आज सभी के लिए एक ही प्रश्न है कि पिछड़ा क्यों है यूपी

धर्म, दर्शन, कला, संगीत और उद्योग-धंधों के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश शताब्दियों तक विश्व मानचित्र पर चमकता रहा। लेकिन आज उत्तर प्रदेश की गिनती देश के सबसे पिछड़े और अराजक राज्यों में होती है। जवाहरलाल नेहरू, लालबहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, चौधरी चरण सिंह, विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर के रूप में देश को सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री देने वाले उत्तर प्रदेश की यह दशा क्यों और कैसे हो गई, यह विचार का विषय है। आजादी सेपहले तक उत्तर प्रदेश की दशा उद्योग-धंधों के मामले में इतनी खराब नहीं थी, जितनी आज है। वाराणसी, कानपुर, आगरा, अलीगढ़, सहारनपुर और मिर्जापुर अनेक छोटे-बड़े उद्योग-धंधों के केंद्र थे। प्रदेश के कई अन्य जिलों में भी हस्तकला और करघे रोजगार के अच्छे साधन थे। खेती-बाड़ी के मामले में भी उत्तर प्रदेश कोई पिछड़ा राज्य नहीं था। आज भी दुनिया का सबसे अधिक उपजाऊ गंगा-यमुना का मैदान उत्तर प्रदेश के ही पास है। पर खेती-बाड़ी में आज यह देश में ग्यारहवें नंबर पर है। कानून-व्यवस्था, स्वास्थ्य और पर्यावरण के मामले में उप्र का देश में उन्नीसवां स्थान है। राज्य में निवेश के मामले में यह देश के इक्कीस राज्यों की सूची में बीसवें नंबर पर है।


गोविंद वल्लभ पंत, संपूर्णानंद और चंद्रभानु गुप्त के मुख्यमंत्रित्व-काल में उत्तर प्रदेश में कई उद्योग-धंधे लगे। चीनी मिलों का विस्तार हुआ। पर पिछले लगभग चालीस साल में एक-एक करके तमाम उद्योग-धंधे बंद हो गए। दर्जनों चीनी मिलें भी बंद हो चुकी हैं। दरअसल, प्रदेश की खराब कानून-व्यवस्था, क्षेत्रीय दलों की लूट-खसोट, बिजली की कमी, नौकरशाही के भ्रष्टाचार और राजनीतिकों की चंदा वसूली के कारण कोई भी उद्यमी यहां उद्योग-धंधा नहीं लगाना चाहता। पूरे प्रदेश में भयंकर बेरोजगारी है और यहां के युवक रोजी-रोजगार के लिए अमदाबाद, मुंबई, पंजाब, दिल्ली और कोलकाता में भटकते रहते हैं। यहां उद्योग-धंधों के विकास के लिए उपयुक्त माहौल और इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने की ओर ध्यान नहीं दिया गया। प्रदेश के सभी सरकारी विभागों के ठेकों पर माफिया और अराजक तत्त्वों ने कब्जा कर लिया है और शासन-सत्ता के लोग भी उनसे सांठगांठ करके अपने स्वार्थों की पूर्ति करते रहे हैं।


नतीजा यह है कि तमाम निर्माण-कार्य फाइलों पर हो गए, जो हुए भी वे घटिया दर्जे के हैं और उनमें जमकर घोटाला और कमीशनबाजी हुई है। राशन माफिया, ड्रग माफिया, शिक्षा माफिया, ट्रांसपोर्ट माफिया, बालू और मौरंग माफिया सहित कोई ऐसा क्षेत्र नहीं बचा है जहां शासन-सत्ता की मिलीभगत से माफिया और अराजक तत्त्वों ने सरकारी धन को लूटा न हो। इसलिए जब हम उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक सेवाओं की दशा पर विचार करते हैं तो बड़ी भयानक तस्वीर साामने आती है।

उत्तर प्रदेश अपने पड़ोसी राज्यों के मुकाबले में भी पिछड़ा है। उसकी वृद्धि दर सभी क्षेत्रों में कम रही है। कृषि, उद्योग, बिजली, शिक्षा, चिकित्सा के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश की बदहाली किसी से छिपी नहीं है। राजस्थान, मध्यप्रदेश और यहां तक कि बिहार ने भी उत्तर प्रदेश से बेहतर प्रदर्शन किया है। अलबत्ता 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा की अप्रत्याशित जीत के बाद राज्य में तत्कालीन सपा सरकार की इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में भारी तेजी आई। राजग ने प्रदेश की अस्सी लोकसभा सीटों में से तिहत्तर पर जीत हासिल की। समाजवादी पार्टी सिर्फ पांच सीटों पर सिमट कर रह गई। अपनी इस दशा को देख कर सपा ने विकास परियोजनाओं पर ध्यान दिया। 2017 के विधानसभा चुनाव जब नजदीक आए तो कई बड़ी और महत्त्वाकांक्षी परियोजनाओं का पूरी होने से पहले ही उद्घाटन कर दिया गया। इनमें मेट्रो रेलमार्ग और आगरा एक्सप्रेस वे भी शामिल है। अन्य कई योजनाएं भी हैं जो अभी तक अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकी हैं।


कानून-व्यवस्था के अलावा बिजली, पानी, स्वास्थ्य व परिवहन सेवाओं के मामले में भी उत्तर प्रदेश की दशा बहुत खराब है। प्राथमिक शिक्षा, राशन की दुकानों और तहसीलों में कामकाज में मनमानी और भ्रष्टाचार एक बड़ी समस्या है। प्रदेश के विकास के लिए कानून-व्यवस्था का ठीक होना पहली शर्त है। उद्योग-धंधों के लिए बिजली की सुचारुरूप से उचित दर पर सप्लाई जरूरी है। पर बिजली की दशा बहुत खराब है। आजादी के उनहत्तर सालों में पुलिस का इकबाल घटता गया और कानून-व्यवस्था की चुनौती बढ़ती गई है। पुलिस बल में कमी और भ्रष्टाचार के कारण एक तो पुलिस मौके पर नहीं पहुंचती, और दूसरे, अपराधियों व अराजक तत्त्वों का मन इतना बढ़ गया है कि वे पुलिस की संख्या कम देख कर हमला करने से भी नहीं चूकते।


