कल्याण सिंह की एक अनुकरणीय पहल

राजस्थान के राज्यपाल श्री कल्याण सिंह अपनी विशिष्ट कार्यशैली के कारण चर्चाओं में रहते हैं। कुछ राज्यपालों ने इस संवैधानिक पद की गरिमा के प्रतिकूल आचरण करते हुए इसे विवादास्पद बनाने का भी कार्य अतीत में किया है, परंतु श्री कल्याण सिंह एक अपवाद हैं।

उन्होने राज्यपाल पद पर रहते हुए राजस्थान में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में जिस प्रकार परिवर्तन किए हैं और विश्वविद्यालयों की दुर्दशा को संभालने का कार्य किया है उससे उनकी एक दूरदर्शी राजनेता की छवि बनी है। अब उन्होने फिर एक ऐतिहासिक और अनुकरणीय पहल करते हुए राज्यपाल के लिए चली आ रही ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ की परंपरा को अपने लिए बंद करा दिया है। जब चारों ओर सम्मान के लिए राजनीतिज्ञ भूखे हों और दिखावे की राजनीति को अपने लिए महत्वपूर्ण मान रहे हों तब इस ब्रिटिश काल की सामंती परंपरा को विदा करने की पहल करके श्री सिंह ने एक साहसिक और अनुकरणीय कदम उठाया है। जिसे भविष्य में यदि अन्य राज्यों के राज्यपालों ने भी अपनाया तो सचमुच यह लोकतन्त्र के लिए एक शुभ संकेत होगा।

राज्यपाल के संदर्भ में हमें ध्यान रखना चाहिए कि भारत का संविधान संघात्मक है। इसमें संघ तथा राज्यों के शासन के सम्बन्ध में प्रावधान किया गया है। संविधान के भाग 6 में राज्य शासन के लिए प्रावधान है। यह प्रावधान जम्मू-कश्मीर को छोडक़र सभी राज्यों के लिए लागू होता है। जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति के कारण उसके लिए अलग संविधान है। संघ की तरह राज्य की भी शासन पद्धति संसदीय है। राज्यपाल की नियुक्ति राज्यों में होती है तथा केंद्र प्रशासित प्रदेशों में उपराज्यपाल की नियुक्ति होती है भारत में 7 केंद्र शासित राज्य हैं जिनमें से 3 केंद्र शासित राज्यों में उप राज्यपाल का पद है वह 3 केंद्र शासित राज्य निम्न है अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह ,दिल्ली और पुडुचेरी बाकी चार केंद्र शासित राज्यों में प्रशासक होते हैं वहां पर उप राज्यपाल का पद नहीं होता है वह ४ केंद्र शासित राज्य है। चंडीगढ़ , दमन और दीव, दादरा और नगर हवेली, लक्ष्यदीप। राज्य की कार्यपालिका का प्रमुख राज्यपाल (गवर्नर) होता है, जो मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार कार्य करता है। कुछ मामलों में राज्यपाल को विवेकाधिकार दिया गया है, ऐसे मामले में वह मंत्रिपरिषद की सलाह के बिना भी कार्य करता है।

राज्यपाल अपने राज्य के सभी विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति भी होते हैं। इनकी स्थिति राज्य में वही होती है जो केन्द्र में राष्ट्रपति की होती है। केन्द्र शासित प्रदेशों में उपराज्यपाल होते हैं। 7 वे संशोधन 1956 के तहत एक राज्यपाल एक से अधिक राज्यो के लिए भी नियुक्त किया जा सकता है।

राज्यपाल, राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है। वह मंत्रिपरिषद की सलाह से कार्य करता है परंतु उसकी संवैधानिक स्थिति मंत्रिपरिषद की तुलना में बहुत सुरक्षित है। वह राष्ट्रपति के समान असहाय नहीं है। राष्ट्रपति के पास मात्र विवेकाधीन शक्ति ही है जिसके अलावा वह सदैव प्रभाव का ही प्रयोग करता है किंतु संविधान राज्यपाल को प्रभाव तथा शक्ति दोनों देता है। उसका पद जितना शोभात्मक है, उतना ही कार्यात्मक भी है। अनु 166[2] के अंर्तगत यदि कोई प्रशन उठता है कि राज्यपाल की शक्ति विवेकाधीन है या नहीं तो उसी का निर्णय अंतिम माना जाता है। अनु 166[3] राज्यपाल इन शक्तियों का प्रयोग उन नियमों के निर्माण हेतु कर सकता है जिनसे राज्यकार्यों को सुगमता पूर्वक संचालन हो साथ ही वह मंत्रियों में कार्य विभाजन भी कर सकता है। अनु 200 के अधीन राज्यपाल अपनी विवेक शक्ति का प्रयोग राज्य विधायिका द्वारा पारित बिल को राष्ट्रपति की स्वीकृति हेतु सुरक्षित रख सकने में कर सकता है। अनु 356 के अधीन राज्यपाल राष्ट्रपति को राज के प्रशासन को अधिग्रहित करने हेतु निमंत्रण दे सकता है यदि यह संविधान के प्रावधानों के अनुरूप नहीं चल सकता हो।

