मुलायम के कुनबे पर कानून का ‘शिकंजा’

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समाजवादी पार्टी के संस्थापक और संरक्षक रहे मुलायम सिंह यादव एवं उनके परिवार पर आय से अधिक संपत्त का मामला एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। मुलायम कुनबे पर वर्ष 2005 में कांग्रेस से जुड़े वकील विश्वनाथ चतुर्वेदी ने यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री और पूरे परिवार पर अवैध संपत्ति का मामला दर्ज कराया था। आरोप के तहत, मुलायम सिंह यादव पर वर्ष 1999 से 2005 के बीच मुख्यमंत्री रहते गैरकानूनी तरीके से 100 करोड़ रुपये की संपत्ति अर्जित करने का आरोप लगाया गया। इस मामले में मुलायम सिंह यादव, उनके बेटे अखिलेश यादव एवं प्रतीक यादव और बहू डिंपल यादव को आरोपी बनाया था। हालांकि, बाद में इस केस से मुलायम की बहू डिंपल यादव का नाम हटा दिया गया। 7 अगस्त 2013 को सीबीआई ने पर्याप्त सबूत के अभाव में जांच बंद कर दी गई। इसके खिलाफ वर्ष 2019 मे वकील विश्वनाथ चतुर्वेदी ने याचिका दायर कर सीबीआई के जांच बंद करने के फैसले को चुनौती दी। विश्वनाथ चतुर्वेदी ने इसी साल जनवरी में रोज एवेन्यू कोर्ट में याचिका दायर कर सीबीआई की ओर से आय से अधिक संपत्ति के मामले में क्लोजर रिपोर्ट नहीं दिए जाने का मामला उठाया। अगर मामले में जांच शुरू हुई तो मुलायम परिवार की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। इसको देखते हुए सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई पर सबकी नजर रहने वाली है।

आय से अधिक संपत्ति का है केस

वर्ष 2005 में कांग्रेस से जुड़े वकील विश्वनाथ चतुर्वेदी द्वारा समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव, उनके बेटों अखिलेश और प्रतीक, बहू डिंपल यादव के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला दायर किया गया था। इस पूरे मामले में इतने सारे मोड़ आए। इससे कई नई कड़ियां जुड़ती चली गई। फिर सुप्रीम कोर्ट में केस की सुनवाई शुरू हो रही है। विश्वनाथ चतुर्वेदी की याचिका में आय के ज्ञात स्रोत से अधिक संपत्ति अर्जित करने के लिए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत मुलायम और उनके परिवार के खिलाफ मुकदमा चलाने की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी शिकायत में योग्यता पाई।

वर्ष 2007 में इस मामले में सीबीआई जांच का आदेश दिया गया। सीबीआई ने जांच शुरू की। वर्ष 2008 में तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार पर बड़ा संकट आया। अमेरिका के साथ परमाणु समझौते के मुद्दे पर वाम दलों ने तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा कर दी। मनमोहन सरकार अल्पमत में आ गई। यूपीए सरकार पर संकट के बादल छाने लगे। उस समय मुलायम सिंह यादव ने यूपीए सरकार को समर्थन की घोषणा कर दी। समाजवादी पार्टी के तब 39 सांसद थे। सपा के इस संख्याबल की बदौलत मनमोहन सरकार एक बार फिर बहुमत में आ गई। सरकार बचाने में कामयाबी मिल गई।

हालांकि, इसके बाद मुलायम सिंह यादव ने केंद्र में अपना प्रभाव दिखाना शुरू किया। सीबीआई ने वर्ष 2008 में ही सुप्रीम कोर्ट पहुंच कर मुलायम और उनके परिवार के खिलाफ मामले को वापस लेने की मांग की। विश्वनाथ चतुर्वेदी ने इसका विरोध किया। कोर्ट में मामला चलता रहा। जांच की रफ्तार वैसी नहीं रही। इसी दौरान मुलायम सिंह यादव की ओर से सीबीआई जांच के आदेश की समीक्षा याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई। सुप्रीम कोर्ट ने समीक्षा याचिका पर वर्ष 2012 में एक आदेश पारित किया। इसके तहत डिंपल यादव का नाम हटा दिया गया।

तीन पर जांच जारी रखने के आदेश

कोर्ट ने समीक्षा याचिका पर सुनवाई के दौरान मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव और प्रतीक यादव के खिलाफ जांच जारी रखने की अनुमति दी। वर्ष 2013 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार को एक बार फिर मुलायम की जरूरत हुई। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक को पास कराया जाना था। उस दौरान एक बड़ा मामला सामने आया। तत्कालीन सीबीआई प्रमुख रंजीत सिन्हा ने एक सार्वजनिक बयान दिया। उन्होंने कहा कि सीबीआई मुलायम परिवार के खिलाफ संपत्ति मामले में सुप्रीम कोर्ट में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करने जा रही थी। क्लोजर रिपोर्ट कथित तौर पर अदालत तक नहीं पहुंची। लेकिन, मीडिया में ऐसी खबरें आने लगीं कि मामला बंद कर दिया गया था। वकील विश्वनाथ चतुर्वेदी ने सीबीआई को पत्र लिखकर क्लोजर रिपोर्ट की कॉपी मांगी। लेकिन, उन्हें यह कभी नहीं दिया गया। मामला लटका रहा।

2019 में फिर कोर्ट पहुंचे चतुर्वेदी

विश्वनाथ चतुर्वेदी एक बार फिर वर्ष 2019 सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए। सीबीआई को क्लोजर रिपोर्ट उपलब्ध कराने का निर्देश देने की मांग की। कोर्ट ने सीबीआई को नोटिस जारी किया। सीबीआई ने कथित तौर पर शीर्ष अदालत को सूचित किया है कि उसने मामले को बंद कर दिया। अपनी रिपोर्ट केंद्रीय सतर्कता आयोग को दे दी है। विश्वनाथ चतुर्वेदी ने सीवीसी के पास एक आरटीआई दाखिल की। सीवीसी का जवाब आया कि उसे इस मामले में सीबीआई से कोई क्लोजर रिपोर्ट नहीं मिली है।

सीवीसी के जवाब को लेकर विश्वनाथ चतुर्वेदी ने एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इस मामले की सुनवाई 22 नवंबर को होगी। कोर्ट में सीबीआई को जवाब देना है। अब सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव का निधन हो चुका है। लेकिन, इस मामले में दो आरोपियों अखिलेश यादव और प्रतीक यादव के भविष्य पर बड़ा निर्णय हो सकता है।

2024 से पहले गरमा सकता है माहौल

लोकसभा चुनाव से पहले अगर यह मामला दोबारा खुला तो मुश्किलें समाजवादी पार्टी अध्यक्ष के लिए बढ़ेंगी। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई मामले को लेकर गंभीर दिख रही है। इन मामलों को चुनावी मैदान में बड़ी ही गंभीरता से उठाया जा रहा है। लोकसभा चुनाव में भी इस मामले को जोरदार तरीके से उठाया जाएगा। अखिलेश यादव के खिलाफ इस प्रकार के मामलों को लेकर भाजपा यूपी में बड़ा अभियान लॉन्च कर सकती है। असर तो मैनपुरी लोकसभा उप चुनाव के मैदान में भी दिख सकता है। इसको देखते हुए सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर हर किसी की नजर रहने वाली है।
साभार

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