महर्षि दयानन्द जी का स्वकथित जीवनचरित्र , भाग 1

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(सन् १८२४ ई० से १८७५; तदनुसार सं० १८८१ से १९३१ वि० तक)

बचपन : वैराग्य: गृहत्याग व संन्यास

मेरा वास्तविक उद्देश्य:देश-सुधार व धर्म-प्रचार-

हमसे बहुत लोग पूछते हैं कि हम कैसे जानें कि आप ब्राह्मण हैं। आप अपने इष्टमित्र भाई बन्धुओं के पत्र मंगा दें अथवा किसी की पहचान बता दें ऐसा कहते हैं, इसलिए मैं अपना वृत्तान्त कहता हूं। गुजरात देश में दूसरे देशों की अपेक्षा मोह विशेष है। यदि मैं इष्ट मित्र तथा सम्बन्धियों की पहचान दूं या पत्र व्यवहार करूं तो इससे मुझे बड़ी उपाधि होगी। जिन उपाधियों से मैं छूट गया हूं, वही उपाधियां (कष्ट) मेरे पीछे लग जायेगी। यही कारण है कि मैं पत्रादि मंगाने की चेष्टा नहीं करता ।
पहले दिन से ही जो मैंने लोगों को अपने पिता का नाम और अपने कुल का निवासस्थान आदि नहीं बताया , इसका कारण यही है कि मेरा कर्त्तव्य मुझको इस बात की आज्ञा नहीं देता, क्योंकि यदि मेरा कोई सम्बन्धी मेरे इस वृत्तान्त से परिचित हो जाता तो वह अवश्य मुझे खोजने का प्रयत्न करता और इस प्रकार उनसे दो-चार होने पर मेरा उनके साथ घर पर जाना आवश्यक हो जाता अर्थात् एक बार फिर मुझको रुपया, धन हाथ में लेना पड़ता अर्थात् मैं गृहस्थ हो जाता । उनकी सेवाटहल भी मुझे योग्य होती और इस प्रकार उनके मोह में पड़कर सबके सुधार का वह उत्तम कार्य, जिसके लिये मैंने अपने जीवन का अर्पण किया है और जो मेरा वास्तविक मिशन (उद्देश्य) है, जिसके बदले मैंने अपना जीवन बलिदान करने की कुछ चिन्ता नहीं की और अपनी आयु को भी तुच्छ जाना और जिसके लिये मैंने अपना सब कुछ बलिदान कर देना अपना मन्तव्य समझा है अर्थात् देश का सुधार और धर्म का प्रचार, वह देश यथापूर्व अन्धकार में पड़ा रह जाता ।
मेरा जन्म मोरवी (गुजरात) के एक समृद्ध औदीच्य ब्राह्मण के घर सं० १८८१ में – संवत् १८८१ विक्रमी, धांग्ध्रा करके गुजरात देश में एक राज्यस्थान है। उसकी सीमा पर मच्छू-कांटा नदी के तट पर एक मोरवी नगर है। वहां संवत् १८८१ वि० तदनुसार सन् १८२४ में मेरा जन्म हुआ । मैं औदीच्य ब्राह्मण हूं यद्यपि औदीच्य ब्राह्मण सामवेदी हैं।
परन्तु मैने शुक्ल यजुर्वेद पढ़ा था। पांच वर्ष की अवस्था से अक्षर- अभ्यास, कुलधर्म, रीति-नीति तथा मंत्र – श्लोकादि की शिक्षा – (संवत् १८८५ विक्रमी) मैंने पांच वर्ष की अवस्था होने से पूर्व ही देवनागरी अक्षर पढ़ने का आरम्भ कर दिया था और तब से ही मेरे माता-पितादि वृद्ध लोग मुझको कुल धर्म और उसकी रीति सिखलाने लगे और मुझको बड़े स्तोत्र, मंत्र, श्लोक तथा उनकी टीकाएं कण्ठस्थ कराया करते थे ।
आठवें वर्ष में यज्ञोपवीतधारण के पश्चात् गायत्री तथा सन्ध्योपासन विधि की शिक्षा तथा शैव संस्कार डालने का प्रयत्न (संवत् १८८८ वि०)—- आठवें वर्ष में मेरा यज्ञोपवीत हुआ और उसी समय से गायत्री, सन्ध्योपासन करने की विधि सिखलायी गई और प्रथम रुद्री’ और तत्पश्चात् यजुर्वेद की संहिता आरम्भ की गई। इनके पढ़ानेवाले पिता जी थे ।
इसी वर्ष मेरी एक बहन उत्पन्न हुई। मेरे घर के समस्त मनुष्य शैव अर्थात् शिव के भक्त थे। वे चाहते थे कि यह भी उसी मत में प्रवीण हो जाये, उन्होंने बाल्यपन से ही उसके संस्कार डाल दिये थे। मेरे पिता विशेष रूप से मुझे इस ओर लगाना चाहते थे और इस मत के प्रदोषादिक व्रत करने को चेताया करते थे और कहा करते थे कि तू पार्थिवपूजन अर्थात् मिट्टी का लिंग बना कर पूजन किया कर ।

 दसवें वर्ष में शिव की पार्थिव पूजा विधिवत् शिवरात्रि व्रत रखने के लिए पिता का आग्रह (संवत् १८९० वि०)

दसवें वर्ष से मैं साधारणतया पार्थिवपूजन किया करता था। मेरे पिता चाहते थे कि मैं नियमानुकूल उपवास करके शिवरात्रि का व्रत धारण, कथाश्रवण और जागरण किया करू अर्थात् पक्का शैव बन जाऊं, परन्तु मेरी माता जी विरोध किया करती थीं कि यह उपवास के योग्य नहीं। यह बात उन दिनों सदैव कलह रहने का मूल कारण हो गई। पिता जी कुछ-कुछ व्याकरण आदि का विषय और वेद का पाठमात्र भी मुझे पढ़ाया करते थे। मन्दिर और मेल-मिलाप में, जहां तहां मुझ को ले जाया करते और कहा करते थे कि शिव की उपासना सबसे श्रेष्ठ है। इसी खींचतान में मेरी अवस्था १४ वर्ष की हो गई ।
क्रमश:

(यह लेख मेरी पुस्तक “एक क्रांतिकारी संगठन आर्य समाज” के परिशिष्ट भाग से लिया गया है)

डॉ राकेश कुमार आर्य

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