कलाम का नाम उछलने पर उलझी कांग्रेस

राष्ट्रपति चुनाव से पहले यूपीए के सहयोगी दलों में शुरू हुई गैरकांग्रेसी प्रत्याशी तलाशने की मुहिम ने रायसीना हिल्स की चढ़ाई का मुकाबला बेहद कठिन कर दिया है। जिस तरह से यूपीए के घटक और विपक्ष राष्ट्रपति चुनाव पर सक्रिय हो गए हैं, उससे किसी एक नाम पर राजनीतिक सर्वसम्मति के आसार क्षीण होते जा रहे हैं। यूपीए सहयोगियों, समर्थक दलों की तरफ से ही पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का नाम उछाले जाने और खुद कांग्रेस के कई मंत्रियों के दिल में महामहिम बनने की उत्कंठा ने दौड़ बेहद दिलचस्प बना दी है। 24 जुलाई को मौजूदा राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल का कार्यकाल खत्म हो रहा है। ऐसे में उम्मीद है कि मई मध्य तक यानी इसी संसदीय सत्र के दौरान राष्ट्रपति का नाम तय कर लिया जाएगा। संकेत हैं कि अगले हफ्ते सोनिया इस मामले में कोर कमेटी की बैठक भी बुला सकती हैं। पिछली दफा जिस तरह से कांग्रेस बिल्कुल छुपा हुआ नाम लाई थी, उस अनुभव से सबक लेते हुए सहयोगी दलों ने पहले से ही गैरकांग्रेसी राष्ट्रपति की जोरदार मुहिम छेड़ दी है। खास बात है कि यूपीए की प्रमुख सदस्य ममता बनर्जी और उसे बाहर से समर्थन दे रही सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव और अन्नाद्रमुक सुप्रीमो व तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता की तिकड़ी नाम भी ऐसा लाए हैं, जिस पर समर्थन लगातार बढ़ता ही जा रहा है। पूर्व राष्ट्रपति कलाम के नाम पर यूपीए के एक और सहयोगी व एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने भी परोक्ष रूप से मुहर लगा दी है। साथ ही यह सफाई भी पेश की है कि उन्होंने रविवार को राष्ट्रपति के लिए सर्वसम्मत प्रत्याशी की बात कही थी न की गैरराजनीतिक व्यक्ति की। जदयू के शीर्ष नेता और बिहार के मुख्यमंत्री भी कलाम के पक्ष में हैं। भाजपा को भी उनके नाम पर ऐतराज नहीं है। यह कहें कि राष्ट्रपति चुनाव की चाभी ममता-जया-मुलायम-नीतीश और पवार के हाथ में होगी तो गलत न होगा। दिक्कत यह है कि कांग्रेस किसी भी कीमत पर कलाम के नाम पर राजी नहीं हो सकती। पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रणब, एंटनी, कर्ण सिंह, शिवराज पाटिल समेत तमाम लोग राष्ट्रपति पद के दावेदार हैं। ऐसे में सहयोगी और समर्थक दलों ने कलाम का नाम पेश करने से कांग्रेस को बीच का रास्ता अपनाने को मजबूर होना पड़ सकता है। पार्टी के पास एक विकल्प है कि वह उपराष्ट्रपति पद विपक्ष को देकर राष्ट्रपति पद पर राजग का समर्थन हासिल कर ले। मगर राज्यसभा में शक्ति का समीकरण कांग्रेस को वहां का सभापति विपक्ष के हाथ में देना मुश्किल होगा। फिर उपराष्ट्रपति का चुनाव राष्ट्रपति चुनाव के एक माह बाद होगा। अविश्वास का संकट ऐसा है कि भाजपा इन समीकरणों के मद्देनजर कांग्रेस के साथ किसी भी तरह का हाथ मिलने की संभावना नहीं देख रही। कांग्रेस भी जानती है कि बगैर सहयोगी और समर्थक दलों के वह राष्ट्रपति नहीं बनवा सकती। मीडिया के लिए गठित मंत्रिसमूह ने साफ कहा, किसी के पास भी बहुमत नहीं है। गुलाम नबी आजाद, पीके बंसल और कपिल सिब्बल ने माना कि समर्थन के बिना कुछ नहीं हो सकता है, मगर फिलहाल कांग्रेस इस पर कुछ भी नहीं बोलना चाहेगी। कांग्रेस प्रवक्ता रेणुका ने कहा, कांग्रेस कोर कमेटी में राष्ट्रपति का नाम तय होगा।

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