पदमावती‘ को लेकर देश में गरमा गरम बहस जारी है। हिंदू समाज के लोग इस फिल्म को लेकर काफी हैं विशेष रूप से करणी सेना इसप्रकरण में सक्रियता के साथ विरोध कर रही है जिसके अध्यक्ष लोकेन्द्र नाथ ने कहा है कि यदि हमें उकसाना जारी रखा गया तो इस फिल्म में पद्मावती की भूमिका निभा रही दीपिका पादुकोण की नाक काट लेंगे।
कुछ लोग इस फिल्म का बचाव यह कहकर कर रहे हैं कि लोकतंत्र में भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का विरोध उचित नहीं कहा जा सकता। जबकि हिंदू संगठनों का कहना है कि इस फिल्म से हिंदू समाज की भावनाएं आहत हो सकती हैं इसलिए इसे रिलीज न किया जाए।
बात फिल्म के बनने या न बनने देने की नहीं है। बात है देश की अस्मिता और सम्मान की। बात है देश के इतिहास की और देश के गौरवपूर्ण अतीत को सुरक्षित व सेरक्षित रखने की। एक बार-बार ऐसा होता है कि भारत के किसी राष्ट्रवादी चरित्र को लेकर कोई फिल्म बनायी जाती है या कोई नाटक रचा जाता है और बड़ी सावधानी से देश के उस नाटक को उसमें घटिया दिखा दिया जाता है। कुछ लोग शोर मचाते हैं और कुछ कलमें विरोध में उठती हैं पर सब कुछ सामान्य होकर रह जाता है।
‘पदमावती’ भारत की अस्मिता और देश के गौरवपूर्ण अतीत की एक झांकी है। उसका चरित्र और उसका व्यक्तित्व भारत की नारियों के लिए और आज की युवा पीढ़ी के लिए बहुत ही प्रेरणास्पद है। उसके चरित्र से और व्यक्तित्व से आज भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है। पर दुर्भाग्यवश जो कुछ वास्तव में सीखा जा सकता है, उसे दिखाना या बताना हमारी सरकारों के लिए अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि को बचाने के उद्देश्य से दूभर होकर रह गया है।
पद्मावती मेवाड़ के राणा रतनसिंह की रानी थी। जिसे पाने के लिए अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर चढ़ाई की थी। उस विदेशी आततायी ने कई माह तक चित्तौड़ के किले का घेरा डाले रखा। पर वह अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सका। तब उसने किसी भी प्रकार से सम्मान बचाकर चित्तौड़ से वापिस लौटने का मन बनाया। अपना सम्मान बचाने के उद्देश्य से अलाद्दीन ने महाराणा रतनसिंह के पास यह संदेश भिजवाया कि यदि वह रानी पद्मावती को उसे शीशे में भी दिखा दे तो भी वह संतुष्ट होकर दिल्ली लौट जाएगा। इस प्रस्ताव को राणा रतनसिंह ने स्वीकार कर लिया। रानी को निश्चित दिवस को अलाउद्दीन खिलजी को राणा ने शीशे में दिखा दिया। जिसे देखकर वासना के उस दानव अलाउद्दीन की नियत खराब हो गयी। अब वह रानी को किसी भी प्रकार छल या बल से हड़पने की योजना बनाने लगा।
अलाउद्दीन जब राणा के किले से चलने लगा तो राणा सम्मानवश उसे अपने किले के मुख्य द्वार तक छोडऩे के लिए आये। यद्यपि राणा से उनके कुछ विश्वस्त साथियों ने ऐसा न करने की सलाह दी थी, परन्तु राजा भारत की ‘सदगुण विकृति’ की परम्परा के शिकार हुए और एक अच्छे आचरण को एक दुष्ट के प्रति अपनाने की भूल कर बैठे। जब राणा रतनसिंह अलाउद्दीन को छोडऩे के लिए बाहर तक आ गये तो सही अवसर पर अलाउद्दीन ने अपने सैनिकों को संकेत कर राणा को अपनी कैद में ले लिया। इसके पश्चात अलाउद्दीन ने अपनी ओर से रानी पद्मावती को संदेश भिजवाया कि यदि वह मेरी बेगम बनने को तैयार हो तो वह राणा को छोड़ सकता है। तब रानी ने भी अपनी योजना बनाने में देर नहीं की। रानी ने अलाउद्दीन को यह कहलवा दिया कि वह उसकी बेगम बनने को तैयार है। पर इसके लिए पद्मावती ने कहा कि उसके साथ उसकी सारी बांदियां भी आएंगी और उन्हें अलाउद्दीन का कोई भी सैनिक रोके-टोकेगा नहीं। कामासक्त अलाउद्दीन ने रानी की शर्त मान ली। तब रानी ने अपनी पांच सौ बांदियों के स्थान पर अपने पांच सौ सशस्त्र वीर सैनिकों को भेजा। बांदियों की डोलियों के चार कहारों के स्थान पर कहार न लगाकर चार सैनिक रानी ने लगा दिये। डोलियों के भीतर बैठने वाली बांदी के स्थान पर भी इसी प्रकार एक सैनिक को बैठा दिया। इन पांचों सैनिकों के हथियार भीतर डोले में रख दिये गये। इस प्रकार पांच सौ डोलियों पर 2500 सैनिकों को कहारों के भेष में रानी ने किले से बाहर निकाला और अलाउद्दीन के शिविर में प्रवेश करने में रानी सफल हो गयी।
