गीता के दूसरे अध्याय का सार और गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-13आत्मा को नहीं होत है, सुख, दु:ख का कभी भान।
द्वन्द्व सताते देह को बात वेद की जान।।
हमारे देश के भी बड़े-बड़े विद्वानों तक को ऐसी भ्रांति रही है। आज के संसार के लोगों की तो यह प्रमुख समस्या है कि वे आत्मा और शरीर में भेद नहीं कर पाते हैं। किसी शायर ने कितना सुन्दर कहा है-
”जिस्म और रूह का रिश्ता भी अजीब है।
ताजिन्दगी साथ रहे मगर तअर्रूफ न हो सका।।”
आत्मा और इन्द्रियों के सम्बन्ध या इन्द्रियों और विषयों के सम्बन्ध को श्री कृष्णजी ने मात्रा स्पर्श कहा है। मात्रा का अभिप्राय है छू जाना या स्पर्श हो जाना। श्रीकृष्णजी कहते हैं कि हे अर्जुन! जिस पुरूष को ये चीजें दु:खी नहीं करतीं, वह सुख-दु:ख में समान भाव बरतता रहता है, उसे समभावी कहते हैं। ऐसा व्यक्ति विषम परिस्थितियों में भी कभी विचलित नहीं हो सकता। उसे अमर जीवन का बोध हो जाता है। हमारे शरीर में रहने वाला आत्मा अविनाशी है। उसका कभी भी नाश नहीं हो सकता। यह देह ‘शरीर’ कहलाता है- तो आत्मा ‘शरीरी’ कहा जाता है। क्योंकि वह शरीर में रहता है। शरीर जिसका हो वह शरीरी है, घर जिसका हो वह गृहस्वामी है। उस शरीरी को नाशवान समझकर तुझे युद्घ से विमुख नहीं होना चाहिए।
इसके विपरीत तुझे उस आत्मतत्व पर चिन्तन करना चाहिए और उसे अविनाशी मानकर युद्घ के लिए तत्पर हो जाना जाना चाहिए। तुझे पता होना चाहिए कि आत्मा न तो मरता है और न मारा जाता है, क्योंकि आत्मा न तो कभी जन्मता है, और न कभी मरता है। यह अजन्मा आत्मा इस मरणशील शरीर को छोडक़र भी मरता नहीं है। अन्त या नाश इस शरीर का होता है, आत्मा का नहीं। तू अनावश्यक ही इस आत्मा को मरणशील मान बैठा है। यह तेरा अज्ञान है जो तुझे इस समय कत्र्तव्य विमुख कर रहा है। मरणधर्मा को तू इस समय अविनाशी और अविनाशी को मरणधर्मा समझने की भूल कर रहा है। यह कत्र्तव्य विमुखता तेरे लिए घातक और लोक में अपयश दिलाने वाली होगी। तुझे इस आत्मा को अजन्मा व अपरिवर्तनशील मानकर इसके प्रति अपने अज्ञान को यथाशीघ्र दूर कर लेना चाहिए।
गीता का मानना है कि जैसे मनुष्य फटे पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नये वस्त्रों को धारण कर लेता है, या पहन लेता है वैसे ही यह जीवात्मा ‘शरीरी’ पुराने जीर्णशीर्ण हो गये शरीरों को त्यागकर नये शरीरों को धारण कर लेता है।
संसार के लोग आज भी अज्ञान में हैं। कई लोग तो मुर्दे को इसलिए गाड़ देते हैं कि जब कयामत आएगी तो ये उस समय पुन: जीवित हो उठेंगे। इनमें उस समय रूह प्रवेश करेगी और ये हमारी तरह ही उठकर बात करने लगेंगे। सदियां गुजर गयीं उन्हें ऐसा करते। मुर्दों को कब्रों से उठकर न तो आना था और न आये, और यह भी सत्य है कि वे कभी आएंगे भी नहीं। इसके उपरान्त भी इन लोगों को अर्जुन जैसा अज्ञान छा गया है और सदियों से छाया पड़ा है। उन्हें किसी ‘कृष्ण’ ने आज तक नहीं बताया कि यह तुम्हारी अज्ञानता है। शरीर मृत्यु के समय ही समाप्त हो जाता है। उसका नाश हो जाता है और यह जीवात्मा पुन: नया शरीर धारण कर लेता है। जिसे हम मृत्यु मानकर चलते हैं-वास्तव में वह मृत्यु न होकर दूसरा जन्म है। इसमें आत्मा तो वही का वही रहता है। बस, शरीर का चोला परिवर्तित हो जाता है। इसे ही लोग ‘नई बोतल में पुरानी शराब’ कहते हैं। जो लोग इस शराब के नशे का आनन्द ले लेते हैं-उनके लिए यह ‘शराब’ बड़ी लाभकारी होती है। वास्तव में यह शरीर कर्मफल भोगने के लिए मिलता है। जो व्यक्ति कर्मफल भोग चुका होता है वह इस संसार से चल देता है। जिसकी युवावस्था में मृत्यु हो जाती है उसके विषय में समझना चाहिए कि उसके कर्मफल अथवा भोग पूर्ण हो चुके हैं। अब उसका यहां रहने का कोई औचित्य नहीं था। इस शरीर के भोगपूर्ण हुए तो नये की तैयारी कर ली गयी। क्रमश:

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