राष्ट्र अपने आप में एक अदृश्य और अमूत्र्त भावना का नाम है। इस अमूत्र्त भावना को साकार करता है-हमारा राष्ट्रवाद, और राष्ट्रवादी दृष्टिकोण। जब एक ‘बिस्मिल’ यह कह उठता है :-
यदि देशहित मरना पड़े मुझको सहस्रों बार भी।
तो भी न मैं इस कष्ट को निज ध्यान में लाऊं कभी।।
हे ईश भारतवर्ष में शत बार मेरा जन्म हो,
कारण सदा ही मृत्यु का देशोपकारक कर्म हो।।
यह भाव हमारे राष्ट्रवाद को साकार करता है। क्योंकि ऐसी भावना से युक्त विचार हमें चलते-फिरते मनुष्यों की भावभंगिमा में साकार दिखने लगते हैं। आपको ध्यान होगा -कारगिल का युद्घ अथवा अभी पिछले दिनों हुआ सर्जिकल स्ट्राइक। दोनों समय आपने देखा था किसडक़ों पर घूमने वाले व्यक्तियों के चेहरे की चमक भी बढ़ गयी थी। हर व्यक्ति की बातों में देशभक्ति झलकती थी। राष्ट्रवाद का भाव झलकता था। सर्वत्र एक उमंग उल्लास और उत्साह का वातावरण था। उस उमंग, उल्लास और उत्साह के वातावरण ने एकसजीवता उत्पन्न की और उस सजीवता में हमें सर्वत्र राष्ट्रवाद दिखने लगा। उस समय हर व्यक्ति अथवा राष्ट्रवासी एक भक्त बन गया था जबकि राष्ट्र उसका भगवान बन गया था और आश्चर्य की बात यह थी कि भक्त को भगवान हर स्थान पर दर्शन दे रहा था। लग रहा था कि शायर की यह कल्पना थी साकार हो उठी थी-‘खाके वतन का मुझको हर जर्रा देवता है।’
सचमुच यह राष्ट्रवाद किसी सरकार की, किसी व्यक्ति की या किसी दल की बपौती नहीं है। इस पर हर राष्ट्रवासी का समान अधिकार है। यदि इसमें भी आरक्षण हो जाता तो निर्धन की झोंपड़ी का मिट्टी का ‘दीया’ कारगिल विजय के उत्सव में धनिक की कोठी के बल्बों के सामने लज्जाकर स्वयं बुझ जाता, पर ऐसा नही हुआ ना हो सकता है। राष्ट्रवाद के उत्सव में दीपक और बल्ब की कोई प्रतियोगिता नहीं होती, अपितु बल्व स्वयं दीपक को अपना पिता मानकर उसकी अंगुली पकडक़र राष्ट्रवाद के मेले में नाचने लगता है।
आज हमारे देश के लोग फिर एक कारगिल विजय की अभिलाषा में सरकार पर अपने-अपने ढंग से दबाव बना रहे हैं, वे नहीं चाहते कि अपमान और तिरस्कार का जीवन जिया जाए और हमारी सेना को पाकिस्तान जैसे दुष्ट देश की आतंकी सेना के हाथों अपमान का घूंट पीना पड़े। हमारी सबकी यह सामूहिक भावना ही हमारा ‘राष्ट्रवाद’ है। इसमें ‘सबका साथ और सबका विकास’ का वास्तविक भाव झलकता है। हर एक के हृदय में यह भाव समान है। हां, यदि कोई वर्तमान सरकार से दलीय आधार पर या किसी अन्य कारण से घृणा करता है या इसकी आलोचना करना ही जिसने अपना उद्देश्य बना लिया है, या जो अधिक उन्मादी बोलने को ही राष्ट्रवाद मानता है-उसकी भावनाओं में थोड़ी उत्तेजनात्मक घृणा या आलोचना का भाव देखा जा सकता है-पर मूलत: वह भी सारे देशवासियों के उसी राष्ट्रवाद से बंधा है -जो अपने आपको इस देश का मूल संस्कार मानता है। वैसे कभी-कभी सरकारें भी ऐसी उत्तेजनात्मक