भयावह व अनिश्चित भविष्य के बीच – अनुज अग्रवाल

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सभ्यताएँ जब अपने शिखर पर पहुँचती हैं तो उसके उपरांत बस पराभव की ओर ही जा सकती हैं। मानव सभ्यता क्या ऐसे ही दौर में है। विज्ञान व प्रौद्योगिकी व बाजार की उपलब्धियों के इस स्वर्णिम काल में हम सबसे ज़्यादा डरे हुए हैं और हताश व निराश हैं। यूँ तो मानव अपने उद्भव काल से ही निरंतर संघर्ष कर आगे बढ़ता आया है। हमारा उद्विकास इसका गवाह है। प्रकृति से हमारा संघर्ष और सामंजस्य हमारी जीत की कहानी है। यह उपलब्धि हमारे लिए गर्व की बात रही है किंतु इस गर्व के “अभिमान” व “अति”में बदलने के कारण हम नियंत्रण खो बैठे हैं। उपलब्धियों के अभिमान में अपनी जनसंख्या पर नियंत्रण नहीं कर पाए और उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हम प्रकृति का अनियंत्रित दोहन करने लगे। नतीजा ग्लोबल वार्मिंग व जलवायु परिवर्तन। भारत की ही बात करें तो वर्ष 2021 में हमारी जीडीपी वृद्धि 9% के आस पास थी ( इस वर्ष यह 6% के आसपास ही होगी) तो जलवायु परिवर्तन के कारण जीडीपी को हुआ नुकसान कुल जीडीपी का 5.2% था। कमोबेश यह हाल पूरी दुनिया का है और यह नुकसान साल दर साल बढ़ता ही जाना है, मगर हम संभल ही नहीं रहे। न हम उतनी तेज़ी से अपनी नीतियाँ बदल रहे और न ही विकास का माडल। अस्तित्व की चुनौतियों के बीच दुनिया के अधिकांश देश आपसी सत्ता संघर्ष व संसाधनों और वर्चस्व की लड़ाई में उलझे हैं। अमेरिका व चीन के व्यापार युद्ध व अमेरिका व यूक्रेन (रूस) के सामरिक युद्ध ने पूरी दुनिया को तबाही के मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। एक ओर अमेरिका व नाटो द्वारा पहले व दूसरे विश्व युद्ध के बाद स्थापित की गयी विश्व व्यवस्था की यथास्थिति बनाए रखने की कोशिशें जारी है तो दूसरी ओर अमेरिकी व नाटो के वर्चस्व को तोड़ तथाकथित नई विश्व व्यवस्था को स्थापित करने की होड़ है। संघर्ष के इस रक्तरंजित खेल में दुनिया फिर से दो प्रमुख गुटों व अनेक क्षेत्रीय शक्तियों में बँट गयी है। खेल के प्रमुख खिलाड़ी यूएन में वीटो शक्ति प्राप्त अमेरिका, ब्रिटेन व फ्रांस बनाम रुस व चीन हैं। जहां अमेरिकी ख़ेमा यानि नाटो देश रुस -यूक्रेन युद्ध में निरंतर हथियार व प्रशिक्षण आदि दे रहे है तो वहीं रूसी ख़ेमे को ईरान, बेलारूस व उत्तरी कोरिया खुलकर मदद दे रहे हैं। ईरान अपने देश में चल रहे हिजाब विरोधी आंदोलन के पीछे अमेरिका व इसराइल का हाथ मानता है और उनसे दो दो हाथ करने की तैयारी में है तो उत्तरी कोरिया ने रूस चीन के इशारे पर दक्षिण कोरिया पर मिसाइल हमले तेज कर दिए हैं। नाटो की ताकत बांटने की यह रूस की रणनीति का हिस्सा भी है। चीन के विरुद्ध जहाँ अमेरिका क्वाड को मजबूत कर रहा है तो चीन ब्रिक्स व शंघाई सहयोग संगठन को। पिछले तीन दशकों में रूस व चीन के जिस साम्यवादी किले को ध्वस्त कर अमेरिका, ब्रिटेन व फ्रांस ने बाज़ारवादी समाजवाद स्थापित किया था व अमेरिका दुनिया का एकछत्र राजा बन बैठा था, अब वो स्थिति बदल चुकी है। अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए जो भी उपाय व घेराबंदी अमेरिका, ब्रिटेन व फ्रांस के नेतृत्व में पश्चिमी देशों ने की वो अब दरकती व ध्वस्त होती जा रही है।

