“शिवरात्रि मूलशंकर के लिये मोक्षदायिनी बोधरात्रि बनी थी”

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ओ३म्

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सनातन धर्म सृष्टि के आरम्भ से प्रवृत्त धर्म है। इसका आधार वेद और वैदिक शिक्षायें हैं जो ईश्वर प्रदत्त होने से पूर्णतः सत्य पर आधारित हैं। वेद संसार में सबसे पुराने ग्रन्थ हैं इस कारण इन्हें पुराण भी कहा जाता है। वास्तविक पुराण वेद ही हैं। वेद में किंचित मानवीय इतिहास नहीं है। चार वेद सब सत्य विद्याओं की पुस्तकें हैं। महाभारत युद्ध तक आर्यावत्र्त वा भारत सहित पूरे विश्व में वेदों का ही प्रचार था और सर्वत्र एक वैदिक धर्म ही प्रतिष्ठित था। महाभारत के बाद देश में अज्ञान व अन्धकार छा गया। देश में छोटे-छोटे राज्य स्थापित हो गये। देश की शक्ति विभाजित होने से कमजोर हुई। देश में वेद व उसका ज्ञान विलुप्त हो गया। वेदों के गलत अर्थ किये व समझे जाने लगे। वेदों में ईश्वर के अनेक गुणों का वर्णन आता है। कल्याणकारी व मंगलकारी होने के कारण ईश्वर को ‘शिव’ कहा जाता है। सर्वव्यापक होने से ईश्वर का नाम ‘विष्णु’ है। शिव और विष्णु नाम के सर्वव्यापक व सर्वशक्तिमान ईश्वर से पृथक सत्तावान कोई अन्य ईश्वर व देवता नहीं है। यह दोनों गुणवाचक नाम एक ही ईश्वर के हैं। अज्ञानता के काल में ईश्वर के गुणवाचक इन नामों शिव व विष्णु को पृथक ईश्वर वा देवता मान लिया गया। कुछ व्यक्तियों ने इन नामों से शिव पुराण और विष्णु पुराण नामक वृहद ग्रन्थों की रचनायें भी कर लीं। इनको प्रतिष्ठा दिलाने के लिये इनके लेखकों ने ग्रन्थकार के रूप में अपना नाम न देकर ऋषि वेद व्यास जी का नाम रख दिया। वेदव्यास जी पांच हजार वर्ष पूर्व हुए महाभारत युद्ध के समकालीन थे और शिव व विष्णु पुराणादि 18 पुराण बौद्ध व जैन काल के बाद लिखे गये। इन ग्रन्थों में अप्रामाणिक व अविश्वसनीय इतिहास व कथन हैं जो इन ग्रन्थों को विवेक दृष्टि से पढ़ने पर ज्ञात होते हैं। शिव पुराण की रचना के बाद ही इसके अनुयायी शैवों ने शिवरात्रि व्रत व पर्व का आरम्भ किया था।

शिवपुराण ग्रन्थ के अनुसार शिव-लिंगों की स्थापना कर मन्दिरों का निर्माण स्थान-स्थान पर हुआ। इन मन्दिरों की स्थापना से जो दान व चढ़ावा आता था उससे पुजारियों को लाभ होता था। इस कारण वह मूर्तिपूजा के समर्थक व प्रचारक बन गये और अतिश्योक्तिपूर्वक मूर्तिपूजा के लाभ बताने लगे। देश के अधिकांश लोग शैव मतावलम्बी बन गये और फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन को शिवरात्रि पर्व घोषित किया गया। इस शिवरात्रि के दिन व्रत व उपवास सहित मन्दिरों में उपवासपूर्वक रात्रि को जागरण करने लगे। जागरण में भजन कीर्तन व शिवपुराण का पाठ आदि होने लगा। गुजरात में 12 फरवरी, 1825 को मौरवी नगर के टंकारा ग्राम में एक उच्चकुलीन औदीच्य ब्राह्मण कर्षनजी तिवारी के यहां बालक शिशु मूलशंकर जी का जन्म हुआ। आयु के 14वें वर्ष में इस बालक ने अपने शिवभक्त पिता की प्रेरणा से भगवान शिव की प्रसन्नता के लिये व्रतोपवास किया। शिवरात्रि की रात को मन्दिर में जागरण करते हुए शिव की पिण्डी पर चूहों को उछलकूद करते देखकर इस बालक मूलशंकर के मन में ईश्वर के सर्वशक्तिमान होने व शिवलिंग के पार्थिव व शक्तिहीन होने के विरोधाभास ने मूर्तिपूजा के प्रति अनास्था उत्पन्न कर दी। सच्चे शिव की तलाश और मृत्यु पर विजय के लिये वह पितृगृह से आयु के 22 वें वर्ष में निकल पड़े। वर्तमान में इन्हीं मूलशंकर को सारा संसार वेदों के उद्धारक एवं समाज सुधारक विद्वान ऋषि दयानन्द के नाम से जानता है। फाल्गुन कृष्ण दशमी के दिन मूलशंकर का जन्म हुआ था। सन् 1839 की शिवरात्रि को इन्हें बोध प्राप्त हुआ अतः आर्यसमाज शिवरात्रि को ऋषि दयानन्द बोधोत्सव के रूप में मनाता है।

