नेहरू, चीन और शांतिपूर्ण सह -अस्तित्व की अवधारणा

पंडित नेहरू अपने इस महान देश के प्रथम प्रधानमंत्री थे। इनके शासनकाल में राष्ट्र ने नये युग में प्रवेश किया था। परतंत्रता की लंबी अवधि राष्ट्र के शोषण, आर्थिक संसाधनों के दोहन और पतन का कारण बन गयी थी। सन 1947 ई. में जब  राष्ट्र स्वतंत्र हुआ तो वह टूटा हुआ जर्जरित और थका हुआ सा एक यात्री था। आशा की किरण कहीं थी तो वह राष्ट्र के विशाल प्राकृतिक संसाधनों के विशाल भंडार थे, राष्ट्र की उद्यमशील क्षमता और पुन: उठ खड़ा होकर अपने पुन: निर्माण में लग जाने की संकल्प शक्ति थी। नेहरूजी को इन सभी तथ्यों का निस्संदेह लाभ मिला और वे ‘युग पुरूष’ कहलाये।
राष्ट्र विकास की ओर बढऩे लगा
नेहरूजी की घरेलू परिस्थितियां भी उनके अनुकूल सिद्घ हुईं। राष्ट्र के विकास के लिए और उसे अंतर्राष्ट्रीय जगत में एक सक्षम, सबल, समर्थ और अपने हितों का प्रबल रक्षक राष्ट्र बनाना किसी भी राष्ट्र के शासकों के लिए परमावश्यक होता है। राष्ट्र के विकास का सही आंकलन करने के लिए किसी राष्ट्र की विदेश नीति की समीक्षा आवश्यक होती है। 
अत: नेहरूजी की विदेश नीति की समीक्षा आवश्यक है। विशेषत: तब जबकि हमारी विदेश नीति कई बार हमारे हितों को संरक्षित करने में असफल रही है। जिस समय राष्ट्र ने स्वतंत्रता प्राप्त की थी-हमें देखना होगा कि उस समय की परिस्थितियों का हम किस प्रकार सामना कर रहे थे? हमारे विषय में लोगों की क्या राय थी? हमारे आसपास में, पड़ोस में क्या घट रहा था? और उस घटनाचक्र में हमारा क्या योगदान था अथवा क्या योगदान हो सकता था? हम देखते हैं कि जिस समय देश स्वतंत्रता हुआ था तो उस समय संसार ने द्वितीय विश्व युद्घ की विभीषिकाओं को झेला और देखा था। उसने हिटलर जैसे तानाशाहों का क्रूर अंत होते भी देखा था और उपनिवेशवाद के जनक ब्रिटेन पर विश्व का कसता शिकंजा भी देखा था, जो उसे इस अमानवीय क्रूरता की जनक उपनिवेशवादी व्यवस्था को समाप्त करने के लिए बाध्य कर रहा था। इसलिए स्वतंत्रता को राष्ट्रों का ही नहीं, अपितु मानव मात्र का भी मौलिक अधिकार स्वीकार किया गया। इस प्रकार के अधिकारों के संरक्षण के लिए विश्व सभा यूनएनओ का गठन किया गया। जिससे अपेक्षा की गयी कि वह भविष्य में अब कोई युद्घ नहीं होने देगी और दो राष्ट्रों के मध्य सभी प्रकार के विवादों को सहज रूप में निपटा दिया करेगी। जब ब्रिटेन विश्व के विभिन्न देशों से अपने बोरिया बिस्तर (विश्व नेताओं के इस प्रकार के दबाव के कारण) समेटने लगा और विश्वयुद्घ की आग में झुलसे और विनष्ट हुए राष्ट्र पुन: शनै: शनै: चलने फिरने लगे तो संसार के कई क्षेत्रों को ऐसा लगा कि खुशियां फिर लौटेंगी और फिर प्रभात होगी। नेहरू का भारत इस प्रकार के आशावाद का अलम्बरदार बन गया।
राष्ट्रमंडल स्थापना की कूटनीति
