हमारे लिए माता-पिता हैं दो फरिश्ते

बिखरे मोती-भाग 204

गतांक से आगे….
वे स्वयं भूखे पेट और निर्वस्त्र रह लेंगे किंतु तुम्हें भूखे पेट और निर्वस्त्र नहीं रहने देंगे। वे स्वयं पैदल चलेंगे, मगर तुम्हें अपने कंधे पर बिठाकर दुनिया दिखाएंगे। वे तुम्हारे लालन-पालन में अथक मेहनत करेंगे, माथे से पसीना पोछेंगे, मगर फिर भी खुशी महसूस करेंगे। तुम्हारी शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन, वस्त्र, आवास, शादी और बहबूदी (समृद्घि) के लिए, तुम्हारी खुशी के लिए न जाने कितने कष्ट उठाएंगे?-किंतु फिर भी मुस्कुराएंगे। बेशक उन्हें एक दिन बुढ़ापा घेर लेगा, किंतु जब-जब तुम उनकी बांह थामकर चलोगे तो वे बुढ़ापे में भी अपने-आपको युवा महससू करेंगे। तुम्हारी सफलता अथवा उपलब्धियों को वे अपनी सफलता और उपलब्धि मानेंगे, तत्क्षण उनका सीना गर्व से फूल जाएगा। उनका अनुभव तुम्हें आइना दिखाएगा। जो आड़े वक्त में तुम्हारे काम आएगा, तुम्हें उत्थान की तरफ प्रेरित करेगा और पतन के गहवर से बचाएगा।
वे दो ऐसे फरिश्ते (देवता) होंगे जो तुम्हारी हर गलती को यह कहकर सहज भाव से माफ कर देंगे-‘कोई बात नहीं, अपना बच्चा है-सुधर जाएगा।’ मरते दम तक भी उनका दृष्टिकोण तुम्हारे प्रति सुधारवादी और आशावादी ही रहेगा। प्रतिशोध अथवा अवरोध की भावना से तो वे सर्वदा कोसों दूर रहेंगे। वे नाराज भी होंगे तो तुम्हारे भले के लिए ही कहेंगे। वे शिकवा-शिकायत तो तुम से कर सकते हैं किंतु मन में द्वेष (बैर) की गांठ नहीं लगाएंगे। वे मेरे दिव्य गुणों से ओत-प्रोत होंगे-इसीलिए वे देवत्व को प्राप्त होंगे। अपना पेट काटकर तुम्हें बल्लरी की तरह आगे बढ़ाएंगे। तुम्हारे अधरों की मोहिनी मुस्कान को देखकर वह अपनी दिन भर की थकान को भूल जाएंगे। तुम्हें सीने से लगाकर अपने आपको ऊर्जावान महसूस करेंगे। यहां तक कि तुम्हारी हारी-बीमारी अथवा अन्य कोई मुसीबत के समय यदि उन्हें जागना पड़ेगा तो सारी-सारी रात जाग लेंगे, लेकिन तुम्हें परेशान नहीं देख सकेंगे।
परमपिता परमात्मा के मुख से उन फरिश्तों की इतनी प्रशंसा सुनकर उन आत्माओं ने बड़े कौतूहल और जिज्ञासा के साथ पूछा हे प्रभु! ऐसे दो फरिश्ते कौन हैं वो? प्रत्युत्तर में भगवान बोले-”वे दो फरिश्ते कोई और नहीं अपितु तुम्हारे माता-पिता होंगे। बड़े होने पर इनकी सेवा-सुश्रूषा प्राणपण से करना।”
उपरोक्त आख्यायिका का उद्घरण देने का आशय यह है कि प्रस्तुत दोहे में इन्हीं दो फरिशतों (माता-पिता) की बुढ़ापे में सेवा-सुश्रूषा करने पर विशेष बल दिया गया है। भू से अभिप्राय है-धरती, और सुर से अभिप्राय है देवता अर्थात धरती के देवता। वस्तुत: माता-पिता प्रत्येक संतान के लिए धरती पर चेतन देवता स्वरूप हैं। ये परमपिता परमात्मा के दिये हुए उपहार हैं। इनकी सेवा-सुश्रूषा जीवन पर्यन्त करनी चाहिए तभी इनके ऋण से उऋण हुआ जा सकता है, अन्यथा नहीं। ध्यान रहे, इन्हें आप मान नहीं दे सकते तो इनका अपमान कभी मत करना, इन्हें हंसा नहीं सकते तो इनकी अधेड़ आंखों से मनुष्य की अमर कान्ति के मोतियों को मत गिरा देना अर्थात इनकी आंखों में अश्रु-धारा भूलकर भी न बहने देना, अन्यथा बेड़ा गर्क हो जाएगा। इनकी दुआएं लेना बददुआएं (शाप) तो भूलकर भी न लेना अन्यथा इनकी अधेड़ आंखों से निकले हुए आंसुओं को देखकर तथा इनकी कराहती आत्मा की दर्दनाक पुकार सुनकर परमपिता-परमात्मा अपना कहर बरसाता है। तत्क्षण देवता भी मदद करने से पीछे हट जाते हैं, स्वजन भी लाचार होकर खड़े तमाशा देखते हैं, क्योंकि माता-पिता परमात्मा के भेजे हुए भेजे हुए देवदूत हैं। इसलिए ऐसे मां-बाप के आंसू देखकर परमात्मा भी बेहद खफा होते हैं। क्रमश:

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