सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश ( एक से सातवें समुल्लास के आधार पर) अध्याय – 11 ख कुछ बनने के लिए बन में बसो

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कुछ बनने के लिए बन में बसो

हमारे ऋषियों की व्यवस्था रही है कि इस प्रकार स्नातक अर्थात् ब्रह्मचर्य्यपूर्वक गृहाश्रम का कर्त्ता द्विज अर्थात् ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य गृहाश्रम में ठहर कर निश्चितात्मा और यथावत् इन्द्रियों को जीत के वन में वसें। कुछ बनने के लिए प्रकृति के सानिध्य में अर्थात मन में बसना ही पड़ेगा।
महर्षि दयानंद जी लिखते हैं कि ‘जब गृहस्थ शिर के श्वेत केश और त्वचा ढीली हो जाय और लड़के का लड़का भी हो गया हो तब वन में जाके वसे।’
वन में जाकर बसना इसलिए भी आवश्यक है कि संसार में रहकर हम अपने लिए कुछ नहीं कर पाते अर्थात अपनी आत्मा के लिए करने का समय हमारे पास वन में जाकर बसने के बाद ही आरंभ होता है। जब मनुष्य केवल और केवल अपने आप से संवाद करता है और अपने आप से संवाद करना ही उस समय परमात्मा से संवाद करना होता है। भारत का इतिहास ऐसे ही आतंकवादी ऋषि यों का इतिहास है जो आत्मा के माध्यम से परमात्मा से संवाद करने के लिए प्रसिद्ध रहे। उन्होंने संसार को छोड़ दिया केवल इसलिए कि संसार की दुर्गति ना हो। उनकी सोच रही कि संसार में रहकर आपस में तो जूतमपैजार होती रहती है इसलिए संसार से मुंह मोड़ो और संसार के सृष्टा के साथ संवाद जोड़ो। इसका अनुकरण दूसरे लोग करेंगे तो वह भी संसार की कीचड़ से अपने आपको अलग करेंगे। ऐसी स्थिति में न किसी के लिए वृद्ध – आश्रम की आवश्यकता है और ना ही किसी दूसरे अनाथालय की आवश्यकता है। ऐसी स्थिति में सब सबके लिए सहयोगी और उपयोगी हो जाते हैं। इसी प्रकार की सहयोगी और उपयोगी भावना को हमारे ऋषियों ने अपनाया जिससे हमारा इतिहास शानदार और जानदार बना।

एक चौथाई आबादी करती थी देश सेवा

वैदिक ऋषियों की वैज्ञानिक, तार्किक और बुद्धि संगत व्यवस्था का विश्व के बड़े-बड़े विद्वानों ने लोहा माना है। विदेशी विद्वानों की यह स्पष्ट मान्यता रही है कि यदि परम शांति की प्राप्ति करनी है तो भारत के ऋषियों के द्वारा प्रदत की गई आश्रम व्यवस्था का अक्षरश: पालन करना होगा।
वन में रहकर हमारे ऋषि पूर्वज शरीर के सुख के लिए नहीं जीते थे, शरीर के सुख के लिए अति प्रयत्न नहीं करते थे। ब्रह्मचारी रहकर अर्थात पत्नी के साथ रहने पर भी विषयों की या स्त्री संसर्ग की इच्छा नहीं करते थे। भूमि में सोना, अपने आश्रित या स्वकीय पदार्थों में ममता न करना, वृक्ष के मूल में वसना- उनके स्वभाव में सम्मिलित हो जाता था। थोड़ी बहुत न्यूनाधिक ऐसी ही व्यवस्था उन लोगों की होती थी जो गृहस्थ आश्रम को भोग कर वानप्रस्थ आश्रम में रह रहे होते थे। इसके अतिरिक्त ब्रह्मचर्य आश्रम और गृहस्थ आश्रम में भी लोग समाज सेवा के लिए समय निकालना अच्छा मानते थे।
इस प्रकार राष्ट्र की लगभग एक चौथाई जनसंख्या उस समय ऐसी होती थी जो राष्ट्र में शांति और व्यवस्था के लिए ही काम कर रही होती थी। इस एक चौथाई जनसंख्या का आचरण, जीवन व्यवहार, दिनचर्या और जीवन चर्या सारी राष्ट्र, समाज और प्राणीमात्र के कल्याण हेतु होती थी। इससे राष्ट्र में पुलिस व्यवस्था की आवश्यकता नहीं होती थी अपितु ये वानप्रस्थी और संन्यासी लोग उस कार्य को और भी अधिक उत्तमता, सकारात्मक ऊर्जा और अच्छी सोच के साथ निस्वार्थ भाव से संपादित करते थे जिसे आज की पुलिस व्यवस्था भी नहीं कर पाती है। आज की पुलिस व्यवस्था में लगे लोगों के अपने पारिवारिक निजी स्वार्थ होते हैं। जिनके वशीभूत रहकर वह अपने कार्य को उत्तमता से संपादित नहीं कर पाते। इसके अतिरिक्त उन्हें सेवा संस्कार का प्रशिक्षण भी नहीं दिया जाता। जब तक सेवा संस्कार की साधना का प्रशिक्षण जीवन में सम्मिलित नहीं होता , तब तक सार्वजनिक जीवन में शांति असंभव है।

