चिन्तनीय विषय : कृषि क्षेत्र बदहाल क्यों है

दीपक गिरकर
राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन की हालिया रिपोर्ट बताती है कि एक किसान परिवार खेती से औसतन 3078 रुपए ही कमा पाता है। जबकि सीएसडीएस के आंकड़े बताते हैं किबासठ फीसद किसान खेती छोडऩा चाहते हैं। ये दोनों आंकड़े किसानों और कृषिक्षेत्र की दुर्दशा की तरफ ही इशारा करते हैं। लेकिन कृषि ऋण की माफी से सभी सीमांत और छोटे किसानों की राहत नहीं मिलेगी, क्योंकि सभी सीमांत और छोटे किसान बैंक से कर्ज प्राप्त नहीं कर पाते हैं। हमारे देश में 2.21 करोड़ सीमांत और छोटे किसान सेठ-साहूकारों से कर्ज लेते हैं। खेती का खर्च लगातार बढ़ रहा है। पर किसानों को अपनी उपज के वाजिब दाम नहीं मिल रहे हैं। जब उद्योग जगत कोयला, प्राकृतिक गैस और ऑटोमोबाइल जैसे कई महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में लागत तय करने वाली तमाम प्रक्रिया अपना रहा है, और अपने उत्पादों की मनमानी कीमतें तय कर रहा है, तब भला किसानों को अधिक मूल्य देने से क्या नुकसान होगा?
हालांकि कृषि उत्पादों पर कम मूल्य और कर्ज का बढ़ता बोझ ही उनकी मुख्य समस्याएं नहीं हैं। दरअसल, कृषि के ढांचे में ही कुछ ऐसी समस्याएं हैं जिनका कर्ज-माफी जैसे अस्थायी उपायों से समाधान नहीं हो सकता। पीढ़ी-दर-पीढ़ी कृषि-जोत के विभाजित होने से जोत का आकार घटता जा रहा है। इससे कृषि उपज और फसलों से होने वाली बचत में कमी आ रही है।
छोटी जोत वाले किसानों के पास खेती के पर्याप्त साधन, सिंचाई की व्यवस्था आदि का अभाव होता है और इस सबके लिए उन्हें बड़े किसानों पर निर्भर रहना पड़ता है। वहीं, बड़े किसानों की संख्या भी समय के साथ घट रही है। ऐसे में छोटे किसानों के लिए खेती के साधन जुटाना बेहद मुश्किल होता जा रहा है। इसके अलावा क्रय-विक्रय में छोटे किसानों की मोलभाव क्षमता भी कम होती है। ऐसे में जैसे-जैसे खेतों का आकार छोटा होता जा रहा है, किसानों को होने वाला फायदा भी कम होता जा रहा है। हर पांच साल में कृषि क्षेत्र में एक करोड़ छोटे किसान जुड़ रहे हैं। अगर यह दर बरकरार रही तो आने वाले समय में कृषि क्षेत्र के हालात बेकाबू हो सकते हैं। लघु किसानों की सबसे बड़ी परेशानी है पूंजी या लागत का न होना। अपनी घरेलू जरूरतों से लेकर कृषि की लागत तक उन्हें पैसा चाहिए और इसके लिए वे साहूकार तथा किसान क्रेडिट कार्ड पर निर्भर रहते हैं। किसान को क्रेडिट कार्ड से चूंकि सरलता से पैसा मिल जाता है, अत: इसे वह कृषि की जगह अपनी सामाजिक व घरेलू जरूरतों की पूर्ति में लगा देता है और पैसा खर्च होने के बाद खेती की लागत के लिए साहूकारों के चंगुल में फंस जाता है।
आज भी अधिकांश भारतीय कृषि वर्षा के भरोसे ही चलती है। इंद्र देवता के रूठ जाने पर सूखा, कीमतों में वृद्धि, कर्ज के अप्रत्याशित बोझ, बैंकों के चक्कर, बिचौलियों व साहूकारों के घेरे में फंस कर छोटा किसान या तो जमीन बेचने पर मजबूर है या आत्महत्या करने को विवश होता है। हमारे देश में पिछले इक्कीस वर्षों में तीन लाख से ज्यादा किसानों ने कर्ज वसूली के दबाव और आर्थिक तंगी के कारण आत्महत्या की है। आधिकारिक आकलनों में प्रति तीस मिनट में एक किसान आत्महत्या कर रहा है। ये छोटे और मझोले किसान हैं, जो आर्थिक तंगी की सूरत में अपनी जान गंवा रहे हैं। अगर आत्महत्या के मामलों की सघन जांच की जाए, तो ऐसे किसानों की संख्या ज्यादा निकलेगी जो मजदूर और शोषित वर्ग के हैं और जिनका जमीन पर स्वामित्व तो है लेकिन उनकी जमीन किसी साहूकार या बड़े किसान के पास गिरवी रखी है और वे बटहार का काम करते हैं।
सिर्फ कृषि ऋण की माफी और बैंक ऋण के ब्याज में छूट देने से सभी सीमांत और छोटे किसानों का भला नहीं होगा। कृषि ऋण माफी और बैंक ऋण ब्याज में छूट अस्थायी उपाय हैं। ये उपाय संपूर्ण समस्या का समाधान नहीं हैं।
सरकारी योजनाएं विधायिका और कार्यपालिका के रवैये के कारण रास्ते में ही गुम हो जा रही हैं या इन योजनाओं के बारे में किसानों को जागरूक नहीं किया जा रहा है। औद्योगीकरण और बुनियादी ढांचे को मजबूत करना, मेक इन इंडिया, बुलेट ट्रेन और स्मार्ट सिटीज तक ही सरकार की सोच नहीं होनी चाहिए बल्कि हमारे देश की आबो-हवा, प्रकृति और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के आधार पर ही सरकार को विकास के पथ पर देश को आगे ले जाना चाहिए। 2004 से 2015-16 के बीच बारह वर्षों में उद्योग क्षेत्र को कॉरपोरेट टैक्स में लगभग पचास लाख करोड़ रुपए की छूट सरकार द्वारा दी गई। इस राजस्व का एक तिहाई भी यदि कृषि में निवेश कर दिया जाए तो कृषि क्षेत्र की तस्वीर बदल सकती है।