पहले कई बार इस पद के औचित्य पर सवाल उठाते हुए इसको समाप्त करने की मांग उठी है। सबसे पुरजोर तरीके से इस पद पर सवाल अगस्त 2013 में लोकसभा में यूपीए सरकार के समय उठाया गया था। उस समय इस पद को औपनिवेशक काल की विरासत बताते हुए इस संवैधानिक पद को समाप्त किए जाने की वकालत लगभग सभी दलों ने की थी।

उस समय देश की राजनीति की दिशा निश्चित करने वाली कद्दावर पार्टियों जेडीयू, टीएमसी, एसपी, आरजेडी सहित बीजेपी ने भी इस पद पर पृश्न उठाए थे और कहा था कि देश की आर्थिक स्थिति को देखते हुए राज्यपाल का पद आर्थिक ढांचे पर एक बोझ है और बदलते परिदृश्यों में इस पद की व्यावहारिकता की समीक्षा किए जाने की जरुरत है। लगभग सभी राजनीतिक दलों ने राज्यपाल संशोधन विधेयक पर चर्चा में हिस्सा लेते हुए राज्यपाल के पद की कड़ी आलोचना की थी और राज्यपालों को सफेद हाथी करार दिया था।

ऐसे में जबकि प्रत्येक राजनीतिक दल और राजनीतिक चिंतक को राज्यपालों के पद पर विराजमान व्यक्तियों या राजनीतिज्ञों की फिजूलखर्ची पर बार-बार कुछ कहने का अवसर मिलता है या उनकी कार्यशैली को देखकर कुछ ना कुछ टिप्पणी करने का अवसर मिलता है- तब यह बहुत आवश्यक हो जाता है कि इस पद पर विराजमान व्यक्ति बहुत ही सधी सधाई भूमिका के साथ इस पद के दायित्वों और कर्तव्यों का निर्वाह करें। श्री कल्याण सिंह जबसे अपने पद पर विराजमान हुए हैं तब से उन्होंने इस पद की गरिमा का ध्यान रखते हुए पद की शोभा को बढ़ाने का प्रयास किया है और उसी के अनुसार अपने कार्य व्यवहार को अंतिम परिणति तक पहुंचाने का कार्य सफलतापूर्वक संपन्न किया है। निश्चित रूप से ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ का प्रावधान या परंपरा एक लोकतांत्रिक देश में उचित नहीं कही जा सकती। इस पर श्री सिंह का ध्यान गया और उन्होंने इसे समाप्त करने के लिए राज्य सरकार के लिए जनवरी 2018 में पत्र लिखा। जिसमें यह प्रश्न उठाया गया था कि क्या यह परंपरा बदली जा सकती है? इस पर राज्य सरकार ने 11 मई 2018 को राज्यपाल को स्पष्ट किया कि यदि वह स्वयं इस परंपरा को अपने लिए अनुकूल नहीं समझते हैं तो ऐसा कर सकते हैं।

राज्य सरकार के इस परामर्श पर राज्यपाल श्री कल्याण सिंह ने इस परंपरा को विदा करने का मन बना लिया और पिछले दिनों 14 जून से इसे समाप्त करने की घोषणा कर दी।

सामंती परंपरा की प्रतीक ऐसी परंपराएं हमारे देश के बहुलतावादी समाज और लोकतांत्रिक मूल्यों में आस्था रखने वाले लोगों के लिए किसी भी प्रकार से उचित नहीं जा सकती। हमें ऐसी परंपराओं को ढूंढ ढूंढ कर समाप्त करने का प्रयास करना चाहिए जो कि लोकतंत्र के नाम पर या तो फिजूलखर्ची को बढ़ावा देने वाली हैं या फिर राजनीतिक शानो-शौकत को बढ़ावा देती हों और जिनका किसी भी प्रकार से कोई औचित्य नहीं होता है। हमारे शासकों को और संवैधानिक पदों पर बैठे हुए राजनीतिज्ञों को प्रत्येक क्षण यह आभास जनता को कराना चाहिए कि वह जनता के द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि हैं और जनता जब चाहेगी उनके अधिकारों को उनसे वापस ले लेगी। श्री कल्याण सिंह जनता से जुड़े हुए राजनीतिज्ञ रहे हैं इसलिए जनता के मन की बात को समझते हैं। राज्यपालों को लेकर जिस प्रकार की चर्चाएं पूर्व में उठती रही हैं उनमें सुधार करने की भी आवश्यकता है। यदि हम श्री कल्याण सिंह जैसे राज्यपालों को राज भवनों में भेजेंगे तो निश्चित रुप से उसके अच्छे परिणाम आएंगे और तब हम देखेंगे कि राज्यपाल आलोचना का नहीं अपितु सम्मान का विषय बन कर रह जाएगा जो कि एक लोकतांत्रिक समाज के लिए बहुत ही आवश्यक भी है। 

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