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नारद का मोह

प्रचलित कथा : एक कथा का वर्णन गोस्वामी तुलसीदास जी अपने ग्रन्थ रामचरित मानस के बालकाण्ड में करते है जो वास्तव में उनके इस ग्रन्थ की आधारशिला है। लिखा है कि एक समय महर्षि नारद को अभिमान हो गया कि वे महान इन्द्रियजीत हैं क्योंकि कामदेव का उन पर कोई प्रभाव नहीं हो सकता। उनका अभिमान चूर करने के लिए विष्णु भगवान ने उनके रास्ते में एक सुंदर नगर रचा जिसमें सुंदर नरनारी बसते थे ,ऐसा लगता था कि बहुत से कामदेव और उसकी स्त्री रति ही मानव शरीर धारण किये हुए हों। उस नगर में शीलनिधि नाम का राजा राज्य करता था जिसका वैभव तथा विलास सौ इन्द्रों के सदृश था। उसके एक विश्वमोहिनी नाम की रूपवती कन्या थी जिसके रूप को देखकर स्वयम् लक्ष्मी जी भी मोहित हो जायें।
अब उस राजकुमारी का स्वयंवर आयोजन था जिसमें अनगिनत राजा महल में पहुंचे तो राजा ने राजकुमारी को लाकर नारदजी को दिखलाया और उनसे उस कन्या के स्वयंवर के बारे में सलाह ली। नारदजी तो उस कन्या को देखकर उस पर मोहित हो गये और मन ही मन यह विचार बनाने लगे कि किस प्रकार इसको प्राप्त किया जाये। ऐसे में क्या किया जाये इतना समय भी नही था कि विष्णु भगवान के पास जायें और उनसे ऐसा सुंदर रूप मांगे जिससे कि वह कन्या नारदजी को ही वरे। अतः नारदजी ने भगवान् का ध्यान किया और भगवान वहाँ प्रकट हो गये तो नारदजी ने उनसे सारी कथा बतलाई और प्रार्थना की कि हे प्रभु ! कृपा करके आप अपना रूप मुझको दीजिये जिससे वह रूपवती कन्या मुझे वर ले।
भगवान् ने कहा कि हे नारद जी ! जिस प्रकार आपका परमहित होगा हम वही करेंगे। पर नारदजी तो ऐसे मोह के कारण वशीभूत हो रहे थे। कि वे भगवान् की इस स्पष्टोक्ति का अर्थ न समझ सके अपितु उन्होने यही समझा कि भगवान् ने उनकी बात मान ली है। भगवान ने नारदजी को अत्यन्त कुरूप बना दिया लेकिन वे तो अपने को साक्षात् विष्णु रूप समझ वहाँ स्वयंवर सभा में जा विराजे जहाँ शिव जी के दो गण भी थे जो यह सब लीला देख रहे थे और वे नारदजी को सुना-सुना कर व्यंग्य वचन कह रहे थे। जैसे कि भगवान् ने इन्हें कितनी सुंदरता दी है, इनकी छवि देखकर राजकुमारी रीझ जायेंगी और हरि (अर्थात् वानर) जानकर शेषरूप से इनको ही वरेगी। परन्तु नारद जी तो इसको अपनी प्रशंसा ही मान रहे थे। जब राजकन्या वरमाला लेकर आई तो उसने उधर देखा भी नहीं पर नारद जी झटपटा रहे थे और बार-बार उचक कर देख रहे थे। उधर विष्णु भगवान् स्वयं एक राजा के वेष में आ पहुंचे और राजकुमारी ने हर्षित होकर तुरंत जयमाला उनके गले मे डाल दी। इस पर नारद जी विकल हो गये तब शिवजी के गणों ने मुस्करा कर कहा जोकर दर्पण में अपना मुँह तो देखिये। नारद जी ने जब अपना मुख दर्पण में देखा तो उनके क्रोध का पारावार न रहा और उन्होने शिवजी के गणों को श्राप दिया कि तुम दोनों पापी जाकर राक्षस हो जाओ तथा भगवान् को कहा कि तुम सदा कपट का व्यवहार करते हो अतः जिस शरीर को धारण करके तमुने मुझे ठगा है। तुम भी यही शरीर अर्थात् मानव की देह धारण करो और तुमने हमारा रूप बंदर जैसा दिया था इससे बंदर ही तुम्हारी सहायता करेंगे तथा तुम भी स्त्री के वियोग में तड़पोगे।
प्रचलित कथा का विश्लेषण :
गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित मानस काव्य रचने के लिए एक सुंदर काल्पनिक कथा रची ,कवि का हृदय विशाल होता है और अपनी कल्पना की उड़ान से वह सूर्य चंद्र लोक की यात्राएं तक कर लेता है, कभी वायु और सूर्य में झगड़ा करते हुए कविताएं रचता है तो कभी देवताओं को स्वयंवर की कथा रच देता है। क्योंकि हिंदी और संस्कृत साहित्य ने उपमा और अतियोशक्ति अलंकार की बहुलता है परंतु इसको धर्म का अंग मान लेना और प्रमाणिक धार्मिक साहित्य को छोड़ देना मूढ़ता है।
कवि कवि होता है ऋषि नही , इसीलिए ऋषि कृत ग्रंथ वेद उपनिषद आदि है जो हमारी मार्गदर्शक है।
इस काव्य को ठीक से ना समझने के कारण बड़ी हानि पहुंची है और आज का अध्ययनशील अधिकांश मानव समाज इसी को सही मानता है। यद्यपि यह वर्णन बुद्धिपरक नहीं है और विवेक की कसौटी पर खरा नही उतरता। अपितु वे इसी को धर्म का अंग समझ कर अंधविश्वास में फंसे है।
यथार्थ क्या है ?
यह नारद रूपी मन अति चंचल है, भोग विलासिता इसकी कमजोरी है और इसी कमजोरी के अंतर्गत मानव प्रभु का ध्यान केवल विलासिता के लिए करता है और इसी प्रकार के दिव्य स्वप्न देखा करता है ।दूसरे की सुंदरता , संपत्ति के देख स्वयं पाने के लिए लालयित हो जाता है,जबकि स्वयं की योग्यता का आंकलन नही करता और तदनुसार अपनी इच्छाएं सीमित नहीं करता है।परिणाम स्वरूप उसको निराशा ,हताशा और समाज में अपमान मिलता है। और फिर मानव अपना संतुलन खो बैठता है यहां तक कि ईश्वर को दोष देने लगता है।
यहां वानर की उपमा देकर समझाया गया है कि जैसे वानर बड़ा चंचल होता है उसी प्रकार मन भी महा चंचल होता है। अतः इसको काबू रखने की नितान्त आवश्यकता है। इस कथा का इतना ही सार है और इसको हमें इसी रूप में समझना और मानना चाहिए।

प्रस्तुति : डॉ डी0के0 गर्ग

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