
जयपुर से पुष्कर व अजमेर-जयपुर से मैं पुष्कर गया और वहां से अजमेर गया। अजमेर जाने पर शैवमत का भी खंडन करना आरम्भ कर दिया। वहां जयपुर के महाराजा लाट साहब से मिलने के लिये आगरे जाने वाले थे। वृन्दावन में रंगाचार्य करके एक पंडित था। कहीं उससे शास्त्रार्थ न हो जाये इसलिये राजा रामसिंह जी ने मुझे बुलावा भेजा था। ये जयपुर गया परन्तु मैंने शैवमत का भी खंडन करना प्रारम्भ कर दिया है यह समझते ही राजा जी को अप्रसन्नता हुई और में जयपुर छोड़कर निकल गया। फिर स्वामी जी के पास जाकर शंकाओं का समाधान कर लिया। वहां से फिर मैं हरिद्वार गया (१२ अप्रैल सन् १८६७) ।

हरिद्वार के कुम्भ में पाखण्ड खण्डन का आरम्भ

मतमतान्तरों का खण्डन तथा सर्वस्वत्याग ‘पाखण्डमर्दन’ ये अक्षर लिखकर ध्वजा मैंने अपने मठ पर लगाई। वहां वाद-विवाद बहुत हुआ, फिर मेरे मन को ऐसा प्रतीत होने लगा कि सारे संसार के विरुद्ध होकर और गृहस्थियों की अपेक्षा भी बहुत-सी पुस्तकों आदि का खटराग रखकर क्या करना है, इस हेतु से मैंने सब छोड़ दिया और कौपीन लगाकर मौन धारण कर लिया।
तब से शरीर में जो राख लगानी प्रारम्भ की थी वह गतवर्ष बम्बई आने तक लगाता ही रहा था। रेल पर बैठने के समय से लेकर वस्त्र पहनने लगा । हरिद्वार में जो मैंने मौन धारण किया वह बहुत दिन नहीं रहा क्योंकि बहुत लोग मुझे पहचानते थे और एक दिन मेरी पर्णकुटी के द्वार पर किसी ने लिख दिया ‘ निगमकल्पतरोर्गलितं फलम्’ अर्थात् भागवत की अपेक्षा वेद कुछ भी अधिक नहीं हैं, प्रत्युत भागवत के पीछे हैं। ” तब मुझसे वह सहन नहीं हुआ और मौनवत छोड़कर में भागवत का खंडन करने लगा।

युक्त प्रान्त में शाखार्थों की धूम : काशी का प्रसिद्ध शास्त्रार्थ –

(संवत् १९२५ वि०) फिर ऐसा विचार किया कि ईश्वर कृपा से अपने को थोड़ा बहुत ज्ञान मिला है यह सब लोगों को कहना चाहिये। ऐसा निश्चय करके मैं फर्रुखाबाद आया। वहां से मैं रामगढ़ गया। रामगढ़ में वाद-विवाद आरम्भ किया। वहां जब दो चार शास्त्री एक साथ बोलने लगते तब मैं ‘कोलाहल’ ऐसा कहता था। इसलिये आज तक वहां के लोग मुझे ‘कोलाहल स्वामी कहते हैं। वहां चक्रांकित के दस आदमी मुझे मारने को आये परन्तु उनसे बड़े संकट से बचा। फर्रूखाबाद से मैं कानपुर आया और कानपुर से प्रयाग गया। प्रयाग में मुझे मारने वाले मारने के लिये आये परन्तु एक माधवप्रसाद” करके भद्रपुरुष था, उसने मुझे बचाया। यह माधवप्रसाद गृहस्थी मनुष्य ईसाई धर्म स्वीकार करने वाला था और उसने सारे पंडितों को नोटिस दिये थे कि अपने आर्य धर्म के विषय में मेरा समाधान तीन महीने के भीतर करा दें अन्यथा समाधान न होने की अवस्था में मैं ईसाई धर्म स्वीकार कर लूंगा। मैंने आर्यधर्म के विषय में उसका समाधान कर दिया और वह ईसाई होने से बच गया।

संवत् १९२६ वि० – प्रयाग से रामनगर गया। काशी में रामनगर के राजा के कहने पर काशी के पंडितों से शास्त्रार्थ करने के लिए गया और उस वाद में ‘प्रतिमा’ ऐसा शब्द वेदों में है या नहीं ऐसा विषय चला ।” वह शास्त्रार्थ और स्थान पर छप कर प्रसिद्ध हुआ है वह सब पढ़कर देखें। इतिहास से ब्राह्मण-ग्रन्थ ही ग्रहण करने चाहियें ऐसा भी वाद वहां चला था।

काशी में चार बार आह्वान, वेदों में मूर्तिपूजन मिला हो तो लावें कोई उत्तर नहीं मिला (संवत् १९२९ वि०)

गत वर्ष के भाद्रपद में मैं काशी में था और आज तक चार बार” मैं काशी में गया और जिस-जिस समय जाता हूँ तब-तब ‘किसी को वेदों में मूर्तिपूजन मिला हो तो लावे, ऐसा नोटिस देता हूँ परन्तु आज तक कोई वचन नहीं निकाल सके। इस प्रकार उत्तर भारत के सारे भागों में मैने भ्रमण किया है। आज दो वर्ष से कलकत्ता, लखनऊ, इलाहाबाद, कानपुर, जबलपुर आदि स्थानों में धर्मोपदेश मैंने बहुत से लोगों को किया और फर्रुखाबाद, काशी आदि स्थानों में आर्यविद्या सिखलाने के लिये तीन या चार पाठशालाएं स्थापित की। उनके पढ़ाने वालों की धूर्तता के कारण जितना लाभ होना चाहिये वैसा नहीं हुआ। पिछले वर्ष मैं बम्बई आया” और बम्बई में गुसांई जी महाराज” के पक्ष का खंडन बहुत प्रकार से किया और बम्बई में आर्यसमाज की स्थापना की।
(संवत् १९३१ वि०)- बम्बई से अहमदाबाद, राजकोट में कुछ दिन जाकर धर्मोपदेश किया और इन दिनों तुम्हारे इस नगर पूना में लगभग दो मास हुए कि आया हूं। इस समय अर्थात् ४ अगस्त सन् १८७५ को मेरी आयु ४९ या ५० वर्ष की होगी ।” इस प्रकार मेरा पूर्व का चरित्र है। आर्य धर्म की उन्नति हो सके इसके लिये मेरे सदृश बहुत से धर्मोपदेशक अपने इस देश में उत्पन्न होने चाहिये। अकेले के हाथ से यह काम ठीक नहीं होता है तथा अपनी बुद्धि और सामर्थ्य के अनुकूल मैंने जो दीक्षा ली है, उसे चलाऊंगा, ऐसा संकल्प किया हुआ है। आर्यसमाज की सर्वत्र स्थापना होकर मूर्तिपूजादिक दुष्टाचार सब स्थानों पर न हों, वेद और शास्त्र का सच्चा अर्थ प्रकट हो और उसके अनुकूल आचरण होकर देश की उन्नति हो, ऐसी ही ईश्वर से प्रार्थना है तुम्हारी सबकी सहायता से अन्तःकरणपूर्वक मेरी यह प्रार्थना सिद्ध होगी, ऐसी पूर्ण आशा है।

( पंडित लेखराम कृत ‘महर्षि दयानंद सरस्वती का जीवन चरित्र’ से साभार)

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