ऋषि दयानन्द ने गृहत्याग के बाद पौराणिक तीर्थ स्थानों का देशाटन कर यहां निवास करने वाले विद्वानों से धर्म, योग व इतिहास आदि विषयों की जानकारी प्राप्त की। घर से निकलने के समय वह संस्कृत और यजुर्वेद का अध्ययन वा उसे कण्ठ कर चुके थे। उन्होंने सन् 1860 से 1863 के ढाई वर्षों में मथुरा में दण्डी गुरु स्वामी विरजानन्द सरस्वती जी से संस्कृत की आर्ष व्याकरण अष्टाध्यायी-महाभाष्य-निरुक्त प्रणाली का अध्ययन किया था। प्रायः धर्म संबंधी सभी विषयों पर स्वामी दयानन्द जी ने अपने गुरु स्वामी विरजानन्द जी से शंका समाधान भी किया था। यह बता दें कि गुरु विरजानन्द के समान आर्ष संस्कृत व्याकरण का ज्ञानी गुरु पूरे देश व विश्व में कहीं नहीं था। स्वामी दयानन्द जैसा योग्य व जिज्ञासु शिष्य भी ज्ञात इतिहास में कोई और नहीं हुआ। गुरु दक्षिणा के समय स्वामी जी ने अपने गुरु जी की प्रेरणा से असत्य व अविद्या मिटाने व सत्य और विद्या का प्रचार करने का व्रत लिया और आगरा आकर प्रचार आरम्भ कर दिया था। स्वामी जी ने विलुप्त वेदों को अत्यन्त पुरुषार्थ से प्राप्त कर उनका अध्ययन किया और वेदों के यथार्थ भावों के अनुरूप अपनी मान्यतायें स्थिर कीं। वह वेद को स्वतः व परम प्रमाण मानते थे और संसार के अन्य सभी ग्रन्थों के वेदानुकुल भाग को परतः प्रमाण स्वीकार करते थे। वेद विरुद्ध विचारों व मान्यताओं को वह असत्य, भ्रामक व त्याज्य स्वीकार करते थे। उनका मत था कि वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढ़ना पढ़ाना व सुनना सुनाना सभी आर्यों वा मनुष्यों का परम धर्म है।

ईश्वरीय ज्ञान वेदों का विश्व में प्रचार करने के लिये स्वामी दयानन्द जी ने सन् 1875 के चैत्र शुक्ल पंचमी अर्थात् 10 अप्रैल को मुम्बई में आर्यसमाज की स्थापना की थी। इसके बाद देश के अनेक स्थानों पर आर्यसमाज की स्थापना का क्रम चलता रहा। स्वामी जी ने वैदिक धर्म के पुनरुद्धार व प्रचार के लिये पंचमहायज्ञ विधि सहित सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय, व्यवहारभानु, गोकरुणानिधि, आर्योद्देश्यरत्नमाला आदि अनेक ग्रन्थों की रचना की। उन्होंने यजुर्वेद सम्पूर्ण सहित ऋग्वेद के 10 मण्डलों में से 6 मण्डलों का पूर्ण और सातवें मण्डल का आंशिक संस्कृत व हिन्दी भाषाओं में पदच्छेद, अन्वय, संस्कृत व हिन्दी में पदार्थ एवं भावार्थ भी किया है। अन्य अनेक ग्रन्थ भी स्वामी जी ने लिखे हैं। इन सभी ग्रन्थों की वेदों व वैदिक धर्म के पुनरुद्धार, प्रचार व प्रसार सहित देश व समाज के उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका है। स्वामी जी ने वेद विरुद्ध मतों के आचार्यों से संवाद, वार्ता, शास्त्रार्थ आदि भी किये। उनका सबसे प्रसिद्ध शास्त्रार्थ काशी में 16 नवम्बर, सन् 1869 को मूर्तिपूजा के पोषक देश के तीस शीर्ष पण्डितों से हुआ था। सभी सनातनी पौराणिक विद्वान वेदों को ईश्वरीय ज्ञान और स्वतः प्रमाण स्वीकार करते थे। शास्त्रार्थ मूर्तिपूजा पर था परन्तु सभी पण्डितगण मिलकर भी वेदों से मूर्तिपूजा के पक्ष में कोई प्रमाण नहीं दे सके थे। यहां तक की उनमें से अनेक पण्डितों को स्मृति में दिये गये धर्म व अधर्म के लक्षण भी ज्ञात नहीं थे।