अलाउद्दीन ने इन डोलियों का अच्छा स्वागत सत्कार किया, उसकी मनचाही मुराद जो पूरी हो रही थी। रानी ने अलाउद्दीन को फिर मूर्ख बनाया और उससे कहलवा दिया कि वह अलाउद्दीन से मिलने से पूर्व एक बार अंतिम मुलाकात अपने राणा से करना चाहेगी। जिससे कि वह अपनी चूडिय़ों को उसी के सामने तोड़ सके। अलाउद्दीन ने उसे यह अनुमति भी दे दी। राणा को जैसे ही रानी के सामने किया गया पूर्व योजना के अनुसार हमारे वीर सैनिकों ने उन्हें अपनी डोली में बैठाया और उसे बड़ी तेजी से उठाकर वहां से चल दिये। जब तक इस घटना की सही जानकारी अलाउद्दीन को और उसकी सेना को हुई तब तक राणा और रानी पद्मावती को उनके सैनिक अपने किले के मुख्य द्वार तक बहुत निकट तक ले जा चुके थे। जो सैनिक पीछे रह गये थे उनसे अलाउद्दीन की सेना का संघर्ष हुआ। हमारे मुट्ठी भर सैनिकों का नेतृत्व इतिहास के दो सुप्रसिद्घ नायकों गोरा व बादल ने किया था। ये दोनों ही रणबांकुरे अपने राणा और रानी की प्राणरक्षा कराने और देश के सम्मान को बचाने में सफल रहे थे। यद्यपि इस युद्घ में गोरा का भी बलिदान हो गया था-पर बलिदानों की किसे परवाह थी? परवाह तो देश के सम्मान की थी, नारी के सम्मान की थी, देश के धर्म की थी और देश की अस्मिता की थी।
मध्यकाल के हर ‘रावण’ का हमारे बलिदानियों ने जमकर प्रतिरोध किया था। अनेकों रावणों को निबटाया भी और अनेकों सीताओं ने अपने शरीर को किसी भी दुष्ट रावण का हाथ तक न लगने दिया। उन्हें जौहर का रास्ता अपनाया। रानी पदमावती भी ऐसी ही वीरांगना थी। जिस पर इस देश को गर्व है। वे लोग मूर्ख हैं जो राष्ट्र की इस धरोहर को किसी जातीय दृष्टिकोण से देख रहे हैं और उसे केवल अपने तक सीमित करके चल रहे हैं। रानी पर हिन्दुत्व को गर्व है और हिन्दुत्व जातियों में विभाजन की संकीर्ण मानसिकता का विरोधी है।
आज जो फिल्म बनाई जा रही है उसमें रानी के इसी गौरवमयी व्यक्तित्व और कृतित्व को दिखाये जाने की आवश्यकता है, रानी की तुर्क अलाउद्दीन को ‘तुर्की ब तुर्की’ जवाब देने की योजना को और अपने पति के अटूट निष्ठा को दिखाने की आवश्यकता है, नारी के सम्मान के लिए उसके द्वारा रचाये गये जौहर को दिखाने की आवश्यकता है, उसके बौद्घिक चातुर्य और नेतृत्व को दिखाने की आवश्यकता है। संजय भंसाली! रानी के इस महान चरित्र को आप दिखायें और फिल्माएं-हम देखते हैं आपको कौन रोकता है? आप रानी के जिस स्वरूप को दिखा रहे हो-उसमें तुम्हारी दुर्भावना दिखाई देती है। हमारे मध्यकालीन रणबांकुरे हिन्दू योद्घाओं की देशभक्ति को गंगा-जमुनी संस्कृति की मूर्खतापूर्ण धारा में बहाने से इस देश का भला होने वाला नहीं है। हम चाहेंगे कि गोरा बादल की वीरता और उनका शौर्य भी फिल्म में फिल्माया जाए। जिससे पता चले कि रावण की दुष्टता को दण्डित करने के लिए हर युग में हमारे यहां वीर योद्घा पैदा होते रहे हैं। साथ ही यह भी कि इस देश में नारी का सम्मान सदा सर्वोपरि रहा है। उसी सर्वोपरि सम्मान की प्रतीक पद्मावती हैं जिस पर किसी भी प्रकार की भद्दी टिप्पणी करने से इस देश की आत्मा को चोट पहुंचती है। हिंदू संगठन के विरोध को शांत करते हुए सरकार को ही पद्मावती के सम्मान का ध्यान रखते हुए यह फिल्म रिलीज होने से रोक देनी चाहिए। बात नारी के सम्मान की है और इस देश के उस गौरवपूर्ण इतिहास की सुरक्षा की है जिसके लिए इस देश के लाखों करोड़ों लोगों ने सैकड़ों वर्ष तक अपना खून बहाया है। इस देश के हीरो अलाउद्दीन नहीं हैं, इस देश के हीरो गोरा और बादल हैं और मां-भारती की सच्ची आराधिका वीरांगना पद्मावती इस राष्ट्र मंदिर की देवी हैं, उन्हें नृत्यांगना के रूप में यदि किसी फिल्म में दिखाया जाता है तो पूर्णत: अपराध है। ऐसी सोच के पीछे के हाथों और दिमागों पर नजर रखने की आवश्यकता है। देश के इतिहास के साथ गद्दारी सबसे बड़ा अपघात होती है।

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