रूस व चीन की सामरिक घेराबंदी के खेल में कठपुतली बने यूक्रेन व ताइवान में से यूक्रेन को रूस ने तबाह कर दिया है तो ताइवान की चीन पूरी तरह घेराबंदी कर चुका है और अमेरिकी फ़ौज पहले से ही मुस्तैद हैं, देर सेवर यहाँ भी युद्ध शुरू होना ही है। चूंकि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अब तीसरी बार पुनः निर्वाचित हो चुके हैं तो अब यह संघर्ष कभी भी छिड़ सकता है। पिछले नौ महीनों में नाटो देशों की भरपूर कोशिशों के बाद भी रूस ने यूक्रेन को तबाह कर दिया है व बड़े भूभाग पर कब्जा भी कर लिया है और यूरोप व अमेरिका को आर्थिक बदहाली की ओर धकेल दिया है। रूस द्वारा यूरोप को गैस व खनिज तेल की आपूर्ति रोकने व बाधित कर देने से यूरोप के देश भयंकर संकट में हैं। बढ़ती ठंड के बीच गैस की कटौती से घरों को गर्म रखना नामुमकिन होता जा रहा है, जिस कारण बढ़ी संख्या में लोग ठंड से मारे जा सकते हैं। इधर काला सागर में रूस के नेवल बेस पर युक्रेनी हमले के बाद रूस ने यूक्रेन से खाद्य पदार्थों की आपूर्ति पर फिर से प्रतिबंध लगा दिया है जिस कारण यूरोप फिर से खाद्य संकट के चक्र में फँस चुका है। क्रिमिया ब्रिज के बाद अब रूसी युद्धपोत मुकरउ पर हमले के पीछे रूस इंग्लैंड का हाथ मान रहा है। ऐसे में रूस – इंग्लैंड और बिगड़ने की आशंका है। यह टकराव सीधे युद्ध में भी बदल सकता है। ऐसे में यह संघर्ष अब अपने प्रत्यक्ष व निर्णायक दौर की ओर बढ़ चुका है। या तो यूरोप घुटने टेक देगा या अमेरिका इसको परमाणु युद्ध के मुक़ाम पर पहुँचा देगा , डर्टी बम की चर्चा व विवाद के बीच ऐसा लग भी रहा है।पिछले दो तीन वर्ष से दुनिया के देशों पर अमेरिकी प्रभाव में निरंतर कमी आ रही है। अमेरिका के परंपरागत मित्र अरब देश व तुर्की बगावती तेवर अपनाए हुए हैं तो जर्मनी व इटली भी कभी भी पाला बदल सकते हैं। रुस व चीन समर्थित राजनीतिक दल अधिकांश अमेरिकी ख़ेमे के देशों में व्यापक जनसमर्थन पाते जा रहे हैं व इटली, ब्राज़ील सहित कई में सत्ता पर काबिज भी होते जा रहे हैं। फिसलती साख, सत्ता व बाज़ी और बिगड़ती अर्थव्यवस्था को देख खिसियाए पश्चिमी खेमें के पास सीधे व घातक युद्ध के अतिरिक्त विकल्प बचे नहीं हैं। चूँकि अंतरराष्ट्रीय संगठनों की स्थिति बहुत कमजोर हो चुकी है व शांति व मध्यस्थता के लिए कोई पहल करने को तैयार नहीं , तो ऐसे में युद्ध ही विकल्प बचता है। यद्यपि रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने हाल ही में अमेरिकी वर्चस्व के समाप्त होने का दावा करते हुए दुनिया के बहुध्रुवीय होने की बात की व आरोप लगाया कि उनका देश शांति वार्ता के लिए तैयार है किंतु अमेरिकी ख़ेमा इसके लिए तैयार नहीं। पुतिन ने जिस प्रकार भारत के प्रधानमंत्री मोदी की स्वतंत्र विदेश नीति की प्रशंसा की है , उससे भी यह इशारा मिला कि वे किसी भी शांति की पहल के लिए मोदी की मध्यस्थता स्वीकार कर सकते हैं। उम्मीद है कि मध्य नवंबर में होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के तुरंत बाद होने जा रहे जी – 20 शिखर सम्मेलन से शांति व समझौते की कोई राह निकले व महाशक्तियाँ नए शक्ति संतुलन के अनुरूप सामंजस्य स्थापित करने को तैयार हो जायें।अगर मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी हार जाती है तो स्थितियाँ बेकाबू हो सकती हैं और बदहवासी में साख बचाने के लिए जो बाइडेन कोई ख़तरनाक कदम भी उठा सकते हैं। इन सबके बीच दुनिया गहरी व व्यापक आर्थिक मंदी की ओर तेजी से बढ़ रही है। यह मंदी व्यापक बेरोजगारी को भी जन्म देगी यह सबको पता है, ऑटोमेशन व एआई वैसे भी रोजगार लीलती जा ही रही है। महंगाई चरम पर है और बाढ़ व सूखे के कारण दुनिया खाद्य संकट के मुहाने पर है। नवंबर माह में डब्ल्यूएचओ ने कोरोना की नई लहर की चेतावनी जारी कर दी है तो जलवायु परिवर्तन के कारण नई बीमारियां भी तेज़ी से दस्तक दे रही हैं। यह कहना ग़लत नहीं होगा कि दुनिया के लिए आगे का समय बहुत कठिन व बद से बदतर होने जा रहा है।