आलोचन की प्रतीक्षा किया करती हैं-जिससे कि ‘सही निर्णय’ लेते समय किसी को कोई आपत्ति ना हो कि निर्णय लेने में शीघ्रता कर दी है, या युद्घ किसी समस्या का समाधान नहीं है-पहले शांतिपूर्ण उपाय करने चाहिए थे इत्यादि। अब उत्तेजनात्मक आलोचना करने वाले कल को चुप रहेंगे। वैसे भारत की सेना इस समय भी नहीं लगता कि अपना कार्य सीमा पर नहीं कर रही है। वह कर रही है-और उसे देश के लोगों का समर्थन ही प्राप्त नहीं है अपितु सरकार का सहयोग भी प्राप्त है। पर हर बात कही नहीं जाती है और ना ही लिखी जाती है। रणनीति और कूटनीति का अपना महत्व है और अपना ही औचित्य है। घृणात्मक आलोचना को देखकर भी कभी-कभी रणनीति और कूटनीति के आवरण से हमारे लिए बाहर आना कठिन हो जाता है। यही कृष्णनीति है यही हमारा राष्ट्रवाद है।
हमारे लिए राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में ही राष्ट्रवादी बने रहना सदा संभव नही होता है। हम छोटी-छोटी बातों में भी अपने राष्ट्रवादी होने का प्रमाण दे सकते हैं-जैसे जब इस बिजली बचाने के लिए अपने घर में अनावश्यक बल्ब नहीं जलाते, अनावश्यक पंखे, कूलर या ए.सी. नहीं चलाते अपनी लिफ्ट में से निकलते ही पंखे को अवश्य बंद कर देते हैं। हम अपने हाथ-पैर धोते समय अधिक पानी न बहे, इसका पूरा ध्यान रखते हैं और नहाने में भी बाल्टी व लोटे का प्रयोग करते हैं। केवल इसलिए कि पानी अधिक ना बहे। हम दूसरों के विचारों और उपदेशों का सम्मान करते हैं और उन्हें अपने जीवन में उतारने का प्रयास करते हैं। इसी प्रकार हम विवाहादि के समारोहों में या रेस्टोरेंट आदि में चाय पानी लेते समय या भोजनादि करते समय अपनी प्लेट में भोजन नही छोड़ते हैं, और सदा यह प्रयास करते हैं कि मैं उतना ही भोजन लूंगा जितना मेरे लिए आवश्यक है, इसी प्रकार मैं वही पेय या खाद्य पदार्थ  अपनी प्लेट में लूंगा जो मेरे लिए अनुकूल है और जिसे मैं प्लेट में छोड़ंगा नहीं। साथ ही यह भी कि मैं किसी ‘वीआईपी’ कल्चर की घृणित भावना से ग्रसित ना होकर ‘स्वरूचि भोज’ में स्वयं अपनी प्लेट में अपने लिए भोजन परोस लूंगा इसके लिए किसी अन्य की प्रतीक्षा नहीं करूंगा।
ये सारी छोटी-छोटी बातें हैं पर हमारे राष्ट्रवादी होने का प्रमाण होती हं। हम बड़ी बातों पर तो सरकारों पर चिल्लाते रहें या किसी दल विशेष की आलोचना करते रहें और उसे राष्ट्रवादी होने का उपदेश देते रहें, परंतु स्वयं ऐसी छोटी-छोटी बातों का ध्यान न रखते हों तो हमारा राष्ट्रवाद हमारे लिए एक नाटक या पाखण्ड ही सिद्घ होता है। इससे पहले कि हमें कोई ‘केजरीवाल’ कहे हमें अपने राष्ट्रवाद की ‘नौटंकी’ की स्वयं ही समीक्षा कर लेनी चाहिए। हम सदा राष्ट्रवादी रह सकते हैं और रहते भी हैं-बस उपस्थित अवसरों को पहचानने की आवश्यकता है।

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