स्वामी दयानन्द जी ने जिन दिनों वर्ष 1863-1883 में धर्म प्रचार किया, उन दिनों आजकल की तरह रेल व सड़क यातायात की सुविधायें नहीं थी। इस पर भी उन्होंने अविभाजित पंजाब, संयुक्त प्रान्त उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, दिल्ली, राजस्थान, संयुक्त पूर्वी व अविभाजित बंगाल, महाराष्ट्र, गुजरात, बिहार, मध्यप्रदेश आदि प्रदेशों में प्रचार यात्रायें कीं। इन प्रदेशों के अनेक नगरों आदि में कुछ-कुछ दिन रहकर धर्म प्रचार किया। वहां के लोगों से वार्तालाप व शंका-समाधान आदि किया और आर्यसमाज भी स्थापित किये। स्वामी जी अपने प्रवचनों में सत्यधर्म वेद का मण्डन और असत्य मतों की मान्यताओं का युक्ति व तर्कपूर्वक खण्डन करते थे। उनका उद्देश्य सत्य मान्यताओं को प्रतिष्ठित करना और असत्य मान्यताओं का लोगों से त्याग कराना था। इसका कारण यह है कि केवल सत्य ही मनुष्य जाति की उन्नति का कारण है और सत्य के विपरीत बातें मनुष्य को पतन के मार्ग पर ले जाती हैं। ऋषि स्वामी दयानन्द जी महाभारत के बाद सबसे बड़े समाज सुधारक हुए। उन्होंने त्रैतवाद अर्थात् ईश्वर-जीव-प्रकृति की सत्ता का सिद्धान्त दिया। देश को आजाद कराने और स्वराज्य स्थापित करने का मूल मन्त्र भी उन्हीं की देन है। वह समूचे विश्व समुदाय को सत्य विद्याओं के ईश्वर द्वारा प्रेरित ज्ञान वा ग्रन्थ ‘वैदिक-धर्म’ का पालन करता हुआ देखना चाहते थे जिससे सब सुखी व परजन्म में मोक्ष के अधिकारी बन सकें। आर्यसमाज का उद्देश्य ईश्वर की वेदाज्ञा ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ अर्थात् ‘विश्व को सत्य व श्रेष्ठ विचारों वाला बनाने’ का कार्य आज भी अपूर्ण है। वेदानुयायी आर्यों का मुख्य दायित्व ईश्वर की इस वेदाज्ञा को पूरा करना है। इसके लिये सभी लोगों तक सत्य व असत्य का स्वरूप पहुंचाना तथा असत्य को छुड़वाना और सत्य को स्वीकार करवाना है। ऋषिभक्तों वा आर्यों को अपने इस कर्तव्य पर विशेष ध्यान देना चाहिये।

ऋषि दयानन्द ने समाज सुधार का अविस्मणीय एवं महिमाशाली कार्य किया। उन्होंने समाज से जन्मना जातिवाद व अस्पर्शयता के कलंक को दूर करने का आह्वान भी किया था। आर्यसमाज संगठन जन्मना जातिवाद के दुष्प्रभावों से मुक्त संगठन है। आर्यसमाज ने जन्मना जातिवाद की परम्परा को वेदविरुद्ध व समाज के लिए हानिकारक घोषित किया है। स्त्री व शूद्रों को वेदाध्ययन का अधिकार भी उन्हीं की देन है। स्वामी दयानन्द जी ने बाल विवाह, बेमेल विवाह आदि के स्थान पर पूर्ण युवावस्था में गुण-कर्म-स्वभाव के अनुसार विवाहों को उत्तम बताकर प्रोत्साहित किया। बाल व अल्प आयु में विधवा होने वाली स्त्रियों के विवाह का समर्थन भी आर्य विचारधारा में निहित है। ईश्वर की पूजा व उपासना के स्थान पर मूर्तिपूजा को ऋषि दयानन्द ने वेद शास्त्र विरुद्ध, अनुपयोगी व लाभरहित बताया है। ऋषि दयानन्द अवतारवाद, मृतक श्राद्ध, फलित ज्योतिष तथा भूत-प्रेत आदि के विचारों को भी अनुचित व अनावश्यक मानते थे। जिस युग में कोई सोच भी नहीं सकता था, उस समय ऋषि दयानन्द ने एक दलित भाई की सूखी रोटी खाकर सामाजिक समरसता का सन्देश दिया था और ब्राह्मणों द्वारा विरोध करने पर उन्हें कहा था कि परिश्रम से अर्जित धन से प्राप्त अन्न व उससे स्वच्छतापूर्वक बनाया गया भोजन सभी के लिये भक्ष्य होता है। ऋषि दयानन्द ने आर्यावत्र्त वा भारत का हर प्रकार से हित किया। उन्होंने धार्मिक अज्ञान व अन्धविश्वासों को दूर कर श्रेष्ठ व मजबूत समाज की नींव डाली थी और सच्चे ईश्वर की सच्ची पूजा को प्रवृत्त किया था। ईश्वर के साक्षात्कर्ता और वेदों के मर्मज्ञ विद्वान देव दयानन्द अपने वेदज्ञान, समाधि तथा सत्कर्मों से मोक्ष के अधिकारी बने थे। मोक्ष ही मनुष्य जीवन व जीवात्मा का अन्तिम लक्ष्य है जिसे प्राप्त कर 39 नील वर्षों से अधिक अवधि तक जीवात्मा आवागमन के बन्धनों से मुक्त होकर परमात्मा के सान्निध्य में रहते हुए आनन्द का भोग करता है। ऋषि दयानन्द जी को हमारा सादर नमन। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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