उधर ब्रिटेन ने जब देखा कि अब उसके लिए उपनिवेशवाद को यथावत स्थापित रखना असंभव है तो हर मानव की भांति उसके नेतृत्व ने अपने वर्चस्व को विश्व पटल पर दिखाने के लिए राष्ट्रमंडल की स्थापना की। इस प्रकार उसने विश्व सभा संयुक्त राष्ट्र संघ के समानांतर एक ऐसी संस्था खड़ी करने का प्रयास किया, जिसमें उसकावर्चस्व हो-उसका कीत्र्तिगान करने वाले राष्ट्र हों।
अमेरिका व रूस जैसे राष्ट्रों ने इस संस्था के सदस्यों को ‘ब्रिटेन का पिछलग्गू’ इसी भावना के साथ घोषित किया था। वे लोग राष्ट्रमंडल को बहुत समय तक इसी भावना के साथ देखते रहे। क्योंकि इसके सदस्य देश वही थे जो कभी ब्रिटिश ताज को सिर झुकाया करते थे। नेहरूजी ने विश्व राष्ट्रों के इस हेय भाव की अनदेखी करते हुए भारत को राष्ट्रमंडल का सदस्य बना दिया। जब विश्व भारत को गुटनिरपेक्षता की बातें करते देखता तो भारत की राष्ट्रमंडल (विश्व का तीसरा गुट) की सदस्यता विश्व को अखरती थी। रूस जैसे राष्ट्र ने हमारे राजनायकों से नेहरूजी की इस विदेश नीति के विषय में आलोचना करते हुए कहा था कि ‘पराधीनता का भूत धीरे-धीरे ही उतरा करता है’ हमारा पड़ोसी चीन भी भारत की इस प्रकार की नीति से प्रसन्न नहीं था।
दूसरी ओर पाकिस्तान नाम का जो देश राष्ट्र उभरकर विश्व मानचित्र पर तब आया था-वह भारत का जन्मजात शत्रु बनकर उभरा था। अन्य पड़ोसी राष्ट्र यथा श्रीलंका, नेपाल, भूटान, सिक्किम, बर्मा स्वयं में इतने दुर्बल राष्ट्र थे कि उनकी आवाज विश्वमंच पर नगण्य थी। भारत की सदस्यता ने चीन को पहले दिन से ही भारत के प्रति सशंकित कर दिया था।
सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से समानता होते हुए भी यह राष्ट्र इसीलिए पाकिस्तान के निकट जाने लगा। उसे लगा कि भारत पश्चिमी शक्तियों के हाथों का खिलौना बनकर उभरने वाला राष्ट्र है।
द्वितीय विश्व युद्घ के अनुभव
हां! द्वितीय विश्व युद्घ की पृष्ठभूमि में विश्व के बहुत से लोगों और राष्ट्रों को भारत की शांति और अहिंसा की बातं  अवश्य लुभावनी लग रही थीं। लेकिन विश्व पटल पर सफल राजनय के लिए आवश्यक है कि जो बातें आप कर और कह रहे हो-उन्हें यदि लोगों का समर्थन मिल रहा है तो यह आवश्यक नहीं है कि उसे राजनीतिज्ञ भी अपने आचरण और व्यवहार में मान रहे हों। राष्ट्र के हित राजनय की सफल भूमिका से निश्चित अथवा निर्धारित होते हैं, इसलिए आदर्शवाद अपनी जगह है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नेताओं का व्यावहारिक आचरण अपने स्थान पर है। नेहरूजी यही भूल कर गये कि वे आदर्शवाद और व्यावहारिकता में अंतर नहीं कर पाये। भारत  अनुभव नया था। अंतर्राष्ट्रीय जगत के कुटिल राजनीतिज्ञों की कुटिलता से उसका परिचय नहीं था।
(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?’ से)
पुस्तक प्राप्ति का स्थान-अमर स्वामी प्रकाशन 1058 विवेकानंद नगर गाजियाबाद मो. 9910336715

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