उत्तर प्रदेश के बाद 4 और राज्यों में बंद हुए अवैध बूचडख़ाने और मीट की दुकानें

बिजली के बिना चौमुखी विकास की कल्पना नहीं की जा सकती। पिछली सरकार ने 2012 में दो वर्ष में गांवों को बीस घंटे व शहरों को बाईस घंटे बिजली देने का चुनावी वादा किया था, लेकिन उसके शासनकाल के अंतिम वर्ष में भी ऐसा नहीं हो सका। चुनावी साल में सरकार ने शहरों को तेईस-चौबीस घंटे व गांवों को सोलह घंटे बिजली देने का नया वादा किया, लेकिन जर्जर वितरण नेटवर्क के चलते इस पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। बड़े पैमाने पर बिजली की चोरी के कारण प्रदेश में अन्य राज्यों की तुलना में उपभोक्ताओं को ज्यादा कीमत देनी पड़ती है। दरअसल, आबादी बढऩे के साथ ही सूबे में बिजली की मांग में तो तेजी से इजाफा हो रहा है लेकिन उपलब्धता बढ़ाने और वितरण नेटवर्क दुरुस्त रखने के गंभीरता से प्रयास नहीं किए गए। ऐसे में, उपलब्धता से कहीं ज्यादा मांग होने से प्रदेशवासियों को जब-तब बिजली कटौती से जूझना पड़ रहा है। शहरों में भी बिजली का संकट है। चूंकि चुनाव में बिजली हमेशा बड़ा मुद्दा रही है, इसलिए वादे के मुताबिक बिजली न मुहैया करा पाने का खमियाजा सपा सरकार को भुगतना पड़ा है।


समाजवादी नायक राममनोहर लोहिया के नारे ‘कपड़ा-रोटी सस्ती हो, दवा-पढ़ाई मुफ्ती हो’ को ध्येय वाक्य बना कर आई अखिलेश सरकार अपने कार्यकाल के आखिरी साल में भले ही पच्चीस फीसद ज्यादा लोगों को इलाज का उपहार देने का दावा कर रही थी, पर इस क्षेत्र में प्रदेश अब भी फिसड्डी है। बीस करोड़ से अधिक आबादी के बावजूद प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर जिला अस्पतालों व मेडिकल कॉलेजों से संबद्ध अस्पतालों तक मरीजों को भर्ती करने के लिए कुल साठ हजार बेड हैं। इस तरह औसतन साढ़े तीन सौ की आबादी पर एक मरीज के इलाज की सुविधा उपलब्ध है। सरकार ने जच्चा-बच्चा की सुरक्षा को लेकर बड़े-बड़े दावे किए, परिणाम सकारात्मक नहीं दिखे। हालात यह है कि पिछले दिनों चले एक अभियान में 51.8 फीसद महिलाओं में खून की कमी पाई गई। इनमें भी इक्कीस फीसद की स्थिति गंभीर थी। राज्य में विशिष्ट चिकित्सा तो दुर्लभ ही है, सामान्य चिकित्सा भी चुनौती बनी हुई है।


सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था- खासतौर से ब्लाकों, तहसीलों से जिला मुख्यालय तक जाने की- बहुत ही बदहाल है। निजी जीपों, टेम्पो में ठसाठस भरे यात्रियों के बीच बैठ कर अथवा लटक कर यात्रा करनी पड़ती है। शिक्षकों के वेतन पर अरबों रुपए खर्च करने के बावजूद सरकारी स्कूल अपना औचित्य खोते जा रहे हैं। शिक्षा की दशा की वार्षिक रिपोर्ट-2014 के मुताबिक 2006 में उप्र में निजी स्कूलों में छह से चौदह वर्ष के आयु वर्ग के 30.3 फीसद बच्चे नामांकित थे, वहीं 2014 में यह आंकड़ा बढ़ कर 51.7 प्रतिशत हो गया था। इसके सापेक्ष सरकारी प्राथमिक स्कूलों में इस आयु वर्ग के 41.1 फीसद बच्चे ही नामांकित पाए गए। नई सरकार के सामने पहली चुनौती कानून-व्यवस्था सुधारने की होगी। लेकिन नई सरकार के कामकाज की समीक्षा के लिए कम से कम एक वर्ष का इंतजार करना होगा।


Comment:

Latest Posts

hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
vdcasino giriş
vdcasino güncel giriş
vdcasino giriş
hititbet giriş
hitit medya
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet güncel adres
hititbet 2026
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
solobet giriş
hititbet giriş
hititbet
hititbet
Tuzla Cilt Bakım
İstanbul Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet Giriş
Hititbet Giriş
betnano
Hititbet Giriş
Hititbet App
hititbet giriş
hititbet
betnano
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betorder giriş
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
hititbet
hititbet
betgaranti giriş
betpark giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
betpark giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
Hititbet
Hititbet Güncel Giriş
Hititbet Yeni Giriş
Hititbet Resmi Gİriş
betgaranti giriş
hitbet giriş
hitbet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
xslot giriş
xslot giriş
sahabet
sahabet
hititbet
meritbet
bets10
meritbet
bets10
betnano
bets10
bets10
betnano
betnano
atlasbet
atlasbet
betnano
betpark giriş
betgaranti giriş