गीता का सोलहवां अध्याय

गीता के 15वें अध्याय में प्रकृति, जीव तथा परमेश्वर का वर्णन किया गया है तो 16वें अध्याय में अब श्रीकृष्णजी मनुष्यों में पाई जाने वाली दैवी और आसुरी प्रकृतियों का वर्णन करने लगे हैं। इन प्रकृतियों के आधार पर मानव समाज को दैवीय मानव समाज और आसुरी मानव समाज इन दो विभागों में विभक्त किया गया है।
हमारे ऋषियों और संस्कृत के विद्वानों की लेखन की अद्भुत और अनोखी शैली है। गायत्री मंत्र के ऋषि ने ओ३म् भू:=उत्पत्तिकत्र्ता, भुव=दु:खहत्र्ता और स्व:=सुखप्रदाता, इन तीन नामों से ईश्वर को पुकारा है। इनमें ईश्वर को समस्त जगत का उत्पत्तिकर्ता कहकर आगे उसे दु:खहत्र्ता कहा गया है। उसके बाद सुखप्रदाता कहा गया है। गायत्री मन्त्र में वेद के ऋषि के द्वारा ईश्वर को सुखप्रदाता पहले भी कहा जा सकता था और जब वह सुखप्रदाता हो जाता तो दु:खहत्र्ता तो अपने आप ही हो जाना था। इसके उपरान्त भी वेद के ऋषि ने ईश्वर को दु:खहत्र्ता पहले कहकर एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया है। जब दु:ख नहीं रहेगा तो सुख स्वयं ही आ जाएगा।
दूसरी बात ये है कि पहले विषाक्त वायु को घर से निकालो तो तभी शुद्घ वायु का प्रवेश सम्भव है और जब बाहरी शुद्घ वायु आ जाएगी तो सुख का वातावरण स्वयं ही बन जाएगा। पर यह ध्यान रखिये कि जब तक अशुद्घ वायु घर में है तब तक बाहरी शुद्घ वायु का प्रवेश घर में हो ही नहीं सकता। इसी प्रकार पहले दु:खों का खात्मा हो तभी सुख प्रदाता ईश्वर का आगमन हो-यही उचित है। अत: दु:ख के हटने पर ही सुख का मूल्य समझ में आता है। दु:ख को हटाने के लिए विशेष साधना करनी पड़ती है, उस साधना को पहले कर लिया जाए तो जो फल मिलेगा-वह निश्चय ही सुख रूपी होगी।
16वें अध्याय से पूर्व गीताकार 15वें अध्याय में ईश्वर के व प्रकृति के विषय में बता आया है और अब वह मनुष्य की प्रकृति के विषय में बताने लगा है। यदि गीताकार मनुष्य की प्रकृति के विषय में पहले बताता और ईश्वर, जीव, प्रकृति के विषय में बाद में बताता तो यह भी वैज्ञानिकता के विरूद्घ होता। सृष्टि नियमों के विपरीत होता। यहां पर यह स्पष्ट किया जा रहा है कि मनुष्य को प्रकृति के मायावाद से बाहर निकल कर अर्थात उससे अपना सम्बन्ध विच्छेद कर परमात्मा से अपना सम्बन्ध जोडऩे के लिए प्रयास करना चाहिए। जो लोग ईश्वर के साथ अपना सम्बन्ध स्थापित करने में सफल हो जाते हैं-उनकी साधना सफल हो जाती है और लोग उन्हें दैवीय प्रकृति का अथवा देवता पुरूष कहकर पुकारने लगते हैं। क्योंकि उनके भीतर ईश्वरीय दिव्य गुणों का प्रकाश हो जाता है जो उनके मन, वचन और कर्म से भी भासने लगता है। जो लोग ईश्वर से दूर रहते हैं और उसके अस्तित्व तक पर प्रश्न उठाते हैं या उसे मानने और जानने को तत्पर ही नहीं होते, और संसार में बनी हुई ईश्वरीय व्यवस्था को अपने दुष्कर्मों से तोडऩे का प्रयास करते रहते हैं वे लोग संसार में आसुरी प्रकृति के कहे जाते हैं। इन आसुरी प्रकृति के लोगों के कारण संसार में सर्वत्र कोलाहल और अशान्ति व्याप्त रहती है। इनके उत्पात, उन्माद और उग्रवाद के कारण संसार में अच्छे लोगों का जीना भी कठिन हो जाता है।
कौन है दैवी प्रकृति के लोग
दैवीय प्रकृति के लोगों के विषय में बताते हुए गीताकार कह रहा है कि ये लोग विशिष्ट और दिव्य गुणों से भासित होते हैं। श्री कृष्णजी जो अपनी बात को समझाते हुए अर्जुन से कह रहे हैं कि हे भारत! निर्भयता अन्त:करण की शुद्घि, ज्ञान और योग में निष्ठा, दान, दम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप सरलता (ये दैवीय प्रकृति के व्यक्ति के कुछ गुण हैं। जिन्हें अपनाकर हर व्यक्ति दिव्य गुणों की सम्पदा का स्वामी बन जाता है।)
अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, शान्ति, दूसरों के दोष न ढूंढना, प्राणियों पर दया, लोभ न होना स्वभाव में मृदुता (कोमलता) लज्जाशीलता (भी वही पवित्र गुण हैं जिन्हें अपनाकर व्यक्ति दिव्य सम्पदा सम्पन्न बन सकता है। ये गुण व्यक्ति के जीवन में जिस अनुपात में भी आते जाते हैं, उसी अनुपात में व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण होता जाता है और वह अपने स्तर के लोगों में अनोखा और अदभुत बनता जाता है।)
श्रीकृष्णजी 16वें अध्याय के तीसरे मंत्र में कह रहे हैं कि तेज, क्षमा, धैर्य, पवित्रता, द्वेष न करना, अत्यन्त अभिमान न करना, ये उस व्यक्ति के गुण हैं जो दैवीय सम्पदा सम्पन्न अर्थात दैवी सम्पदा लेकर जन्म लेता है। ऐसे लोगों को संसार में सर्वत्र सम्मान और सत्कार प्राप्त होता है। लोग ऐसे महापुरूषों के आगमन को अपना सौभाग्य समझते हैं और अपने घर पर ऐसे लोगों को अपने बीच पाकर हार्दिक प्रसन्नता अनुभव करते हैं।
दैवी सम्पदा व्यक्ति संसार के लिए आवश्यक आवश्यकता होती है। क्योंकि यह ईश्वर द्वारा रचित संसार आगे बढऩे के लिए ईश्वरीय व्यवस्था के नियमों को जानने और मानने वाले व्यक्तियों की अपेक्षा करता है। यदि वे लोग संसार में नहीं रहेंगे या नहीं होंगे तो संसार में अराजकता व्याप्त हो जाएगी। सब एक दूसरे के अधिकारों का अतिक्रमण करने लगेंगे और उस अवस्था में सर्वत्र हाहाकार मच उठेगा। अत: दैवी सम्पदा लोग संसार की आवश्यक आवश्यकता है। इसीलिए इन लोगों का सर्वत्र सम्मान होता है। कहा भी जाता है कि एक राजा तो अपने देश में ही सम्मान पाता है। परंतु एक विद्वान तो सर्वत्र ही पूजा जाता है। विद्वान की पूजा का कारण यही है कि संसार को विद्वानों की आवश्यकता है। उसे मूर्खों की और अज्ञानियों की आवश्यकता नहीं है। यही कारण है कि मूर्ख और अज्ञान लोग सर्वत्र उपेक्षित होते हैं। इस प्रकार विद्वानों को अपेक्षित और मूर्खों को उपेक्षित मानकर व जानकर यह संसार चलता है।
संसार में आसुरी प्रकृति के लोग
अब श्रीकृष्णजी उन लोगों के विषय में बताने लगे हैं जो आसुरी प्रकृति के होते हैं। वह कहते हैं कि हे पार्थ! दम्भ, दर्प, अभिमान, क्रोध, पारूष्य और अज्ञान ये उस व्यक्ति के दुर्गण हैं- जो जो आसुरी संपदा लेकर जन्म लेते हैं।
आसुरी प्रकृति के लोगों के पास अज्ञानता होती है। ये ‘दम्भी’ पाखण्डी और अहंकारी प्रकृति के होते हैं। समझाने पर भी इन्हें अच्छी बातें समझ में नही आती है। ये अच्छी बातों को न तो जानते हैं और न ही मानते हैं। यदि कोई व्यक्ति इन्हें सही रास्ते पर लाने का प्रयास भी करता है तो भी ये उसे मानने को तैयार नही होते हैं। कुछ लोग जानते हैं कि जिस मार्ग पर तू जा रहा है-वह गलत है। पर फिर भी अपने अहंकार के कारण उस गलत रास्ते को छोडऩे को तैयार नहीं होता है। जैसे दुर्योधन है, जिसने युधिष्ठिरादि पाण्डवों के साथ स्वयं भी उतनी ही विद्या ग्रहण की है-जितनी पाण्डवों ने ग्रहण की है। परन्तु फिर भी वह सही और न्याय संगत बात को मानने के लिए तैयार नहीं है। उसका अहंकार उसे जिद्दी और हठीला बनाये हुए है, और उसी के जिद्दी एवं हठीले व्यवहार का परिणाम है कि एक ही वंश परम्परा के लोग आज एक दूसरे के रक्त के प्यासे बनकर युद्घ के मैदान में आ डटे हैं।
क्रमश:

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