आजकल की पुलिस और शांति व्यवस्था

पुलिस का कार्य शांति व्यवस्था स्थापित करना है परंतु उसे वह डंडा के बल पर स्थापित करने का प्रयास करती है। उसकी कार्यशैली से ऐसा लगता है कि जैसे मनुष्य समाज पशुओं का एक झुण्ड है, जिसे डंडे से हांका जाता है। इसके विपरीत भारतीय मनीषियों का यह चिंतन रहा कि मनुष्य पशुओं के किसी झुंड का सदस्य नहीं है बल्कि वह एक सामाजिक प्राणी है और समाज की सुव्यवस्थित व्यवस्था में रहना उसका स्वभाव है। आज की पुलिस मनीषी नहीं है । हमारे ऋषि पुलिस नहीं थे पर इसके उपरांत भी वे पुलिस का काम करते थे।
समाज की सुव्यवस्था को सुव्यवस्थित रखने के लिए डंडे वाले लोगों की नहीं अपितु विवेकशील और वैराग्यवान तपस्वी लोगों की आवश्यकता है। बस इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्राचीन भारतीय समाज में गृहस्थ आश्रम भोगकर लोग स्वेच्छा से अपने आपको समाज के लिए समर्पित कर देते थे। जब अपने गृहस्थ की सब इच्छाएं पूर्ण हो गईं तो उसके बाद समाज सेवा और उसके अतिरिक्त आत्मकल्याण ही एक इच्छा रह जाती थी। उस इच्छा का निर्वाह करके लोग आत्मिक प्रसन्नता की अनुभूति करते थे। समाज का यह सेवा संस्कार भारतीय इतिहास दर्शन का एक महत्वपूर्ण सूत्र है। इस सूत्र को पकड़कर हमें अपने प्राचीन ऋषि पूर्वजों के उत्कृष्ट चिंतन और जीवनशैली का बोध होता है। माना कि पुलिस मनीषी नहीं हो सकती या ऋषि नहीं हो सकती, पर सेवा संस्कार को तो सीख ही सकती है, इसलिए आज की पुलिस को सेवा संस्कार देना भी समय की आवश्यकता है।
महर्षि दयानंद जी महाराज ने इस संबंध में शास्त्रों की व्यवस्था देते हुए लिखा “जो शान्त विद्वान् लोग वन में तप धर्म्मानुष्ठान और सत्य की श्रद्धा करके भिक्षाचरण करते हुए जंगल में वसते हैं, वे जहाँ नाशरहित पूर्ण पुरुष हानि लाभरहित परमात्मा है; वहां निर्मल होकर प्राणद्वार से उस परमात्मा को प्राप्त होके आनन्दित हो जाते हैं।”
इति संक्षेपेण वानप्रस्थविधिः।वनेषु च विहृत्यैवं तृतीयं भागमायुषः।
चतुर्थमायुषो भागं त्यक्त्वा संगान् परिव्रजेत्।। मनु०।।

“इस प्रकार वनों में आयु का तीसरा भाग अर्थात् पचासवें वर्ष से पचहत्तरवें वर्ष पर्यन्त वानप्रस्थ होके आयु के चौथे भाग में संगों को छोड़ के परिव्राट् अर्थात् संन्यासी हो जावे।”

संन्यस्त होने का अभिप्राय परमपिता परमेश्वर का सानिध्य प्राप्त करना होता था । जैसे परमपिता परमेश्वर न्यायी और पक्षपात शून्य होकर कार्य करता रहता है वैसे ही ईश्वर के उन्हीं गुणों को आत्मसात कर संसार के कल्याण के लिए अपने आपको समर्पित करना उस समय प्रत्येक व्यक्ति का उद्देश्य होता था। इससे भी आगे चलकर शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा और समाधान की षटक संपत्ति को प्राप्त कर मनुष्य मुमुक्षु होकर जीवन जीता था। इस प्रकार उसके जीवन का उद्देश्य केवल मोक्ष की साधना रह जाता था।
इसके लिए महर्षि दयानंद जी ने प्रमाण दिया है कि :-

नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः।
नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात्।। -कठ0 वल्ली 2। मं० 24।।
जो दुराचार से पृथक् नहीं, जिसको शान्ति नहीं, जिस का आत्मा योगी नहीं और जिस का मन शान्त नहीं है, वह संन्यास लेके भी प्रज्ञान से परमात्मा को प्राप्त नहीं होता।
कुल मिलाकर सदाचरण और सद्बुद्धि के आलोक में जीवन को सदुपयोगी बना कर जीना हमारे इतिहास की एक विशेषता है। हमारा इतिहास उन्हीं लोगों का गुणगान और गुण-गण – चिंतन करता है जिन्होंने आत्मस्थ होकर पहले आत्मोन्नति की और उसके पश्चात राष्ट्रोन्नति के कार्य में लगे। कहने का अभिप्राय है कि आत्मोन्नति और राष्ट्रोन्नति दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। राष्ट्रोन्नति के लिए आत्मोन्नति होना और आत्मोन्नति के लिए राष्ट्र का सुव्यवस्थित होना बहुत आवश्यक है। इस सच को जब हम समझ लेंगे तो हमको पता चल जाएगा कि स्वामी दयानंद जी द्वारा लिखित अमर ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास के सूत्रों को किस प्रकार संजोकर रखने में उन्होंने सफलता प्राप्त की है?

राकेश कुमार आर्य

मेरी यह पुस्तक डायमंड बुक्स नई दिल्ली के द्वारा प्रकाशित हुई है । जिसका अभी हाल ही में 5 अक्टूबर 2000 22 को विमोचन कार्य संपन्न हुआ था। इस पुस्तक में सत्यार्थ प्रकाश के पहले 7 अध्यायों का इतिहास के दृष्टिकोण से विश्लेषण किया गया है। पुस्तक में कुल 245 स्पष्ट हैं। पुस्तक का मूल्य ₹300 है।
प्रकाशक का दूरभाष नंबर : 011 – 407122000।

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