मीडिया की गिरती साख: चिंता का विषय

पिछले कुछ वर्षों में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने देश का ध्यान अपनी ओर तेजी से खींचा है। समाचार पत्रों व पत्रिकाओं की संख्या में भी बेतहाशा वृद्घि हुई है। इलेक्ट्रानिक मीडिया के प्रति लोगों का झुकाव बढ़ा है। परंतु हमने कई बार ऐसा देखा है कि जब एक घटना को इतनी बार टी. वी. पर दिखाया जाता है कि उससे लोगों का मन ऊब जाता है, तो सोचता हूं कि अब इसमें केवल पैसा आकर खड़ा हो गया है। एक बच्चा बोरिंग पाइप में गिरता है, मीडिया सारे देश को रोककर खड़ी हो जाती है। एक किताब पूर्व राष्टï्रपति द्वारा लिखित, आती है तो सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बनने से उन्होंने नहीं रोकीं इस पर पूरे देश को रोकने का प्रयास किया जाता है, बिना यह बताये कि यदि पूर्व राष्टï्रपति ने सोनिया को प्रधानमंत्री बनने से नहीं रोका था, तो किसने रोका था? प्रश्न अनुत्तरित छोड़ दिया जाता है। यह क्या तुक है? बच्चे के बारे में थोड़ा सोचें। बच्चा गिरा, आपको पता लगा-आप उस बच्चे को निकालने के लिए प्रशासन को सूचित करें और यदि प्रशासन लापरवाही करता है तो फिर उनके खिलाफ कार्यवाही करायें- साथ ही बोरिंग पाइप में बच्चों के गिरने की घटनाएं कैसे रोकें? इस पर सकारात्मक चर्चा परिचर्चा का आयोजन करें, यह मीडिया का धर्म है।
समाचारों को सकारात्मक ढंग से देखना और उसी ढंग से पाठकों में परोसना ही स्वस्थ पत्रकारिता है। इसीलिए हमारे देश में पत्रकारिता ने विकास किया था। समाज और राष्टï्र की उन्नति में सहभागी होने के कारण ही प्रेस को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। इसलिए सामाजिक मूल्यों और राष्टï्रीय संस्कारों में वृद्घि करना प्रैस का प्रमुख धर्म है। लेकिन हमने देखा है कि यहां हत्या, लूट, डकैती बलात्कार की घटनाओं से समाचार बनाये जाते हैं। अपराध को प्रमुखता दी जाती है उसे उछाला जाता है-यह नकारात्मक चिंतन है। सकारात्मक चिंतन होगा अपराधों का भांडा फुड़वाने में सहायक लोगों को प्राथमिकता देना, उनके प्रयासों को प्रशंसित करना। फिल्मों की अश्लीलता को पाठकों के सामने रखने से बचना। छोटी छोटी चीजों का समाज के स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालती है। मसलन एक सास को बहू पीटती है। यह घटना किसी एक गांव की कस्बे की या शहर की है, ऐसी ही एक घटना दूसरे गांव, कस्बे या शहर की है, एक ही समाचार पत्र में दोनों छपती हैं। लाखों लोगों के आबादी क्षेत्रों में से दो घटनाएं निकलीं। लेकिन दोनों ने प्रभाव डाला कि जैसे समाज में बहुएं आतंक का पर्याय बन चुकी हैं। जबकि समाज में हजारों बहुओं ने सास की सेवा की वह समाचार नहीं बना, क्या कभी हमने उन बहुओं की तस्वीरें पत्र पत्रिकाओं में छापी जो रोज अपनी सांस की चरण वंदना करती हैं और वृद्घावस्था में उसकी दासी की तरह सेवा करती हैं। कितनी सासें हमने ऐसी ढूंढ़ी हैं जो अपनी बहुओं के लिए हमेशा दुआ करती हैं। मीडिया यहां फेल है। वह श्रवण बने बेटों को प्राथमिकता नहीं देती, वह कंस बने बेटों को प्राथमिकता देती है। इसलिए अखबारों में रोज बाप के हत्यारे बेटे की तस्वीरें छपती हैं लेकिन आज भी बड़ी संख्या में मौजूद श्रवण कुमारों को वह कहीं स्थान नहीं देती। इससे समाज में छोटे बच्चों पर तो विशेष रूप से नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। वो सोचते हैं कि अखबार का मतलब है-लूट डकैती, हत्या और बलात्कार की घटनाओं का पुलिंदा। वे सोचते हैं कि समाज भी शायद इन्हीं विसंगतियों से बनता है। समाज के पास सिवाय गंदगी के और क्या हैं? इसलिए समाज के प्रति हमारा दृष्टिïकोण बदल गया है। हम समाज को अपनी प्रगति में बाधा मानने लगे हैं। जबकि हम यह मानते हैं कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, और समाज के बिना उसका गुजारा नहीं हो सकता। पर फिर भी हम समाज से भाग रहे हैं और फ्लैट कल्चर में जाकर अकेले घुट घुटकर मरने के लिए अभिशप्त हो गये हैं। पर मजेदार बात यह है कि हम अभिशाप को अपने लिए वरदान मानने को तैयार नही हैं। क्योंकि इसे हम सभ्यता मानते हैं। यदि समाचार पत्र और पत्रिकायें मनुष्य को एक सामाजिक प्राणी होने का शोर मचायें, तो वह अकेलेपन की जिंदगी को सभ्यता कहने से बच सकता है। क्योंकि अकेलेपन की जिंदगी ना तो मनुष्य को प्राकृतिक अवस्था में ले जाती है और ना ही उसे जंगली बनाती है। यह उसे स्वनिर्मित नरक के स्वर्ग में डालती है। वह संसार को अपने लिए तथा स्वयं को संसार के लिए अनुपयोगी मानता है। इसी भावना के चलते परिवार जैसी संस्था के प्रति लोगों का मोह भंग होता जा रहा है। विवाह को केवल मौज मस्ती के लिए किये जाने की खतरनाक प्रवृत्ति युवाओं में बढ़ रही है। ऐसी परिस्थितियों में मीडिया के लिए बड़ा अहम हो जाता है कि वह अपने धर्म को पहचाने। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया तभी बन सकता है जब वह लोक के तंत्र को संतुलित और सकारात्मक बनाने में अपनी भूमिका का निर्वाह करे। जिस समाज में हम रहते हैं, यदि वह नहीं होता तो हम पशु होते। पश्चिम के वैज्ञानिकों ने मनुष्य के बच्चे को मनुष्य से अलग पशुओं के बीच रखकर देखा तो मालूम हुआ कि वह पशुओं की भांति चार पैरों से चलने लगा। मनुष्य की बोली न बोलकर पशुओं की बोली बोलने लगा। क्या पता चला? यही कि समाज के हम पर बहुत सारे ऋण हैं। उनसे पाक साफ होने के लिए हमें अपनी ओर से भी समाज सेवा करनी चाहिए। इस सेवा को बढ़ावा देना तथा समाज में इसे संस्कार रूप से स्थापित करना मीडिया का धर्म है। एकाकी बनते मनुष्य को रोको और उसे बताओ कि तेरे चारों ओर जो भीड़ है, इसके साथ आनंद मना और अपने जीवन को सरस कर। नीरस मत बना। भारत की संस्कृति, धर्म और इतिहास की सारी घटनायें प्रेरक प्रसंगों और वर्णनों से भरी हैं, उन्हें आज के समाज में स्थापित करने की आवश्यकता है। अपने दो वर्ष पूर्ण करने के अवसर पर उगता भारत आज फिर यही संकल्प ले रहा है।

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