सरकार उद्योगों को हर तरह से बढ़ावा देती है, लेकिन कृषि क्षेत्र की बाबत वह सिर्फलोकलुभावन घोषणाएं कर देती है। इस सौतेलेपन के कारण ही देश में अमीरों और गरीबों की बीच की खाई और बढ़ती जा रही है। एक तरफ किसानों की कर्ज माफी के लिए रिजर्व बैंक तैयार नहीं है और दूसरी तरफ, कॉरपोरेट घरानों के कर्ज से बैंकों के एनपीए बढ़े हैं और बैंकों की सेहत खराब हुई है। बैंकों की हालत सुधारने के लिए आम जनता के पैसों का इस्तेमाल हो रहा है। बैंकों के एनपीए में वृद्धि के लिए किसान नहीं बल्कि कॉरपोरेट घराने जिम्मेदार हैं।
वित्तमंत्री के मुताबिक कुछ विकसित देश किसानों को सबसिडी सीधे तौर पर देते हैं। मोदी सरकार भी इसी प्रकार की योजना पर विचार कर रही है। आगामी बजट में सरकार किसानों को अल्पावधि ऋण की राशि तीन लाख रुपए से बढ़ा कर पांच लाख रुपए कर सकती है और दीर्घावधि ऋण पर चार फीसद की सबसिडी देने का भी एलान कर सकती है। अभी तक सरकार अल्पावधि ऋण पर तीन से चार फीसद की सबसिडी देती है और दीर्घावधि ऋण पर नहीं देती है। खेती का खर्च लगातार बढ़ रहा है। क्या राजनीतिक दबाव के कारण, सरकार सिर्फ लोकलुभावन योजनाओं का एलान करेगी?
किसानों के लिए जोन्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया जाता है वह देश के ज्यादातर किसानों को अकसर नहीं मिल पाता है। यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणाएं हवाई साबित होती हैं। फिर, न्यूनतम समर्थन मूल्य दो-चार फसलों का ही घोषित किया जाता है, जबकि कृषि उपज में बहुत-सी चीजें शामिल रहती हैं। अहम सवाल यह भी है कि आखिर न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने की प्रक्रिया और कसौटी क्या है? क्या किसान को कुशल श्रमिक मान कर उसके श्रम-योगदान का उचित आकलन किया जाता है? और यह भी ध्यान रखें कि खेती में किसान अकेले नहीं लगता, बल्कि परिवार के अन्य सदस्यों को भी इसमें लगना पड़ता है। क्या न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करते समय सभी के श्रम का मूल्य जोड़ा जाता है?
बढ़ती कृषि लागत और कृषि उपज के घटते दामों के बीच भारतीय किसान पिस रहा है। हमारे नीति निर्माताओं को चाहिए किवे विशेषकर छोटे और सीमांत किसानों के हक में योजनाएं बनाएं और सरकार यह सुनिश्चित करे किइन योजनाओं का लाभ वास्तविक लाभार्थियों तक जरूर पहुंचेगा।
लाभकारी मूल्य गारंटी, खेतों के नजदीक समृद्ध बाजारों का सृजन, वहीं गोदाम और कोल्ड स्टोरेज की सुविधाएं देकर और मासिक आय सुनिश्चित करके सरकार सीमांत और छोटे किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार ला सकती है।

Comment:

betpark güncel giriş
betgaranti güncel giriş
kolaybet güncel giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark güncel giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
meritking giriş
virüsbet giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
meritking giriş
marsbahis giriş
meritking giriş
realbahis giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark 2026
bets10 giriş
casinoroyal
casinoroyal
hititbet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
supertotobet giriş
supertotobet giriş
supertotobet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
supertotobet giriş
supertotobet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
Betpark Giriş
Betpark Giriş
vaycasino giriş
trendbet
trendbet
betnano giriş
betnano giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
betorder giriş
betorder giriş
betorder giriş
betorder giriş
trendbet
trendbet
trendbet
trendbet
hitbet
betnano giriş
restbet giriş
restbet giriş
casinoroyal giriş
casinoroyal giriş
padişahbet giriş
padişahbet giriş
betlike giriş
betlike giriş
casinoroyal
casinoroyal
trendbet
trendbet
betnano giriş
setrabet
setrabet