इन भयावह परिस्थितियों में पूरी दुनिया में बस भारत में ही स्थितियाँ नियंत्रण में हैं व मंदी की मार कम है व विकास दर सकारात्मक है। आगामी माह में भारत में हिमाचल प्रदेश व गुजरात में विधानसभा चुनाव हैं। जिस कुशलता से मोदी विपरीत परिस्थितियों में भी देश को कुशलतापूर्वक चला रहे हैं व सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के अपने संकल्प को ज़मीन पर उतार रहे हैं उससे आम जनता उनसे खुश है।भारत अब एक क्षेत्रीय वैश्विक ताकत है व मोदी विश्व के शक्तिशाली नेताओं में से एक। उससे भी ज़्यादा जनता में ख़ुशी भ्रष्टाचार, ड्रग्स व शराब माफिया, टैक्स चोरों, आतंकियों, धार्मिक कट्टरवादी नेताओं व संस्थाओं, भूमाफिया आदि पर ताबड़तोड़ कार्यवाही और नई सुधारवादी व कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने व तेजी से देश का ढांचागत विकास करने के कारण भी है। ऐसे में हिमाचल प्रदेश व गुजरात के विधानसभा चुनाव चुनावों में भाजपा को एकतरफा जीत मिले तो बड़ी बात नहीं। सवाल यह है कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों व जलवायु परिवर्तन के संकटों से मोदी अब तो देश को बचा पा रहे हैं, किंतु स्थितियां और बिगड़ी जिसकी आशंका शत प्रतिशत है तो क्या वे आगे भी देश को इन परिस्थितियों से सुरक्षित बचा पाएँगे? अगर उत्तर हां है तो प्रश्न फिर से खड़ा होता है कि कब तक ?

अनुज अग्रवाल

संपादक, डायलॉग इंडिया

स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार

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